Thursday, 21 May 2026

Class 9 Sanskrit Chapter 7 Hindi Translation उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् Summary

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Sanskrit Class 9 Chapter 7 Hindi Translation उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् Summary

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 7 हिंदी अनुवाद

Class 9 Sanskrit Chapter 7 Summary Notes उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्

पञ्चतन्त्र से उद्धृत यह कथा शिक्षाप्रद होने के साथ-साथ
ज्ञानप्रद भी है। धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दो मित्रों की कथा के माध्यम से शिक्षित व अशिक्षित एवं मानव – संस्कारों का प्रभाव दर्शाया गया है। अशिक्षित, मूर्ख, पापबुद्धि, लोभवश अपने शिक्षित मित्र धर्मबुद्धि पर ही चोरी का आरोप लगाकर कुकृत्य करता है। उसके कुकृत्य के कारण उसके पिता को जान गंवानी पड़ी। पापबुद्धि धर्मबुद्धि को देशाटन के विभिन्न लाभ बताकर धनार्जन की योजना बताता है एवं धनार्जन कर फिर अपने ही मित्र धर्मबुद्धि को मूर्ख बनाकर सारा धन चुरा लेता है और धर्मबुद्धि को ही धन चुराने का दोषी साबित करता है। लेकिन धर्माधिकारी और धर्मबुद्धि की समझ से पापबुद्धि के कुकृत्य साबित हो जाते हैं।

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धर्मबुद्धि कहता है- ‘दूसरों की स्त्रियों को माता समान, दूसरों के पदार्थों में पत्थर समान एवं सब प्राणियों में अपने समान धर्मयुक्त बुद्धि वाले देखते हैं।’
अतः लोभवश परवञ्चना और मित्र को धोखा देकर शत्रुवत् व्यवहार करना स्वयं के लिए ही घातक सिद्ध होता है।

उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् पाठ- परिचय

मातः! पश्यतु, अद्य अहं मार्गे पतितं धनं प्राप्तवान् । एतेन धनेन बहूनि क्रीडनकानि क्रीणामि ।
सरलार्थ – हे माता ! देखो, आज मैंने मार्ग में गिरे हुए धन को पाया है। इस धन से बहुत खिलौने खरीदूँगा।
न हि पुत्र! एतत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनमस्ति, तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्।
सरलार्थ – नहीं, बेटा ! यह अन्य (व्यक्ति) के श्रम से कमाया हुआ धन है, उसे ही सौंपना चाहिए। पराया धन तृण के समान गिनना चाहिए।
मातः! – अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भवति ?
सरलार्थ- हे माता! पराया धन तृण के समान कैसे होता है?
एहि पुत्र! अहं तुभ्यं पञ्चतन्त्रस्य काञ्चन कथां श्रावयामि यया त्वं स्वप्रश्नस्य उत्तरं प्राप्तुं शक्नोषि ।
सरलार्थ – आओ, बेटा! मैं तुम्हें पञ्चतन्त्र की एक कथा सुनाती हूँ, जिसके द्वारा तुम अपने प्रश्न का उत्तर पा सकते हो।
मातः! – तर्हि कृपया सत्वरं श्रावयेतु ।
सरलार्थ – माता ! अवश्य कृपा करके शीघ्र सुनाओ।

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Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 Hindi Translation

Sanskrit Class 9 Chapter 7 Hindi Anuvad – कक्षा 9 संस्कृत पाठ 7 हिंदी अनुवाद

1. कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म। अथ कदाचित्पापबुद्धिना चिन्तितं यदहं तावान्मूर्खो दरिद्रतया पीडितश्च । अत एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य अन्यं देशं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि इति । (पृष्ठ 80)

शब्दार्था:-

  • कदाचित् – कभी ।
  • चिन्तितम् – सोचा।
  • स्वीकृत्य – स्वीकार करके ।
  • अनन्तरम् – पश्चात् ।
  • वञ्चयित्वा – धोखा देकर ।

सरलार्थ:- किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दो मित्र रहते थे। तब एक बार पापबुद्धि ने सोचा कि मैं तो मूर्ख हूँ और निर्धनता से पीड़ित हूँ। इसलिए इस धर्मबुद्धि को लेकर अन्य देश को जाऊँगा। वहाँ इसके सहारे से धन कमा लूँगा। तत्पश्चात् इसे भी ठगकर सुखी हो जाऊँगा।

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2. अथान्यस्मिन् अहनि धर्मबुद्धिमुपेत्याह-
पापबुद्धिः भो मित्र! यदा भवान् वृद्धः भवति तदा
‘बाल्ये यौवने वा मया एवं कृतम्’ इति वक्तुं योग्यं किं कार्यं स्मरति? भवता अन्यः देश: न दृष्टः एव चेत् भवतः शिशून् अन्यदेशसम्बन्धे कां कथां वदिष्यति ? उक्तमेव-
देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम्।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम् ॥ (पृष्ठ 80)

शब्दार्थाः-

  • अन्यस्मिन् – अन्य ।
  • अहनि – दिन ।
  • उपेत्य – पास जाकर ।
  • चेत् – यदि ।
  • येन – जिसने ।
  • धरणी – पृथ्वी ।

सरलार्थ:- एक दिन (वह) धर्मबुद्धि के पास जाकर कहने लगा-
पापबुद्धि – अरे मित्र! जब तुम बूढ़े हो जाओगे तो ‘बचपन में अथवा यौवन में मैंने यह किया’ यह कहने योग्य-किस कार्य को याद करोगे? यदि आपने अन्य देश न देखा था तो आपके बच्चों को अन्य देश के सम्बन्ध में क्या चर्चा करोगे?
कहा गया है—
अन्वयः- येन देशान्तरेषु धरणी पीठे भ्रमता बहुविधभाषावेषादि न ज्ञातम्, तस्य जन्मनः फलं व्यर्थम् ।
सरलार्थ – जिसने देश- विदेशों में पृथ्वी तल पर घूमते हुए अनेक प्रकार की भाषाओं और वेश आदि को नहीं जाना, उसके जन्म का फल व्यर्थ है।

3. एवमेव
विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक् ।
यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः ॥
अतः आवां देशान्तरं गत्वा धनम् अर्जयित्वा आगच्छाव इति । अथ तस्य तद्वचनमाकर्ण्य प्रहृष्टमनाः धर्मबुद्धिः आह-अस्तु तावत् गुरुजनाज्ञया गच्छावः (ततस्तौ गुरुजनानामनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ । पापबुद्धिः धर्मबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्)
पापबुद्धिः – मित्र ! आवाभ्यामिदानीं प्रचुरं धनमुपार्जितम्। अत्रागत्य वर्षाणि व्यतीतानि, सर्वं धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः। (पृष्ठ 80)

शब्दार्था: –

  • व्रजति – घूमता है ।
  • प्रभूतम् – अत्यधिक ।
  • इदानीम् – अब ।
  • प्रचुरम् – अत्यधिक ।
  • आगत्य – आकर ।
  • व्यतीतानि – बीत गए ।

सरलार्थ:- इस प्रकार-
अन्वयः- यावत् हृष्टः मानवः दशात् देशान्तरं भूमौ न व्रजति, तावत् विद्यां वित्तं शिल्पं सम्यक् न आप्नोति ।
सरलार्थ:- जब तक प्रसन्न व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान को पृथ्वी पर नहीं घूमता है, तब तक वह विद्या, धन तथा शिल्प को अच्छी प्रकार प्राप्त नहीं करता है।
इसलिए हम दोनों अन्य देश को जाकर, धन कमा कर आएँगे। तब उसके उस वचन को सुनकर प्रसन्न मन वाला धर्मबुद्धि कहने लगा- अच्छा तो गुरु लोगों की आज्ञा से चलेंगे। (तब वे दोनों गुरु लोगों की अनुमति को प्राप्त करके शुभ दिन अन्य देश को चले गए। पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के प्रभाव से अत्यधिक धन कमा लिया)।
पापबुद्धि – हे मित्र ! हम दोनों ने अब अत्यधिक धन कमा लिया है। यहाँ आकर अनेक वर्ष बिताए । सारा धन लेकर अपने गाँव को चलते हैं।

Class 9 Sanskrit Chapter 7 Hindi Translation उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् Summary 7

4. धर्मबुद्धिः – अथ किम् । तथैवास्तु ।
(यदा तौ स्वनगरसमीपमागतवन्तौ तदा)
पापबुद्धिः – भद्र! एतत् सर्वं धनं गृहं प्रति नेतुं न उचितम्। अतः एतद् धनमत्रैव गहनारण्ये कुत्रापि भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रमादाय गृहं प्रविशावः ।
धर्मबुद्धिः – सत्यमेवाभिहितं भवता, तथैव कुर्वः । यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। अन्यस्मिन्नहनि पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्। (अथ कतिचिद्दिनानन्तरम्) (पृष्ठ 81)

शब्दार्था:-

  • तथैव – वैसा ही ।
  • भद्र – प्रिय ।
  • नेतुम् – ले जाना ।
  • गहन – गहरा ।
  • अत्रैव – यहाँ ही ।
  • अरण्ये – वन में।
  • निक्षिप्य – रखकर ।
  • आदाय – लेकर ।
  • अभिहितम् – कहा है ।
  • खनित्वा – खोदकर ।

सरलार्थ:-
धर्मबुद्धि – और क्या ? वैसा ही होवे ।
(जब वे दोनों अपने नगर के पास आए तब)
पापबुद्धि – प्रिय ! वह सारा धन घर ले जाना उचित नहीं है। इसलिए यह धन यहाँ ही गहरे जंगल में कहीं भी पृथ्वी में रखकर कुछ लेकर घर को चलते हैं।
धर्मबुद्धि – आपने सत्य कहा है। ऐसा ही करते हैं। जैसा दोनों ने सोचा था, उसी प्रकार पृथ्वी को खोदकर वहाँ धन रखकर अपने घर को चले गए। दूसरे दिन पापबुद्धि रात में जंगल में जाकर वह सारा धन लेकर गड्ढे को पूरा करके अपने घर को आ गया। (कुछ दिन के बाद)

5. पापबुद्धिः – सखे! मम कुटुम्बे बहवः जनाः सन्ति, धनाभावात् कष्टम् अनुभवामि। अतः तत्र गत्वा किञ्चिन्मात्रं धनमानयावः ।
धर्मबुद्धिः – अस्तु मित्र ! गच्छावः ।
(अथ द्वावपि गत्वा तत्स्थानं यावत् खनतः तावद्रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ । अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान् )
पापबुद्धिः – भोः धर्मबुद्धे ! त्वयैवापहृतम् एतद्धनं, नान्येन । तत्प्रयच्छ मे तदर्धम्। अन्यथा अहं राजकुले निवेदयिष्यामि । (पृष्ठ 82)

शब्दार्था:-

  • अनुभवामि – अनुभव करता हूँ।
  • खनतः – खोदता हूँ।
  • ताडयन् – पीटता हुआ ।
  • अपहृतम् – चुराया है।
  • प्रयच्छ – दे दो ।
  • अन्यथा – वरना ।
  • तदर्धम् – उसका आधा ।

सरलार्थ:-
पापबुद्धि – मित्र ! मेरे परिवार में अनेक लोग हैं। धन के अभाव से कष्ट का अनुभव कर रहा हूँ । इसलिए वहाँ जाकर कुछ धन ले आते हैं।
धर्मबुद्धि – ठीक है, मित्र! चलते हैं।
(तब दोनों जाकर उस स्थान पर ज्योंहि खोदते हैं, वैसे ही खाली बर्तन देखते हैं। इसी बीच पापबुद्धि सिर पीटते हुए कहने लगा ।
पापबुद्धि – अरे धर्मबुद्धि! तुमने यह धन चुराया है, दूसरे ने नहीं। इसलिए मेरा आधा दे दे। वरना मैं कोर्ट में निवेदन करूँगा ।

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6. धर्मबुद्धिः – भोः दुरात्मन्! मा मैवं वद। धर्मबुद्धिः खल्वहम्। नैतत् चौरकर्म करोमि । मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः ॥ (एवं द्वावपि विवदमानौ धर्माधिकारिणं निकषा गतौ)
धर्माधिकारीः – ननु न कोऽपि साक्षी युवाभ्यामन्यतरस्य चौरकर्मणः । अतः यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदेवता एव न्यायनिर्णयं करिष्यति। अतः प्रातःकाले युवामस्माभिः पापबुद्धिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। तत्रैव निर्णयः भविष्यति ।
(अत्रान्तरे पापबुद्धिः गृहं गत्वा स्वजनकं प्रबोधितवान्)
पापबुद्धि – तात! मया धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः । भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति, अन्यथास्माकं प्राणै: सह यास्यति । (पृष्ठ 82)

शब्दार्थाः-

  • दुरात्मन् – हे दुष्ट ।
  • मा मा – नहीं, नहीं।
  • द्रव्य – धन।
  • लोष्ठ – मिट्टी |
  • वीक्षन्ते – देखते हैं।
  • विवदमानौ – विवाद करते हुए।
  • निकषा – निकट ।
  • अनुपलब्धम् – अप्राप्त।
  • प्रभूतः – अत्यधिक।
  • उक्त – कथन।
  • अन्यथा – नहीं तो।
  • यास्यति – चला जाएगा।
  • मातृवत् – माता के समान ।
  • परदारा – पराई स्त्री ।

सरलार्थ:-
धर्मबुद्धि – अरे दुष्ट! ऐसा मत बोल। मैं धर्मबुद्धि हूँ। यह चोर कार्य नहीं करता हूँ।
अन्वयः – धर्मबुद्धयः परदारेषु मातृवत्, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, सर्वभूतेषु आत्मवत् वीक्षन्ते।
सरलार्थ:- धर्मात्मा लोग पराई स्त्रियों को माता के समान, पराए धन को मिट्टी के समान, सभी प्राणियों को अपने समान देखते हैं।
(इस प्रकार दोनों झगड़ते हुए धर्माधिकारी के पास गए)
धर्माधिकारी – आप दोनों के अतिरिक्त अन्य चौरकर्म का कोई गवाह है क्या? इसलिए जहाँ मनुष्य की गवाही प्राप्त नहीं होती है, वहाँ वन का देवता ही न्याय का निर्णय करेगा। इसलिए प्रात: तुम दोनों हमारे साथ वन को चलना । वहाँ ही निर्णय होगा।
(इसी बीच पापबुद्धि ने घर जाकर अपने पिता को कहा )
पापबुद्धि – हे पिता जी ! मैंने धर्मबुद्धि का अत्यधिक धन चुरा लिया है। यदि आप मेरे कथन के अनुसार कह देते हो तो अवश्य ही मेरे पास धन स्थिर रहेगा । नहीं तो हमारे प्राणों के साथ चला जाएगा।

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7. पिता – वत्स! द्रुतं वद, अहं किं करवाणि येन तद्द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत् ।
पापबुद्धिः – तात! अस्ति वनप्रदेशे महाशमी नाम वृक्षः । तस्मिन् महाकोटरम् अस्ति। तत्र भवान्साम्प्रतमेव प्रविशतु । ततः प्रभाते यदाहंसत्यश्रावणाय निवेदयामि, तदा भवता वक्तव्यं यद् धर्मबुद्धिः चौर इति ।
(तथा कृते, प्रातःकाले स्नात्वा पापबुद्धिः धर्मबुद्धिना धर्माधिकारिणा च सह न्यायार्थं वनदेवतायाः समीपमुपागतः । अन्येऽपि सामाजिकाः तद्द्रष्टुमागताः)
पापबुद्धिः – आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
भगवति वनदेवते। आवयोर्मध्ये यः चौरः त्वं कथय ।
पिता शमीकोटरस्थः – भोः । शृणुत, शृणुत। धर्मबुद्धिना हृतम् एतद्धनम्।
(तद् आकर्ण्य ते सर्वे जनाः, विस्मयेन उत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः )
सर्वे जनाः – घनापहरणदोषहेतोः शास्त्रविहितप्रकारेण धर्मबुद्धये दण्डः दातव्यः । (पृष्ठ 83)

शब्दार्था:-

  • द्रुतम् – शीघ्र ।
  • करवाणि – करूँ।
  • कोटरम् – खोडर ।
  • साम्प्रतम् – अब।
  • वक्तव्यम् – कहना है।
  • अनिल – वायु ।
  • अनल – अग्नि।
  • अहः – दिन ।
  • उभे – दोनों ।
  • शृणुत – सुनो ।
  • आकर्ण्य – सुनकर |

सरलार्थ:-
पिता – पुत्र ! शीघ्र कहो। मैं क्या करूँ जिससे वह धन स्थिर हो जाए?
पापबुद्धि – हे पिता ! वन में एक महान् शमी का वृक्ष है। उसमें महान खोडर है। वहाँ आप अभी घुस जाओ। तब प्रातः जब मैं सत्य श्रावण के लिए निवेदन करूँ, तब आप कहना कि धर्मबुद्धि चोर है।
(वैसा करने पर प्रातः स्नान करके पापबुद्धि, धर्मबुद्धि और धर्माधिकारी के साथ न्याय के लिए वनदेवता के पास गया। अन्य सामाजिक लोग भी वह देखने के लिए आ गए) ।

अन्वयः- आदित्यचन्द्रौ अनिल: अनलश्च द्यौर्भूमिराजो हृदयम् यमः च अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्म नरस्य वृत्तं जानाति।
सरलार्थ:- सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात दोनों सन्ध्या, धर्म मनुष्य के आचरण को जानते हैं। हे भगवती, वन देवता! हमारे बीच जो चोर है, उसे बताओ । शमी के खोडर में बैठा हुआ पिता – अरे ! सुनो, सुनो। यह धन धर्मबुद्धि ने चुराया है।
(यह सुनकर वह सभी लोग आश्चर्य से फटी आँखों वाले हो गए ।)
सभी लोग – धन की चोरी के अपराध के कारण शास्त्र के विधान के अनुसार धर्मबुद्धि को दण्ड देना चाहिए।

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8. धर्मबुद्धिः – इदं मिथ्याभाषितमस्ति । नाहं चोरितवान् । अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालयामि । (तथा करोति)
(अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरे अर्धदग्धशरीरः, स्फुटितेक्षणः करुणं विलपन् पापबुद्धिपिता बहिरागतः)
जना: – (साश्चर्यम्) भौः । किमिदम्? किमदम्?
ततश्च
पिता पापबुद्धेः – एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। (इत्युक्त्वा मृतः)
धर्माधिकारी – एष पापबुद्धिः दण्डनीयः ।
(राजपुरुषाः नियमानुसारं पापबुद्धि दण्डितवन्तः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः च)
सर्वे जनाः – भो धर्मबुद्धे ! त्वया सम्यक् कृतम्। पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः । अतः साधूक्तम्-उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्। (पृष्ठ 84)

शब्दार्थाः –

  • इदम् – यह ।
  • मिथ्या – ‘झूठा।
  • वह्नि – आग।
  • परिवेष्ट्य – लपेट कर ।
  • प्रज्वालयामि – जलाता हूँ ।
  • स्फुटित – फूट गई।
  • विलपन् – विलाप करता हुआ ।

सरलार्थ:-
धर्मबुद्धि यह मिथ्या कथन है। मैंने (धन) नहीं चुराया है। मैं इस शमी के खोडर को आग भड़काने वाले पदार्थों के द्वारा लपेटकर आग लगाता हूँ। (वैसा करता है)
(तब उस शमी के खोडर के जल जाने पर जिसका आधा शरीर जल गया था और आँखें फूट गई थी, ऐसा करुणापूर्वक विलाप करता हुआ पापबुद्धि का पिता बाहर आ गया) ।
तब
लोग – (आश्चर्य के साथ) अरे! यह क्या है ? यह क्या है ?
पापबुद्धि का पिता – यह सब पापबुद्धि की चेष्टा है। (यह कहकर मर गया)
धर्माधिकारी – इस पापबुद्धि को दण्ड देना चाहिए। (सिपाहियों ने नियम के अनुसार पापबुद्धि को दण्डित किया और धर्मबुद्धि की प्रशंसा की ।)
सभी लोग – हे धर्मबुद्धि! तुमने अच्छा किया है। पापबुद्धि की व्यर्थ चतुराई से पिता आग से मारा गया। इसलिए उचित ही कहा है-लाभ का चिन्तन तो करे, उसी प्रकार हानि का भी विचार करे।

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