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Class 7 Social Science Chapter 5 Question Answer in Hindi साम्राज्यों का उदय
साम्राज्यों का उदय Question Answer in Hindi
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 5 के प्रश्न उत्तर साम्राज्यों का उदय
प्रश्न 1.
साम्राज्य क्या होता है?
उत्तर:
साम्राज्य एक बहुत बड़ा राजनीतिक संगठन होता है, जिसमें एक सम्राट के अधीन मजबूत और संगठित प्रशासन होता है। इसे युद्ध, विजय और क्षेत्रीय विस्तार से बनाया जाता है। इसमें विभिन्न संस्कृतियाँ और भौगोलिक क्षेत्र सम्मलित होते हैं। भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य प्रसिद्ध और बड़ा साम्राज्य था।
प्रश्न 2.
साम्राज्यों का उदय कैसे हुआ और उन्होंने भारतीय सभ्यता को कैसे आकार दिया?
उत्तर:
भारत में साम्राज्य मुख्य रूप से मजबूत नेतृत्व, सैन्य विस्तार और संगठित प्रशासन के कारण उभरे। उन्होंने अर्थव्यवस्था, शासन संस्कृति की साझा प्रणालियाँ के द्वारा भारतीय सभ्यता को आकार दिया। चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित मौर्य साम्राज्य ने राजनीतिक एकता स्थापित की। छोटे-छोटे राज्यों को एकजुट करके एक शासन के अंतर्गत लाया गया।
संगठित प्रशासन और कर व्यवस्था और उन्नत व्यापार प्रणालियाँ विकसित की जो आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बनीं। धर्म और सांस्कृतिक उपलब्धियाँ प्राप्त की। अर्थव्यवस्था और व्यापारिक मार्गों के द्वारा भारत को अन्य सभ्याताओं से जोड़ा गया। इस प्रकार सशक्त प्रशासन, धार्मिक और सांस्कृतिक विकास को भारतीय सभ्यता की मजबूत नींव और पहचान बनाई।
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प्रश्न 3.
राज्य से साम्राज्य बनने में कौन-कौन से तत्व सहायक हुए?
उत्तर:
राज्य से साम्राज्य बनने में सहायक तत्व-
- संसाधन संपन्न भौगोलिक क्षेत्र
- लौह का उपयोग और हथियार निर्माण
- सैन्य शक्ति
- अधिशेष अन्न उत्पादन
- संगठित व व्यवस्थित व्यापार
- सशक्त राजनीतिक नेतृत्व और संबंध
- आर्थिक स्थिरता और मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था मगध और मौर्य साम्राज्यों के उत्थान और विकास में उपर्युक्त तत्वों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रश्न 4.
छठी शताब्दी सा.सं.पू. से दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. तक का जीवन कैसा था?
उत्तर:
छठवीं से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में जीवन:
1. महाजनपद काल और मगध साम्राज्य का उद्य मगध ने महाजनपदों में प्रमुख स्थान हासिल किया। बिम्बिसार और अजातशत्रु जैसे शक्तिशाली शासकों ने साम्राज्य को समृद्ध किया और उसका विस्तार हुआ।
- गंगा नदी के उपजाऊ मैदानों और प्रचुर वन संपदा ने कृषि को उन्नत किया। व्यापार और शिल्पकला में वृद्धि हुई। लौह धातु का इस्तेमाल कृषि, युद्ध कलाओं और तकनीकी परिवर्तनों का मुख्य कारण बना।
- सामाजिक जीवन में सौहार्द बढ़ा। फलते-फूलते व्यापार ने साम्राज्य की आय में बढ़ोत्तरी की।
2. मौर्य साम्राज्य में जीवनः चंद्रगुप्त मौर्य ने भारत को एकजुट किया और अशोक ने पूरे उपमहाद्वीप में अपना शासन फैलाया। चाणक्य के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त ने राजनीति, शासन, अर्थव्यवस्था के ज्ञान का उपयोग कर अत्यधिक सशक्त और समृद्ध साम्राज्य बनाया।
- साम्राज्य में कड़ा प्रशासन और अनुशासन था। प्रजा के हितों को प्राथमिकता दी गई। समाज में सुरक्षा और कानून व्यवस्था थी, जिससे जनता खेती और व्यापार पर पूरा ध्यान दे सकती थी।
- सड़कों, नगरों और व्यापार मार्गों का विकास हुआ।
- अशोक ने अस्पताल, जलाशय और वन संरक्षण से संबंधित योजनाएँ शुरू की थीं। साम्राज्य में सामाजिक सहिष्णुता को प्रोत्साहित किया गया।
- स्तंभों और शिलालेखों के माध्यम से शिक्षा, नैतिकता और धर्म का संदेश आम जनता तक पहुँचाया गया। शिक्षा मुख्य रूप से मठों और गुरुकुलों में होती थी।
आइए विचार करें ( पृष्ठ 97)
प्रश्न 1.
आपके विचार से एलेक्जेंडर संपूर्ण विश्व पर राज क्यों करना चाहता था? इससे वह क्या प्राप्त करना चाहता था।
उत्तर:
एलेक्जेंडर दुनिया पर शासन करना चाहता था क्योंकि वह विश्व विजेता बनना चाहता था। वह अपने पिता फिलिप द्वितीय की विरासत को अपने दम पर बढ़ाना चाहता था। उसकी व्यक्तिगत आकांक्षा अपने पिता से आगे बढ़ने की थी। एलेक्जेंडर ग्रीक दर्शन और संस्कृति को फैलाना चाहता था। फारसी साम्राज्ा ग्रीक शहर, राज्य और मैसेडोनियाई प्रभाव के लिए बड़ा खतरा था। फारस को हराकर एलेक्जेंडर ने फारसी साम्राज्य पर कब्ज़ा करके उसके खजाने का लाभ उठाना चाहता था। राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए भारत के क्षेत्र, धन और संसाधन प्राप्त करना चाहता था। एलेक्जेंडर अपनी सैन्य शक्ति और युद्ध कला को दिखाना चाहता था। उसने युद्ध और विजय को महान बनने का माध्यम माना। ग्रीक सभ्यता का विस्तार किया।
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प्रश्न 2.
कौटिल्य कहते हैं, “एक राजा को अपनी प्रजा के कल्याण को बढ़ावा देकर अपनी शक्ति में वृद्धि करनी चाहिए, क्योंकि शक्ति ग्राम-क्षेत्र से आती है, जो समस्त आर्थिक गतिविधियों का स्रोत है। ( राजा को ) ग्रामीण क्षेत्र में उन लोगों पर विशेष अनुग्रह करना चाहिए, जो लोगों को लाभ पहुँचाने वाले कार्य करते हैं, जैसे-तटबंध या सड़क-पुल बनाना, गाँवों का सौंदर्यीकरण करना अथवा उनकी रक्षा करने सहायता प्रदान करना”
- आपके अनुसार ग्रामीण क्षेत्र का विशेष ध्यान रखना क्यों महत्वपूर्ण था? (संकेत-इस अध्याय के आरंभ में आपने जो पढ़ा है, उस पर पुनः विचार कीजिए।)
उत्तर:
कौटिल्य के अनुसार किसी भी राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी प्रजा और विशेष रूप से उसके ग्रामीण क्षेत्रों से प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि ग्राम (गाँव) ही सभी आर्थिक गतिविधियों और विकास का मूल स्रोंत है। राजा को ग्रामीण समाज के लिए लाभकारी कार्य करने वाले लोगों पर विशेष कृपा करनी चाहिए क्योंकि इससे जीवन सुविधाजनक बनता है।
उत्पादन और व्यापार बढ़ता है और राज्य खुशहाल होता है। जनता ही देश का आधार है। इसलिए राजा का पहला कर्तव्य प्रजा का कल्याण है। कौटिल्य ने तटबंध, सड़क, पुल, जलाशय व अन्य लोक कल्याण कार्यों का बढ़ावा दिया। मौर्य साम्राज्य में यह नीति स्पष्ट दिखती है जो आधुनिक समाज में भी प्रासंगिक है। मौर्य शासकों ने ग्राम प्रशासन, सिंचाई, वन संरक्षण, कृषि पर विशेष ध्यान दिया जिससे प्रजा सुखी हुई और अर्थव्यवस्था फलती-फूलती रही।
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प्रश्न 3.
अशोक ने अपने शिलालेखों में कलिंग युद्ध का उल्लेख किया है। वे चाहते तो इसका उल्लेख न करके भविष्य की पीढ़ियों के समक्ष स्वयं को एक शांतिपूर्ण, परोपकारी राजा के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे। आपके विचार में उन्होंने इस विनाशकारी युद्ध का उल्लेख अपने शिलालेखों में क्यों किया? (पृष्ठ 104)
उत्तर:
अशोक ने अपने शिलालेखों में कलिंग युद्ध का उल्लेख किया क्योंकि यह उनके जीवन में गहरे परिवर्तन का प्रतीक था। उन्होंने अतीत में हुए युद्धों से सबक लेकर “धम्म” के सिद्धांतों को अपनाया। उन्होंने इस प्रकार सच्चाई और पारदर्शिता का परिचय दिया। उनकी ईमानदारी से जनता में एकता और विश्वास की भावना उत्पन्न हुई। युद्ध का उल्लेख यह भी दिखाता है कि सम्राट अशोक ने शक्ति और करुणा का संतुलन बनाया। वे सक्षम शासक होने के साथ-साथ दया व करुणा की भावना भी रखते थे। इस प्रकार कलिंग युद्ध का उल्लेख जागृति, मानवीयता व आत्म परिवर्तन का प्रतीक बन गया।
आइए पता लगाएँ ( पृष्ठ 89)
प्रश्न 1.
साम्राज्य विस्तृत भूभागों में फैले हुए होते थे, जिनमें अनेक प्रकार की भाषाएँ, परंपराएँ और संस्कृतियों वाले जन रहते थे। आपके विचार में सभी लोग सौहार्दपूर्वक रहें, यह सम्राटों ने कैसे सुनिश्चित किया होगा? समूह में विचार-विमर्श करें एवं कक्षा में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
विस्तृत भू-भागों पर फैले साम्राज्य के शासकों ने समानता और न्यायपूर्ण प्रशासन, नैतिक मूल्यों का प्रसार और परंपराओं के सम्मान को महत्व दिया होगा। उदाहरण के लिए सम्राट अशोक ने अपने शिलालेखों के माध्यम से धर्म के सम्मान, सदाचार और संस्कृतिक धरोहर को प्रोत्साहन दिया। अशोक की नीति करुणा, सत्य और सहिष्णुता पर आधारित थी।
इससे हिंदू, बौद्ध और जैन व अन्य समुदाय मिलजुलकर रह सके। मौर्य शासकों ने स्थानीय अधिकारी नियुक्त किए जो स्थानीय परंपराओं व भाषाओं को समझते थे। वाणिज्य और व्यापार मार्गों के विकास ने भूभागों को आपस में जोड़ने का काम किया। इस प्रकार मौर्य और मगध साम्राज्य शासन में धम्म और न्याय को प्रमुखता दी गई।
प्रश्न 2.
एक विशाल साम्राज्य का संचालन करना अनेक प्रकार की कठिनाइयों से भरा होता है, फिर भी कोई राजा अपना राज्य बढ़ाकर सम्राट क्यों बनाना चाहता होगा? नीचे कुछ संभावित उत्तर दिए गए हैं, आप चाहें तो इसमें और भी उत्तर जोड़ सकते हैं।
- ‘संपूर्ण विश्व का शासन’ करने की महत्वाकांक्षा अर्थात् एक बड़े प्रदेश को नियंत्रण में रखना एक ऐसा रूपक है, जिससे संकेत मिलता है कि वह विशाल क्षेत्र पर अधिकार करना चाहता था तथा यह सुनिश्चित करना चाहता था कि भावी पीढ़ियाँ उन्हें याद रखेंगी।
- एक विशाल भू-प्रदेश को अपने अधीन कर, वहाँ के संसाधनों का प्रयोग कर अपनी आर्थिक एवं सैन्य शक्ति बढ़ाने की इच्छा।
- स्वयं एवं अपने साम्राज्य के लिए महान संपदा प्राप्त करने की उत्कंठा। (पृष्ठ 89)
उत्तर:
एक विशाल साम्राज्य को संचालित करना कठिनाइयों से भरा होता है, फिर भी राजा का सम्राट बनने की इच्छा उसकी महत्वकांक्षा और गैरव की भावना को दर्शाती है। सम्राट बनने का उद्दंश्य केवल सत्ता नहीं, बल्कि राज्य और वंश की प्रतिप्ठा भी होती थी। व्यापारिक दृष्टि से प्रभुत्व स्थापित करना और व्यापारिक संसाधनों पर नियंत्रण करना भी था। सत्ता और सुरक्षा के लिए भी राजा अपना राज्य बढ़ाकर सम्राट बनना चाहता होगा ताकि कोई षडयंत्र करके उसकी जगह हथिया ना सके।
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प्रश्न 3.
आपके विचार से शासकों ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए युद्ध के अतिरिक्त दूसरे और कौन-कौन से उपाय अपनाए होंगे? अपने विचार लिखिए और अपनी कक्षा में साझा कीजिए। (पृष्ठ 91)
उत्तर:
युद्ध के अलावा शासक अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाते होंगे-
- राजनीतिक गठबंधन बनाना।
- युद्ध किए बिना समझौते की नीतियों को बढ़ावा देना और अपने राज्य को बढ़ाना।
- धर्म, संस्कृति और कला से अपने प्रभाव और महत्त्व को स्थापित करना।
- शक्तिशाली प्रशासन और सैन्य क्षमता दिखाकर पड़ोसी राज्यों का समर्थन प्राप्त करना।
- पड़ोसी राज्यों से पारिवारिक संबंध बढ़ाना।
- व्यापार और वाणिज्य के माध्यम से कमज़ोर/छोटे राज्यों को अपने अधीन करना।
प्रश्न 4.
व्यापारिक मार्गों के मानचित्र का अवलोकन करें। उन भौगोलिक विशेषताओं की पहचान करें, जिन्होंने व्यापारियों को उपमहाद्वीप में यात्रा करने में सहायता की।
उत्तर:
व्यापारिक मार्गों के मानचित्र का अवलोकन करने पर निम्नलिखित भौगोलिक विशेषताएँ देखी जा सकती है। (नोट-मानचित्र पिछले चित्र 5.2 को देखें)नदियाँ व्यापार के लिए प्राकृतिक मार्ग थीं। ये आसान यातायात और उपजाऊ भूमि तक पहुँच प्रदान करती थीं। उदाहरण के लिए गंगा नदी के द्वारा पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) और बंगाल की खाड़ी के बंदरगाह तक व्यापार संभव हुआ।
सिंधु नदी मध्य एशिया तक व्यापार की सुविधा प्रदान करती थी।
- गोदावरी, कुष्णा नदियाँ दक्षिण भारत में व्यापार को सुगम बनाती थीं और नगरों को तटीय बंदरगाहों से जोड़ती थी।
- पर्वत मार्ग-हिंदू कुश उत्तर-पश्चिप भारत को मध्य एशिया से जोड़ता था। यहाँ से मसाले वस्त्र और पशु ले जाए जाते थे।
- तटरेखा और बंदरगाह-पश्चिमी और पूर्वी तट व्यापार के लिए महत्वपूर्ण थे।
- उत्तरापथ और दक्षिणापथ ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग थे।
इन मार्गों के प्राकृतिक संसाधनों ने व्यापार को उन्नत किया। भारतीय मसाले, पूर्वी तट से मोती और गंगा क्षेत्र से मलमल पश्चिम की ओर निर्यात किए जाते थे। इससे भारतीय व्यापार और संस्कृति का प्रसार हुआ। ताम्रालिप्ता से सामग्रियों को सुदूर पूर्व और सीलोन (श्रीलंका) तक पहुँचाने वाला मुख्य प्राचीन बंदरगाह था। दक्षिणापथ हिमालय की तलहटी में श्रावस्ती से शुरू होकर दक्कन के प्रतिष्ठान में समाप्त होता था। सड़कें प्रतिष्ठान को अरब सागर के किनारे व्यापारिक बंदरगाह और पश्चिम में द्वारका से जोड़ती थीं।
प्रश्न 5.
उन सड़कों पर तत्कालीन समय में परिवहन के कौन-कौन से साधन उपलब्ध रहे होंगे? अनुमान लगाएँ।
उत्तर:
- उत्तरापथ और दक्षिणापथ लंबी दूरी के व्यापारिक मार्ग थे। परिवहन के साधन निम्नलिखित होंगे-
- बैलगाड़ी. घोड़ागाड़ी और ऊँटों का प्रयोग व्यापार और यात्राओं के लिए उपलब्ध रहते थे।
- घोड़े, हाथी तेज़ यात्रा, संना, संदेशवाहक यात्रा और राजसी यात्राओं के लिए सहायक होते थे।
- तीर्थ यात्री पैदल यात्रा के साथ-साथ बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी का प्रयोग करते थे।
- नावों और जहाज़ों का प्रयोग नदी या जलमार्गों पर किया जाता था।
प्रश्न 6.
निम्न शिल्प-पट्टिका का सूक्ष्म अवलोकन करें। आप इनमें कितने प्रकार के शस्त्रों की पहचान कर सकते हैं? आपको लोहे के कौन-कौन से उपयोग दिखाई देते हैं? ( पृष्ठ 94)

उत्तर:
सम्राट अशोक द्वारा निर्मित सांची के स्तूप की विस्तृत पट्टिका में प्राचीन भारतीय राजाओं की चार अंगों वाली सेना को दर्शाया गया है, जिसमें हाथी, घुड़सवार, रथ और पैदल सेना शामिल है। सैनिक तलवार, भाला, ढाल, धनुष-बाण और गदा या कुल्हाड़ी लिए दिखाई देते हैं। ये दृश्य प्राचीन भारत की सैन्य व्यवस्था और शक्ति को प्रकट करते हैं।
सांची स्तूप की शिल्प पट्टिका पर विभिन्न हथियार दिखाई देते हैं, जो लोहे से बने माने जाते हैं। ये भारतीय समाज में लोहे के महत्व को दर्शाते हैं। लौहे का उपयोग सिर्फ हथियारों/सैन्य उपकरणों में नहीं, बल्कि कृषि, व्यापार, निर्माण, सुरक्षा उपकरण, धातु कला और रोजमर्रा के औजारों में भी व्यापक रूप से किया जाता था।
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प्रश्न 7.
शिल्प-पट्टिका के बाएँ भाग में कलश के ऊपर एक छत्र रखा हुआ है, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे हैं। आपके विचार में ऐसा क्यों किया गया होगा? ( पृष्ठ 94)
उत्तर:
सांची स्तूप की शिल्प-पट्टिका में कलश के ऊपर रखा गया छत्र बुद्ध के अवशेषों के साथ एक गहरी आस्था, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता का प्रतीक है। कलश में बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखा गया था, जो उनकी उपस्थिति और प्रभाव को बनाए रखता है। छत्र पवित्रता, सम्मान और उच्च आध्यात्मिक स्थान को दर्शाता है।
प्रश्न 8.
जब युद्ध के उपरांत एलेक्जेंडर ने राजा पुरु से पूछा कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाए, तब पुरु ने उत्तर दिया- “एक राजा की तरह”। इस उत्तर से प्रभावित होकर एलेक्जेंडर ने उन्हें उनके ही राज्य का क्षत्रप नियुक्त कर दिया। अपने शिक्षकों की सहायता से राजा पुरु और एलेक्जेंडर के मध्य हुए युद्ध के विषय में और अधिक विवरण प्राप्त करें। अपने शोध के साथ-साथ अपनी कल्पनाशक्ति का उपयोग करते हुए इस युद्ध दृश्य का नाट्य मंचन करें। ( पृष्ठ 97)
उत्तर:
एलेक्जेंडर और पोरस के बीच युद्ध-
- युद्ध की पृष्ठभूमि-यह युद्ध 326 ई.पू. में झेलम नदी (हाइडेस्पेस) के किनारे लड़ा गया था।
- पोरस की सेना में हाथी, रथ, घोड़े और पैद्ल सेना थी। पोरस की हाथी सेना काफी शक्तिशाली थी। सिकंदर की सेना प्रशिक्षित थी और संख्या में बड़ी थी परंतु वे युद्ध हाथियों से भयभीत थे।
- सिकंदर ने कई दिनों तक नदी पार करने का नाटक किया ताकि पोरस असावधान हो जाए। पोरस ने रथों को आगे रखा और 15-15 मीटर की दूरी पर हाथी सेना को तैनात किया। युद्ध भीषण था, जिसमें सिकंदर का प्यारा घोड़ा बुसेफालस मारा गया। दोनों ओर से भारी हानि हुई और अंततः पोरस पराजित हुआ।
- युद्ध के उपरांत एलेक्जेंडर ने राजा पुरु से पूछा कि उसके साथ कैसा व्यवहार हो, तब पुरु ने साहसपूर्वक एलेक्जेंडर के सामने खड़ा रहा और उत्तर दिया-“एक राजा जैसा।” इस उत्तर से प्रभावित होकर सिकंदर ने राज्य लौटा दिया और राजा पुरु को क्षत्रप नियुक्त कर दिया।
- यद्यपि एलेक्जेंडर ने सामरिक जीत हासिल की, किंतु राजनीतिक दृष्टि से वह ठहरा। राजा पुरु के मजबूत प्रतिरोध को देखते हुए, एलेक्जेंडर की सेना को भारत में आगे बढ़ने की योजना बदलनी पड़ी और वापसी शुरू की। विद्यार्थीगण युद्ध दृश्य का नाट्य मंचन करेंगे।
प्रश्न 9.
अपनी कक्षा में एक सामूहिक चर्चा आयोजित करें और कौटिल्य के साम्राज्य के प्रति विचारों की विशेषताओं की तुलना आधुनिक राष्ट्र से करें। ( पृष्ठ 103)
उत्तर:
- कौटिल्य का अर्थशास्त्र जिस सुशासन अर्धिक नीतियों, संतुलन और जनकल्याण की बात करता है, उसी दर्शन को आधुनिक भारत ने लोकतांत्रिक रूप में अपनाया है। राष्ट्र की समृद्धि और जनकल्याण सर्वोपरि हैं। कौटिल्य की सप्तांग सिद्धांत की राजनीतिक अवधारणा आधुनिक राष्ट का भी बुनियादी दर्शन है।
- कौटिल्य के समय राजा सर्वोच्च था और आधुनिक राष्ट्र में जनता सर्वोच्च है। जनता के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री सरकार/शासन चलाते हैं।
- पार्षदों, अमात्य (मंत्री व अधिकारी) प्रशासन संभालते थे और आज मंत्रिपरिषद व प्रशासनिक अधिकारी प्रशासन संभालते हैं।
- राजकोष या राज्य की संपत्ति को सही दिशा में उपयोग करना राजा का कर्तव्य माना गया। आज सरकार में वित्त मंत्रालय, बैंकिंग (RBI) संस्थान आर्थिक नीतियाँ और कर प्रणाली बनाते हैं।
- कौटिल्य के अनुसार सुसंरक्षित राज्य के लिए सशक्त सेना, किलेबंद कस्बे और दुर्ग निर्माण आवश्यक है। आधुनिक राष्ट्र में सेना, नौसेना व वायुसेना राष्ट्र की रक्षा करती है।
- मित्र राज्य और राजनयिक संबंधों को बनाना जिससे राष्ट्र सुदृढ़, समृद्ध और विकसित हो। आज की विदेश नीति/कूटनीति में यह प्रभाव दिखता है। जैसे-G20, BRICS और पड़ोसी देशों के साथ सहयोग।
- कौटिल्य ने भ्रष्टाचार नियंत्रण, दंड व्यवस्था, कानून व्यवस्था पर जोर दिया, वही आधुनिक भारत में लोकतांत्रिक भारत के कानून, न्यायपालिका और जन-कल्याणकारी योजनाओं में दिखाई देता है।
प्रश्न 10.
अशोक ने अपने एक अभिलेख में अपने अधिकारियों के आचरण संबंधित विस्तृत निर्देश दिए हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने की व्यवस्था की कि अधिकारी निष्पक्षता से कार्य करें। निम्नलिखित अनुवाद को पढ़िए और बताइए कि क्या ये उपाय साम्राज्य के प्रबंधन में सहायक सिद्ध हुए होंगे? यदि हाँ, तो कैसे?
‘देवानामपिय’ के आदेशानुसार-अधिकारियों और नगर न्यायाध्यक्षों को यह निर्देश दिया गया है-(…) तुम लोग अनेक सहस्त्र प्राणियों के ऊपर नियुक्त किए गए हो। तुम्हें मनुष्यों का स्नेह अर्जित करना चाहिए। सब मनुष्य मेरी संतान के समान हैं। जिस तरह मैं चाहता हूँ कि मेरी संतान इस लोक और परलोक दोनों में मंगल और सुख प्राप्त करे, उसी तरह मैं सब मनुष्यों के लिए कामना करता हूँ। (…) तुम्हें निष्पक्षता से न्याय करना चाहिए। (…) इन सबका मूल क्रोध का त्याग और धैर्य का पालन है। (… ) यह लेख यहाँ इसलिए लिखवाया गया है कि नगर के न्याय शासक हमेशा सावधान रहें कि मनुष्यों को कभी अकारण कैद या यातना न दी जाए। (…) और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु मैं प्रत्येक पाँचवें वर्ष एक नम्र और दयालु महामात्र भंजूँगा जो इसकी खोज करने के बाद…, यह देखेगा कि मेरे आदेशों का पालन किया जाता हैं या नहीं।” ( पृष्ठ 107)
उत्तर:
अशोक का शासन अपने काल में अत्यंत प्रभावी रहा होगा। निष्पक्षता, नियमित जाँच निरीक्षण, जन-कल्याण को बढ़ावा मिला होगा जिसके परिणामस्वरूप प्रशासन में ईमानदारी, न्याय और सुरक्षा का वातावरण फला-फूला। अशोक के धम्म के सिद्धांतों ने अलग-अलग क्षेत्रों में एकता और नैतिकता की भावना को मजबूत किया। अशोक की कार्य प्रणाली ने स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता व स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया होगा। अशोक की नीतियाँ पारदर्शी और प्रभावशाली सिद्ध हुई और आज भी महत्वपूर्ण हैं।
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प्रश्न 11.
एक इतिहासकार के रूप में अगले पृष्ठ पर प्रस्तुत कलाकृतियों को ध्यान से देखें। मौर्य युग के लोगों और जीवन के बारे में आप इनसे क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? ( पृष्ठ 109)




उत्तर:
- मौर्य युग की कलाकृतियों से स्पष्ट होता है कि लोग धर्म, कला प्रशासन और समाज में रुचि रखते थे। समाज समृद्ध और कला के प्रति जागरूक था। धार्मिक विश्वासों का प्रभाव जनता के दैनिक जीवन, कला में स्पष्ट दिखाई देता है। मौर्य काल की कला और वास्तुकला ने भारतीय संस्कृति व सभ्यता की सशक्त नींव रखी जो आने वाली शताब्दियों में विकसित हुई।
- सारनाथ का स्तंभ धार्मिक आस्था और नैतिकता का प्रतीक है। स्तंभ पर बने चार सिंह शक्ति, साहस और एकता को दर्शाते हैं।
- सांची का स्तूप और अशोक द्वारा निर्मित चैत्य और विहार लोगों के लिए आराधना और अध्ययन के केंद्र थे।
- टेराकोटा की मूर्तियाँ लोगों के जीवन की कला, संगीत, नृत्य और उत्सवों में रुचि को दर्शाती हैं।
- मौर्य सिक्के और पॉलिश किए हुए स्तंभों से पता चलता है कि व्यापार और आर्थिक गतिविधियाँ और नगर जीवन खुशहाल था। घोड़े वह अन्य शक्तिशाली पशुओं की कलाकृतियाँ शक्तिशाली सेना और मजबूत राज्य सुरक्षा को उजागर करती हैं।
मौर्य समाज प्रशासन, व्यापार और सैन्य शक्ति में संगठित और उन्नत था।
प्रश्न 12.
नीचे दर्शाए गए सिक्कों के अलग-अलग चिह्नों पर ध्यान दीजिए। इन चिह्नों का अर्थ क्या हो सकता है, क्या आप अनुमान लगा सकते हैं?

चित्र 5.22.
(A) मौर्यकालीन आहत (पंचमार्क) सिक्कों का एक संग्रह चित्र 5.21
(B) अशोक का एक आहत सिक्का ( पृष्ठ 112)
उत्तर:
- मौर्य सिक्कों के चिह्न साम्राज्य की शक्ति, धार्मिक संरक्षण, व्यापारिक सुव्यवस्था और आर्थिक उन्नति को उजागर करते हैं।
- सिक्कों के चिह्न मौर्य काल और संस्कृति को दिखाते हैं।
- हाथी, बैल जैसे जानवरों के चिह्न राजसी शक्ति का प्रतीक थीं।
- छोटी आकृतियाँ व्यापारिक गिब्ड्स (संगठन) से जुड़े संकेत थे।
- सूर्य के प्रतीक धर्म और बौद्ध संरक्षण को दर्शाते हैं। तीरंदाजी के चिह्न सैन्य शक्ति की पहचान थे।
इसे अनदेखा न करें ( पृष्ठ 94)
प्रश्न 1.
विश्व के दो महान धार्मिक व्यक्तित्व सिद्धार्थ गौतम जो आगे चलकर ‘बुद्ध’ तथा वर्धमान जो ‘महावीर’ के नाम से प्रसिद्ध हुए, दोनों ही मगध सम्राट अजातशत्रु के समकालीन थे। इनकी शिक्षाओं को पुनः पढ़ने हेतु कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक के ‘भारत की सांस्कृतिक जड़ें’ अध्याय का पुनरावलोकन करें।
उत्तर:
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मगध में बुद्ध और महावीर ने अपने विचारों से समाज को प्रभावित किया। बुद्ध ने चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग के माध्यम से दुख और उसके समाधान का रास्ता दिखाया। वे मध्यमार्ग के जरिए दुख को कम करने की बात करते थे। महावीर का जैन धर्म अहिंसा, संयम और सच्चाई पर जोर देता था।
बौद्ध और महावीर ने वैदिक अनुष्ठानों के विकल्प प्रस्तुत किए और व्यापारियों और यात्रियों में अपनी शिक्षाओं से लोकप्रिय हुए। उनकी विचारधारा, धार्मिक शिक्षाएँ मगध के शासकों जैसे अजातशत्रु के संरक्षण में विकसित हुई। इस प्रकार साम्राज्य और आध्यात्मिकता के बीच जुड़ाव ने भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को आकार दिया।
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प्रश्न 2.
फारसी और ग्रीक साम्राज्यों में प्रांतों के शासक क्षत्रप थे, जिन्हें सम्राट (जैसे-एलेक्जेंडर) ने सुदूर प्रदेशों का प्रबंधन करने के लिए पीछे छोड़ दिया था। मात्र अधिकारी होने के बावजूद इन क्षत्रपों के पास महत्वपूर्ण शक्ति और स्वतंत्रता थी। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि उनके लिए इतनी शक्ति का प्रयोग करना कैसे संभव था? ( पृष्ठ 97)
उत्तर:
एलेक्जेंडर ने विशाल साम्राज्य में दूरस्थ क्षेत्रों का प्रबंधन करने के लिए क्षत्रपों को पर्याप्त शक्ति और स्वतंत्रता दी। वे क्षेत्र की सेना, आर्थिक कर प्रणाली और न्याय पर नियंत्रण रखते थे। स्थानीय क्षत्रप और अधिकारी अपने क्षेत्र की संस्कृति, भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या और आवश्यकताओं का ज्ञान रखते थे और इनसे जुड़ी समस्याओं के उपाय निकालते थे।
इससे सही समय पर निर्णय लेना और स्थिरता का तालमेल बना रहता था। किंतु इसके दुष्परिणाम भी सामने आए। एलेक्जेंडर को विद्रोह और राजनीतिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ा। उसकी बीमारी और मृत्यु के कारण विशाल साम्राज्य क्षत्रपों और सेनापतियों के बीच विभाजित हो गया, जिन्होंने अपने स्वतंत्र राज्य प्राप्त कर लिए।
साम्राज्यों का उदय Class 7 Question Answer in Hindi
Class 7 Samajik Vigyan Chapter 5 Question Answer
प्रश्न 1.
साम्राज्य की विशेषताएँ क्या हैं और यह राज्य से किस प्रकार भिन्न है? इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
साम्राज्य का अर्थ है सवोंच्च सत्ता। साम्राज्य अनेक छोटे-छोटे राज्यों अथवा क्षेत्रों का एक संघ होता था। इन छोटे व कमज़ोर राज्यों को जीतकर, उन पर एक शक्तिशाली शासक शासन करता था। छोटे क्षेत्रों के राजा, अधिकारी सभी सम्राट के अधीन होते थे और सम्राट आर्थिक व प्रशासनिक दृष्टि से समृद्ध अपनी राजधानी से संपूर्ण साप्राज्य का संचालन करता था।
अधीन राजा या मुखिया अपने सम्राट के प्रति निष्ठावान रहकर अपने-अपने क्षेत्रों का शासन संभालते थे। सीमा क्षेत्रों और महत्वपूर्ण स्थानों पर सुरक्षा के लिए दुर्ग वाले नगर बसाए जाते थे। साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा के लिए सम्राट प्रशिक्षित सैनिकों को भेजता था। नदियों और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण कर, सम्राट संसाधनों और आर्थिक स्थिति को समृद्ध करता था।
प्रश्न 2.
राज्यों से साग्राज्यों में परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण कारक क्या हैं?
उत्तर:
राज्यों से साप्राज्यों में परिवर्तन के महत्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं-
- राजनीतिक कारक-छोटे-छोटे जनपद (राज्य) आपसी युद्ध में लिप्त रहने लगे, तब शक्तिशाली शासकों ने राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया।
उदाहरण-मगध-विबिसार और अजातशत्रु ने आस-पास के जनपदों को जीतकर मगध साम्राज्य का उदय किया। - आर्थिक कारक-मगध में गंगा घाटी की उपजाक भूमि, लौह के स्रोत और महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग थे। यह साम्राज्य की शक्ति व संपन्नता का आधार बना।
- प्रशासनिक कारक-मौर्य साग्राज्य में चंद्रगुप्त मौर्य ने कौटिल्य की सहायता से संगठित प्रशासन बनाया। आगे चलकर सम्राट अशोक के समय यह एक विशाल केंद्रीकृत साम्राज्य बन गया, जो पूरे उपमहाद्वीप में फैला।
- मजबूत नेतृत्व-सबल, दूरदर्शी और शक्तिशाली शासक राज्यों से विशाल साम्राज्य के बनने में अहम भूमिका निभाते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य. कौटिल्य, अशोक इसके उदाहरण हैं।
- संचार तंत्र (राजमार्ग, नदी, सड़कें, नौवहन), संसाधनों, कला-साहित्य और तकनीकी विकास साम्राज्य को विकसित करने में विशेष भूमिका निभाता है।
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प्रश्न 3.
एलेक्जेंडर को विश्व इतिहास में एक महान शासक माना जाता है, आपके विचार से ऐसा क्यों है?
उत्तर:
एलेक्जेंडर को महान शासक माना जाता है; इसके निम्न कारण हैं-
- विशाल साम्राज्य और विजय अभियान- 30 वर्ष की आयु तक एलेक्जेंडर ने इतिहास के बड़े साम्राज्यों में से एक की स्थापना की। उसको महान सैन्य रणनीतिकार माना जाता है। उसका साम्राज्य ग्रीक और मैसेडोनिया से शुरू होकर मिस्र, सीरिया, फारस, अनातोलिया, ईराक, गांधार से होते हुए भारत के उत्तर-पशिचमी भागों तक फैला।
- ग्रीक संस्कृति का प्रसार-एलेक्जेंडर ने ग्रीक (यूनानी) भाषा, कला, वास्तुकला और विचार/दर्शेन का प्रसार किया। ग्रीक और पूर्व सभ्यताओं के मिश्रण से हेलेनिस्टिक सभ्यता का विकास हुआ, जिसने बाद की सभ्यताओं जैसे रोमन साम्राज्य को गहराई से प्रभावित किया।
- उसकी युद्धनीतियाँ जैसे फैलैन्क्स (Phalanx) और संयुक्त युद्धक रणनीति महत्वपूर्ण थीं। एलेक्जेंडर केवल अपनी विजयों से नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के कारण भी महत्वपूर्ण है। उसने पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु का कार्य किया और विश्व इतिहास की दिशा बदली।
प्रश्न 4.
प्रारंभिक भारतीय इतिहास में मौर्य वंश को महत्वपूर्ण माना जाता है। कारण बताएँ।
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य (लगभग 322 ई.पू. से 185 ई.पू.) को भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है, इसके कारण इस प्रकार हैं-
- अखिल भारतीय साम्राज्य-मौर्य ने लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक शासन के अंतर्गत एकीकृत किया।
नोट-मानचित्र 5.1 देखें। - संगठित प्रशासनिक व्यवस्था-चंद्रगुप्त और कौटिल्य ने सशक्त और केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। अर्थशास्त्र में इसका विवरण प्राप्त होता है। प्रशासनिक तंत्र प्रभावशाली था।
- आर्थिक उन्नति-व्यापार मार्गों और कृषि पर नियंत्रण रहा। स्थल (भूमि) और समुद्री व्यापार विकसित था।
- लोक-कल्याण और निर्माण कार्य-सड़कों, राजमार्गों, सिंचाई व्यवस्था और अस्पताल बनवाए गए।
- सांस्कृतिक और ऐतिहासिक योगदानअशोक के शिलालेख और स्तंभलेख भारत के सबसे प्राचीन लिखित अभिलेखों में से हैं, जो उस समय के समाज, शासन और नैतिक मूल्यों की जानकारी देते हैं।
- विदेश नीति-मौर्य साम्राज्य ने ग्रीक संस्कृति के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए जिससे भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ी। सम्राट अशोक और उनके वंशजों ने बौद्ध धर्म को विश्व धर्म के रूप में स्थापित किया।
प्रश्न 5.
कौटिल्य के कुछ प्रमुख विचार क्या थे? इनमें से कौन-से विचार आप आज भी आस-पास देख सकते हैं?
उत्तर:
कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध रचना अर्थशास्त्र में राज्य की स्थापना, प्रबंधन, प्रशासन और सुदृढ़ीकरण के विचार और सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने अर्थशास्त्र, रक्षा, न्याय व्यवस्था, नगर-निर्माण, कृषि व संचार व्यवस्था और लोक कल्याण जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण दिशा निर्देश दिए हैं। कौटिल्य के सप्तांग सिद्धांत आधुनिक समय में भी प्रासंगिक हैं।

कौटिल्य के सिद्धांत और विचार सशक्त शासन और उसके भिन्न अंगों के संतुलन को सिखाता है। यही संतुलन आज के लोकतांत्रिक शासन की नींव है। कौटिल्य के शासन का मूल दर्शन भारतीय मूल्यों के अनुरूप है।
प्रश्न 6.
अशोक और उसके साम्राज्य के बारे में असाधारण बातें क्या थीं? उनमें से कौन-सी बातें आज भी भारत को प्रभावित करती रही हैं और क्यों? अपने विचार लगभग 250 शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
अशोक को ‘महान संचारक’ भी कहा जाता है। उन्होंने अपने साम्राज्य में चट्टानों और स्तंभों पर शिलालेख बनवाए थे। इन शिलालेखों में जनता के लिए प्रेरणादायी संदेश थे। ये शिलालेख धर्म और नैतिक मूल्यों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ज्यादातर शिलालेख प्राकृत भाषा (ब्राह्मी लिपि) में लिखे गए। यह लिपि आज भारत की सभी क्षेत्रीय लिपियों की जननी मानी जाती है। अशोक ने भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी भाग के कुछ भागों को छोड़कर संपूर्ण भू-भाग में अपने महान साम्राज्य को विस्तृत किया।
इसमें वर्तमान अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश सम्मिलित थे। एक शिलालेख में अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म और शिक्षा के मार्ग को अपनाने का वर्णन मिलता है। अशोक ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, थाईलैंड, मध्य एशिया और यूरोप तक दूत भेजकर, उसका प्रसार किया। अशोक ने समग्र कल्याण का मार्ग अपनाया। अपने साम्राज्य के बाहर भी समाज में चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाई। प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण को प्रमुखता दी। सड़कों, विश्रामगृहों, कुएँ निर्माण और वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया। इस प्रकार कौटिल्य के शासन-दर्शन के अनुरूप अशोक ने अपने साम्राज्य में प्रजा के कल्याण के लिए कार्य किए। अशोक का योगदान आज भी भारतवर्ष में प्रभावकारी है।
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देवताओं के प्रिय राजा पियदसी कहते हैं- मेंर धम्माधिकारी सार्वजनिक लाभ के लिए अनेक विषयों में व्यस्त हैं। वे सभी संप्रदाओं के सदस्यों, तपस्वियों और गृहस्थों दोनों के बीच व्यस्त हैं। मैंने कुछ को बौद्ध संघ, ब्राह्मणों और आजीवकों… जैनियों…..और विभिन्न संप्रदायों के लिए नियुक्त किया है। अधिकारियों की अनेक श्रेणियाँ हैं और उनके कई प्रकार के कर्तव्य हैं। मेंर धम्माधिकारी इन और अन्य संप्रदायों के विषयों में व्यस्त हैं।
प्रश्न 7.
अशोक के उपरोक्त शिलालेख को पढ़ने के उपरांत, क्या आपको लगता है कि वे अन्य धार्मिक विश्वासों और विचारधाराओं के प्रति सहिष्णु थे? अपने विचार कक्षा में साझा कीजिए।
उत्तर:
अशोक के शिलालेख को पढ़ने के बाद उनके धार्मिक दृष्टिकोण और सहिण्गुता के बारे में निम्नलिखित बिंदु हैं-
- धार्मिक सहिष्णुता-अशोक ने विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के प्रतिनिधियों को समान रूप से महत्व दिया जैसे-बौद्ध. ब्राह्यण, जैन आदि।
- सामाजिक समरसता-अशोक ने धर्म और सामाजिक वर्ग के भेदभाव को कम करने का प्रयास किया।
- धम्म का पालन-उनके धम्माधिकारी यह दर्शाते हैं कि वे नैतिकता. सहिण्गुता को कल्याण का प्रशासन का हिस्सा मानते थे।
- सकारात्मक दृष्टिकोण-उनका दुष्टिकोण संघर्ष या विरोध की जगह संवाद और सहयोग पर आधारित था।
प्रश्न 8.
ब्राद्मी लिपि एक लेखन प्रणाली थी जिसका प्राचीन भारत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। इस लिपि के बारे में अधिक जानने का प्रयास कीजिए। जहाँ भी आवश्यक हो, अपने शिक्षक से सहायता लीजिए। एक लघु कार्य परियोजना बनाएँ और इस दौरान आपने ब्राहुमी लिपि के बारे में जो कुछ भी सीखा, उसे संलग्न कीजिए।
उत्तर:
ब्राह्मी लिपि प्राचीन भारत की प्रमुख लेखन प्रणाली थी। इसे शिलालेखों, अभिलेखों और मुद्राओं पर अंकित किया जाता था।
- उत्पत्ति: इसका प्रयोग लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से शुरू हुआ। अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं।
- विशेषताएँ: अक्षर सरल रेखाओं और घुमावों से बनते थे। स्वर और व्यंजन अलग-अलग चिह्नों से लिखे जाते थे। यह लिपि आज भी हमारी क्षेत्रीय भाषाओं के इतिहास और विकास को दर्शाती है और भारत के भाषाई और सांस्कृतिक इतिहास की धरोहर है।
ब्राह्मी लिपि के कुछ अक्षर

प्रश्न 9.
मान लीजिए कि आपको तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. में कौशांबी से कावेरीपट्टनम की यात्रा करनी है। आप यह यात्रा कैसे करेंगे? इस यात्रा के दौरान आप कहाँ-कहाँ ठहरेंगे और आपको इसमें कितना समय लगेगा?
उत्तर:
कौशांबी → कावेरीपट्टनम यात्रा (तीसरी शताब्दी सा.सं.पू.) मध्य भारत मार्ग यात्रा और ठहराव
- कौशांबी से प्रारंभ → मधुरा (पहला ठहराव) मधुरा में 2-3 दिन का विश्राम और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों का दर्शन।
- लौधिका / उत्तरी मध्य भारत (दूसरा ठहराव) लौधिका में 2-3 दिन का विश्राम। नदी पार और व्यापारिक मार्ग।
- अर्वांतपुग (उज्जैन) विदिशा (तीसरा ठहराव) यहाँ 2-3 दिन का विश्राम। मार्ग में ऐतिहासिक स्थान और सांस्कृतिक केंद्र।
- संधिपुर/कांचीम/पांडय क्षेत्र ( चौथा ठहराव) दक्षिण भारत में प्रवेश, जलमार्ग और वन मार्ग 3-4 दिन का विश्राम।
- कावेरीपट्टनम (गंतव्य स्थान)
- व्यापारिक बंदरगाह, जलपोत मार्ग इस यात्रा में लगभग 2-3 महीने लग सकते हैं। यह उत्तर से दक्षिण तक मध्य भारत से होते हुए कावेरीपट्टनम तक जाने वाला मार्ग है। यह व्यापारिक और धार्मिक यात्रा के लिए उपयुक्त मार्ग था। यह बौद्ध भिक्षुओं द्वारा भी इस्तेमाल किया जाता था। विदिशा और कांचीपुरम के बीच बौद्ध प्रभाव के प्रमाण सांची, अमरावती आदि स्थल मिलते हैं। नोट-मानचित्र 5.2 देखें।
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