Thursday, 12 March 2026

Class 7 SST Chapter 11 Question Answer in Hindi वस्तु विनिमय से मुद्रा तक

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Class 7 Social Science Chapter 11 Question Answer in Hindi वस्तु विनिमय से मुद्रा तक

वस्तु विनिमय से मुद्रा तक Question Answer in Hindi

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 11 के प्रश्न उत्तर वस्तु विनिमय से मुद्रा तक

प्रश्न 1.
मुद्रा प्रचलन से पहले विनिमय कैसे होता था? ( पृष्ठ 229)
उत्तर:
मुद्रा के प्रचलन से पहले, लोग ‘वस्तु विनिमय प्रणाली’ के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान करते थे। इस प्रणाली में एक वस्तु का सीधे दूसरी वस्तु से विनिमय किया जाता था, जैसे कि अनाज के बदले अनाज या अनाज के बदले किसी बुनकर से कपड़ों का विनिमय कर सकते थे।

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प्रश्न 2.
मुद्रा प्रचलन में क्यों आई?
उत्तर:
मुद्रा का प्रचलन विनिमय को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए आया। वस्तु विनिमय में कुछ समस्याएँ थीं, जैसे कि ‘आवश्यकताओं के दोहरे संयोग’ की कमी, जिसमें दोनों पक्षों के पास ऐसी वस्तुएँ होना जरुरी था जिनकी उन्हें एक-दूसरे से आवश्यकता हो। मुद्रा ने विनिमय के माध्यम, मूल्य के मापन और क्रय शक्ति के संचय का कार्य किया, जिससे व्यापार और लेन-देन आसान हो गया।

प्रश्न 3.
समय के साथ मुद्रा विभिन्न रूपों में कैसे परिवर्तित हुई? (पृष्ठ 229)
उत्तर:
समय के साथ मुद्रा ने विभिन्न रूपं लिए हैं, जो मानव सभ्यता की आर्थिक और तकनीकी प्रगति को दर्शाते हैं। मुद्रा का विकास वस्तु विनिमय प्रणाली से शुरू हुआ और फिर धीरे-धीरे अन्य रूपों में विकसित हुआ-

  • वस्तु विनिमय प्रणाली-शुरुआती दौर में लोग वस्तुओं और सेवाओं का सीधे आदान-प्रदान करते थे।
  • धातु के सिक्के-इसके बाद सोने, चाँदी और ताँबे जैसी धातुओं के सिक्कों का उपयोग किया जाता था।
  • कागज़ी मुद्रा-धातुओं के भारीपन और असुरक्षा को देखते हुए कागज़ी नोटों का प्रचलन बढ़ा।
  • प्लास्टिक मुद्रा-क्रेडिट और डेबिट कार्ड के रूप में प्लास्टिक मुद्रा का उपयोग शुरू हुआ।
  • डिजिटल मुद्रा-वर्तमान में, इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल वालेट और क्रिप्टो करेंसी जैसे डिजिटल रूपों का प्रचलन बढ़ रहा है।

आइए विचार करें (पृष्ठ 232)

प्रश्न 1.
दिए गए उदाहरण की स्थिति में आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर:

  • आवश्यकताओं का द्विसंयोग-ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना जिसको बैल की आवश्यकता हो और बदले में जूते, दवाई और कपड़े दे सकें।
  • विभाज्यता की कमी-अलग-अलग वस्तुओं के विनिमय में बैल को विभाजित नहीं कर सकते।
  • वस्तुओं का खराब होना-गेहूँ को अधिक समय तक संगृहीत नहीं किया जा सकता, क्योंकि गेहूँ सड़ सकता है या चूहे इसे खा सकते हैं।
  • भण्डारण की समस्या-इसे लम्बे समय तक भण्डारित नहीं किया जा सकता है, खराब होने की सम्भावना होती है।
  • सुवाह्यता की समस्या-गेहूँ जैसी भारी चीज़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना एक जटिल प्रक्रिया है, जिससे समय और शक्ति अधिक लगती है।

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प्रश्न 2.
(क) उपर्युक्त उदाहरण में आवश्यकताओं के द्विसंयोग के क्या उदाहरण ( दृष्टांत ) हैं? (पृष्ठ 233)
उत्तर:
किसान को जूते, स्वेटर और दवाइयों की आवश्यकता है, परंतु विनिमय के लिए केवल बैल ही उसके पास है। उसे एक ऐसे व्यक्ति की बहुत आवश्यकता है।

  • जिसे बैल की आवश्यकता हो
  • जिससे वह यह तीनों वस्तुएँ ले सके।

(ख) उपर्युक्त स्थिति में वे कौन-से मामले हैं जहाँ आपको मूल्य के सामान्य मानक माप की कमी का सामना करना पड़ सकता है? (पृष्ठ 233)
उत्तर:
बैल के सापेक्ष जूते, गेहूँ और दवाइयों आदि की कोई निर्धारित कीमत नहीं है। व्यक्तिपरक बातचीत अनुचित आदान-प्रदान को जन्म देती है जैसे-एक बैल की कीमत में 10 बोरे गेहूँ आएगा या 15 बोरे।

प्रश्न 3.
ऐसे कुछ उपाय सुझाइए जिससे मुद्रा के प्रयोग द्वारा किसान की स्थिति को सरल बनाया जा सके? (पृष्ठ 233)
उत्तर:

  • विनिमय का माध्यम-वस्तुओं को सीधे वस्तु विनिमय के बिना खरीदना।
  • मूल्य का भंडार-सामान खराब हुए बिना पैसे बचाना।
  • विभाज्यता-छोटी खरीददारी के लिए छोटे मूल्यवर्ग का उपयोग करना।
  • सुवाह्यता-भारी सामान के बजाय कम वजन की मुद्रा का प्रयोग।

प्रश्न 4.
मान लीजिए कि आपको एक पुस्तक खरीदनी है। आपकी जेब में ₹ 50 हैं। आप अपने पड़ोस की पुस्तक की दुकान पर जाते हैं और वहाँ दुकानदार आपको पुस्तक की कीमत ₹ 100 बताता है। आपके पास आज पुस्तक खरीदने के क्या विकल्प हैं? क्या आप दुकानदार को शेष भुगतान बाद में करने की अनुमति देने का अनुरोध करेंगे? ( पृष्ठ 237)
उत्तर:
हाँ, मैं दुकानदार से अनुरोध करुँगा कि वह मुझे किताब दे दे और मैं उसे बाकी की धन राशि अगले दिन चुका दूँगा। क्योंकि उस दिन मेरे लिए किताब खरीदना जरूरी है। यहाँ पर मुद्रा को भविष्य में भुगतान करने का एक माध्यम के रूप में माना जाएगा।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 231)

प्रश्न 1.
कल्पना कीजिए कि आप एक किसान हैं और जहाँ आप रहते हैं, वहाँ लोग वस्तु विनिमय प्रणाली का प्रयोग करते हैं। आपको यहाँ अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता है, जैसे-एक जोड़ी नए जूते, एक स्वेटर और अपनी दादी के लिए दवाइयाँ। परंतु आपके पास देने के लिए केवल एक बैल है।
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इस बैल का विनिमय करके आप कैसे विभिन्न प्रकार की आवश्यक वस्तुओं को विभिन्न लोगों एवं स्थानों से प्राप्त करेंगे? इसमें आपको किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है?
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उत्तर:
हमें किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा जिसे बैल चाहिए और जिसके पास ठीक वही सब सामान उपलब्ध हो, जिनकी हमें आवश्यकता है। ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना मुशिकल है।

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जरूरतों के अनुसार मेल ढूँढ़ना (दोहरा संयोग). उचित विनिमय दरें तय करना, सामान का परिवहन करना, आंशिक विनिमय को संगृहीत करना और छोटे खरीद के लिए बैल का अविभाज्य होना, इस वस्तु विनिमय प्रक्रिया की जटिलता को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 2.
पहले दिए गए चित्रणों में वस्तु विनिमय प्रणाली के कुछ तरीके दर्शाए गए हैं। क्या आपने अपने क्षेत्र में इस तरह के प्रयोगों का अवलोकन किया है? इस प्रक्रिया में लोगों को किस-किस प्रकार के अनुभव होते हैं? ( पृष्ठ 236)
उत्तर:
हमने अपने क्षेत्र में निम्नलिखित वस्तु विनिमयों का अनुभव किया है-
(i) स्थानीय वस्तु विनियम प्रथाएँ-

  • बर्तनों के लिए पुराने कपड़ों का आदान-प्रदान।
  • उपकरणों या संवाओं के लिए फसल का व्यापार करने वाले किसान।

(ii) अनुभव, जो लोगों को हो सकते हैं-

  • सकारात्मक-पैसे की बचत होती है। समुदायिक विश्वास बनता है, वस्तुओं का स्थायी रूप से पुन: उपयोग होता है।
  • चुनौतियाँ-आवश्यकताओं का मेल ढूँढ़ना (दोहरा संयोग), उचित विनिमय मूल्यों पर सहमत होना, खाद्यान्न के परिवहन और भण्डारण संबंधी समस्याएँ।

(iii) आधुनिक अनुकूलन-ऑनलाइन वस्तुविनिमय या स्थानीय विनिमय समूह-

  • गैर-मौद्रिक व्यापार के रूप में कौशलसाझाकरण

प्रश्न 3.
नीचे दी गई समय-रेखा को देखें। आपने मुद्रा में क्या-क्या बदलाव देखें? (पृष्ठ 237)
नोट-चित्र 11.4 समय रेखा देखें।
उत्तर:
समय रेखा भारत में धन के विकास के प्रमुख चरणों को दर्शाती है। लगभग 6000 ई.पू. में वस्तु विनिमय प्रणाली से शुरू होती है, लगभग 1000 ई.पू. के बाद कौड़ी जैसी वस्तु-मुद्रा में बदलती है, फिर 600 ई.पू. में लोहे, चाँदी, सोने और ताँबे से बने धातु के सिक्कों में बदलती है।

कागज़ी मुद्रा को आधिकारिक तौर पर 1861 में पेश किया गया था, जिसके बाद डेबिट/क्रेडिट कार्ड (1980) और UPI डिजिटल भुगतान (2016) में शुरू हुआ। यह प्रगति तकनीकी प्रगति और बदलती अर्थिक जरूरतों को दर्शाते हुए मूर्त से अमूर्त रूपों में बदलाव को उजागर करते हैं। यह समय रेखा इस बात पर जोर देती है कि व्यापार में सुवाह्यता, स्थायित्व और सुविधा जैसी समस्याओं को हल करने के लिए धन का विकास क्रमिक रूप से आवश्यकतानुसार कैसे परिवर्तित होता गया।

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प्रश्न 4.
चित्र 11.7 में दर्शाए गए सिक्के तमिलनाडु में स्थित पुड्डूकोटाई में उत्खनन के समय मिले हैं। उनके ‘शीर्ष’ पर रोमन राजाओं की आकृति उकेरी हुई है। इस तरह की जानकारियों के द्वारा हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? (पृष्ठ 239)
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उत्तर:

  • यह प्राचीन भारत और रोम के बीच मज़बूत व्यापारिक संबंधों को प्रदर्शित करता है। जो केरल और तमिलनाडु के कुछ भागों में मिले हैं। इन सब जानकारियों से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि-
  • सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान को दर्शाता है।
  • रोमन सिक्कों का उपयोग भारतीय लेन-देन में या इसके विपरीत व्यापारिक गतिविधियों में किया जाता था, ऐसा प्रतीत होता है।

प्रश्न 5.
आप अपने आप को पाँच-पाँच विद्यार्थियों के समूहों में संगठित करें। एक सामूहिक परियोजना आरंभ करें जिसमें परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों, दुकानदारों आदि से पुराने सिक्के एकत्रित करें। उनकी विभिन्न विशेषताओं को लिखें-वे किस धातु से बने हैं, सिक्कों पर अंकित वर्ष क्या है, सिक्कों के शीर्ष और पृष्ठ भाग पर आप क्या देखते हैं। अपने अवलोकनों से आप क्या अनुमान लगा सकते हैं? आपको कैसे पता चलेगा कि आपके अनुमान सही हैं? (पृष्ठ 241)
उत्तर:
1. दस्तावेज़ बनाने संबंधी कार्य-
(क) सामग्री-धातु की पहचान करें-(जैसे-ताँबा, चाँदी, निकल आदि पहचानना।)
(ख) वर्ष-यदि दिया गया हो, तो सिक्के निर्माण का वर्ष अंकित करें।
(ग) अग्रभाग-विभिन्न राजवंशों/सरकारों ने शासकों के/देवी-देवताओं/राष्ट्रीय प्रतीकों को अग्रभाग पर अंकित किया।
(घ) पृष्ठ भाग-इन पर अक्सर सिक्के का मूल्य सांस्कृतिक रूपांकन या ऐतिहासिक घटनाओं का अंकन मिलता है।

2. विश्लेषण के लिए अवलोकन-
(क) आर्थिक स्थितियाँ (कीमती धातुएँ उस समय की सम्पन्नता को दर्शाती हैं।)
(ख) राजनीतिक इतिहास (शासकों/युगों का चित्रण)
(ग) सांस्कृतिक मूल्य (धार्मिक/प्रकृति के प्रतीक)

3. सत्यापन विधि
(क) आरबीआई अभिलेखागार/मुद्राशास्त्र की पुस्तकों से सत्यापित करें।
(ख) संग्रहालय के विशेषज्ञों या सिक्का संग्राहकों से मिलें।
(ग) आरबीआई के ‘सिक्कों का संग्रहालय’ जैसे विश्वसनीय ऑनलाइन डेटाबेस का प्रयोग करें।
जैसे-राजा जॉर्ज VI के चित्र अग्रभाग में और लायन कैपिटल पृष्ठभाग वाला 1947 का एक भारतीय सिक्का भारत के औपनिवेशिक संक्रमण को दर्शाता है।

प्रश्न 6.
आपके विचार में क्या हुआ होगा जब सिक्कों का प्रयोग हर प्रकार के लेन-देन के लिए शुरू हुआ होगा, चाहे वह सब्जियाँ हों या जमीन खरीदना हो? ऐसी क्या समस्याएँ उत्पन्न हुई होंगी? (पृष्ठ 241)
उत्तर:
सिक्के लेन-देन के लिए सार्वभौमिक हो गए, कई मुद्दे सामने आए। जमीन जैसी बड़ी खरीद के लिए बड़ी मात्रा में परिवहन करना बोझिल साबित हुआ. जबकि छोटे दैनिक खरीद के लिए अत्यधिक गिनती की जरूरत होती थी। जमा हुए सिक्कों के साथ भंडारण और सुरक्षा करना मुश्किल होगा। धातु की शुद्धता में भिन्नता और जाली सिक्कों ने विश्वास के मुद्दे पैदा हुए होंगे। सुवाह्यता, विभाज्यता और सुरक्षा में ये व्यावहारिक चुनौतियाँ। अंततः बड़े लेन-देन के लिए कागज़ के पैसे को एक अधिक कुशल और वैकल्पिक विधि के रूप में विकसित करने का कारण बनीं।

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प्रश्न 7.
₹50 और ₹100 के नोटों को देखिए। क्या आप नोटों के पृष्ठ भाग पर दर्शाई गई भारत की सांस्कृतिक विरासत से संबंधित आकृतियों को पहचान पा रहे हैं? इनके बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए। ( पृष्ठ 242)
उत्तर:
₹ 50 के नोट पर हम्पी के पत्थर के रथ (विजयनगर साम्राज्य) का चित्र है। जबकि ₹ 100 के नोट पर रानी की वाव (गुजरात की एक बावड़ी,एक यूनेस्को स्थल) का चित्र है। ये रूपांकन भारत की स्थापत्य विरासत का जश्न मनाते हैं। छात्रों को नोटों के जटिल विवरणों की जाँच करनी चाहिए और उनके ऐतिहासिक महत्व पर शोध करना चाहिए। रथ मंदिर कला का प्रतिनिधित्व करता है जबकि बावड़ी मध्ययुगीन भारत से प्राचीन जल प्रबंधन प्रणालियों और मृत्तिकला उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 8.
नोटों की सतह को छूकर महसूस कीजिए। क्या दृष्टिबाधित लोगों के लिए नोटों पर अंकित मूल्य को पहचानने हेतु कोई विशेष लक्षण हैं? (पृष्ठ 242)
उत्तर:

  • उभरी हुई रेखाएँ या आकार के स्सर्शनीय निशान।
  • विभिन्न मूल्यवर्ग के लिए अलग-अलग आकार।
  • इटैग्लियो प्रिटिंग (उभरी हुई स्याही) जिसे छूकर महसूस किया जा सकता है। प्रत्येक मूल्यवर्ग में ये विशिष्ट विशेषताएँ, एक दृष्टिबाधित व्यक्ति को किसी भी मुद्रा नोट (₹10, ₹20 , ₹50 , ₹100 , ₹200 , और ₹500 ) की पहचान करने में मद्द करती है।

वस्तु विनिमय से मुद्रा तक Class 7 Question Answer in Hindi

Class 7 Samajik Vigyan Chapter 11 Question Answer

प्रश्न 1.
वस्तु विनिमय प्रणाली कैसे कार्य करती थी और इस प्रणाली में किस प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग विनिमय हेतु किया जाता था?
उत्तर:
वस्तु विनिमय प्रणाली में बिना पैसे का उपयोंग किए सीधे वस्तुओं या सेवाओं का आदान-प्रदान शामिल होता है। जैसे –

  • एक किसान एक कुम्हार से बर्तन के बदले में एक बोरी चावल का व्यापार कर सकता था।
  • एक बुनकर एक लोहार से औज़ारों के बदले में कपड़ा बदल सकता था। विनिमय के लिए उपयोग की जाने वाली वस्तुओं में शामिल है।
  • प्राकृतिक वस्तुएँ : कौड़ी के खोल, नमक, चाय तंबाकू आदि।
  • कृषि वस्तुएँ : अनाज, पशुधन (गाय, बकरी, भेड़, घोड़े आदि)
  • हस्तनिर्मित वस्तुएँ: कपड़ा, कार्नेलियन मोती।

प्रश्न 2.
वस्तु विनिमय प्रणाली की क्या सीमाएँ थी?
उत्तर:
वस्तु विनिमय प्रणाली की चार प्रमुख सीमाएँ थीं-

  • आवश्यकताओं का दोहरा संयोग-दोनों पक्षों के पास ठीक वही वस्तु होनी चाहिए, जो दूसरे को चाहिए। (जैसे-गेहूँ वाले किसान को ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा जो गेहूँ चाहता हो और उसके पास वह जूते हो जिनकी उसे आवश्यकता है।)
  • सामान्य माप का अभाव-मूल्यों की तुलना करने के लिए कोई मानक नहीं था (जैसेकितने गेहूँ एक गाय के बराबर है?)
  • अविभाज्यता-कुछ वस्तुओं को विभाजित नहीं किया जा सकता था। (जैसे-आप छोटी वस्तुओं को खरीदने के लिए एक जीवित बकरी को विभाजित नहीं कर सकते)।
  • भंडारण/परिवहन संबंधी समस्याएँ-जल्दी खराब होने वाली वस्तुएँ (जैसे-अनाज) खराब हो सकती थी।
    भारी/बड़ी वस्तुओं (जैसे-पत्थर) को ले जाना मुश्किल था।

प्रश्न 3.
प्राचीन भारतीय सिक्कों की मुख्य विशेष्ताएँ क्या थीं?
उत्तर:
प्राचीन भारतीय सिक्कों की मुख्य विशेषताएँ-
(i) सामग्री – चाँदी, ताँबा, सोना और मिश्र धातुओं जैसी धातुओं से बने होते थे। धातु के अनुसार शासन की सम्पन्नता जुड़ी होती थी।

(ii) आकृति:

  • अग्रभाग: शासकों के चित्र (जैसे-गुप्त राजा) या प्रतीक (जैसे-चोल राजवंश का बाघ प्रतीक)
  • पृष्ठभाग: धार्मिक रूपांकन (जैसेवराह अवतार), प्रकृति (जैसे-पेड़, जानवर) या व्यापारिक वस्तुएँ (जैसेजहाज़) की आकृति बनी होती थी।

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(iii) शिलालेख:

  • ब्राह्मी/संस्कृत लिपि में राजाओं के नाम (जैसे-समुद्रगुप्त या राजवंशों के नाम प्रदर्शित होते थे।)
  • जहाँ सिक्कों को गढ़ा जाता था, उस टकसाल की निशानी।

(iv) आकार और माप-अनियमित पंच-चिह्नित सिक्के ( 6 वीं शताब्दी ई.पू.) मानकीकृत गोल सिक्कों (मौर्य युग) में परिवर्तित कर दिए गए।

(v) उद्देश्य

  • शाही अधिकार को दर्शाते थे और साम्राज्यों में व्यापार को सुगम बनाते थे। (जैसे-चालुक्य सिक्कों में एक तरफ विष्णु के वराह अवतार और दूसरी तरफ एक शाही छत्र था।)

प्रश्न 4.
समय के साथ मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कैसे परिवर्तित हुई?
उत्तर:
धन पाँच प्रमुख चरणों में विकसित हुआ है-

  • वस्तु विनिमय-सीधे वस्तुओं/सेवाओं का आदान-प्रदान (जैसे-औज़ारों के बदले फसल)।
  • वस्तु मुद्रा—मानकीकृत मूल्यवान वस्तुएँ (कौड़ी का खोल, नमक)।
  • धातु के सिक्के-शासकों के निशान वाले ढाले हुए सिक्के। (चाँदी, सोना) जो छठी शताब्दी ई.पू. बनाए गए।
  • कागज़ी मुद्रा-हल्के नोट, जो भारत में 1861 में शुरू किए गए।
  • डिजिटल मुद्रा-कैशलेस लेन-देन, जिसमें यूपीआई, क्यूआरकोड से मुद्रा लेन-देन शामिल होता है।

प्रत्येक चरण ने पिछली सीमाओं को आसान किया, सुवाह्यता में सिक्के-कागज़ के नोट में बदले, विभाज्यता से डिजिटल भुगतान में आसानी और सार्वभौमिक स्वीकृति मिली। जैसे-एक किसान ने एक बार जूतों के बदले गेहूँ का व्यापार किया था, आज वे डिजिटल रूप में फसल बेचने के लिए एक क्यूआरकोड स्कैन करते हैं।

प्रश्न 5.
प्राचीन काल में कौन-से कदम उठाए गए होंगे जिससे भारतीय सिक्के विभिन्न देशों में विनिमय का माध्यम बन सकें?
उत्तर:
प्राचीन काल में, भारतीय सिक्कों को अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में स्थापित करने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए गए थे-

  • मानकीकरण-समान वजन, आकार और धातु की शुद्धता सुनिश्चित करना जैसे-गुप्त काल में सोने के सिक्के।
  • पहचान योग्य बनावट-व्यापक रूप से स्वीकृत प्रतीकों वाले सिक्के ढालना, जैसेशाही चित्र, देवी लक्ष्मी और देवी-देवताओं के चित्र।
  • उच्च मूल्य की धातुएँ-सोने और चाँदी का उपयोग करना, जिनकी सार्वभौमिक स्वीकार्यता हो।
  • व्यापारिक गठबंधन-प्रमुख मार्गों (जैसेसिल्क रूट, समुद्री व्यापार) के साथ सिक्कों का प्रचलन।
  • शाही गारंटी-शक्तिशाली साम्राज्यों (जैसे-मौर्यकालीन पंच-चिह्नित सिक्के) की प्रतिष्ठा के साथ मुद्रा का समर्थन करना।
  •  स्पष्ट मूल्यवर्ग-विदेशी बाजारों में आसान रुपांतरण के लिए मूल्यों को चिह्नित करना। जैसे-दक्षिण भारत में पाए जाने वाले रोमन सिक्के सीमा पार स्वीकृति को दर्शाते हैं।

प्रश्न 6.
अर्थशास्त्र की निम्नलिखित पंक्तियाँ पढ़ें-
‘ 60 पणों का एक वर्ष का वेतन प्रतिदिन एक अधक अनाज से प्रतिस्थापित हो सकता था, जो चार बार के भोजन के लिए पर्याप्त था…’ (एक अधक लगभग 3 किलोग्राम के बराबर होता हैं। यह एक पण के मूल्य के विषय में क्या बताता है? पड़ांसी की सहायता न करने की दंड 100 पण था। इसकी तुलना वार्षिक बंतन से करें। इससे आप मानवीय मूल्यों के बारे में क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जो इसके माध्यम से प्रोत्साहित किए जा रहे थे?
उत्तर:
वार्षिक वेतन – 60 पण
प्रतिदिन एक अधक अनाज
1 अधक/आढक = 3 किलोग्राम अनाज
एक वर्ष में आवश्यक कुल अनाज
=365 x 3=1095 किलोग्राम
इसलिए 1095 किलोग्राम अनाज =60 पण
1 पण =1095 / 60=18.25 किलोग्राम अनाज
इसका मतलब है कि उस समय एक पण से 18.25 किलोग्राम अनाज खरीदा जा सकता था, जो लगभग 6 दिनों के भोजन के बराबर था। एक पड़ोसी की मद्द न करने पर 100 पण का जुर्माना था, जो लगभग 18 महीने के वेतन के बराबर है, जो दर्शाता है कि उस समय नियम काफी सख्त थे। शासक दयालु थे और चाहते थे कि उनके नागरिक संकट के समय एक-दूसरे की मद्द करें। कानून ने सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता दी, जो प्राचीन भारत के धर्म, कर्तव्य और आपसी सहयोग पर जोर को दर्शाता है। इस प्रकार समाज की जरूरतें व्यक्तिगत की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 7.
एक नाटक लिखिए और उसका मंचन कीजिए जिसमें यह दिखाया जाए कि लोग एक-दूसरे को कौड़ी, कवच (और ऐसी अन्य वस्तुओं) को विनिमय के माध्यम के रूप में प्रयोग करने के लिए कैसे तैयार कर सके होंगे?
उत्तर:
नाटक का शीर्षक-विनिमय की आरंभिक अवस्था-
पात्र-

  • राजा विक्रम
  • ग्राम प्रधान
  • किसान मांहन
  • कुम्हार रामृ
  • सुनार गंगा
  • गाँव वाले

दृश्य-1: (गाँव के लोग आपस में वस्तुएँ बदल रहे हैं)

  • मोहन (किसान)-मुझे कुछ नए मिट्टी के घड़े चाहिए, लेकिन मेरे पास देने के लिए सिर्फ गेहूँ है।
  • रामू (कुम्हार)-मुझे तो गेहूँ की जरूरत नहीं है, मुझे तो ताँबे के बर्तन चाहिए।
  • मोहन (किसान)-तो अब मैं क्या करुँ? आप मेरी मदद कर सकते हैं क्या? (दोनों में कोई बात नहीं बनती है।)

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दृश्य-2: ग्रामसभा में चर्चा:

  • राजा विक्रम: लोगों को वस्तुओं के विनिमय में कठिनाई हो रही है। कुछ ऐसा उपाय होना चाहिए, जिससे सभी लेन-देन कर सकें।
  • गंगा (सुनार): हम कौड़ियों का उपयोग कर सकते हैं। यह हर जगह मिलती है और सभी इसे पहुचानते भी हैं।
  • ग्राम प्रधान: सही कहा। कौड़ी का मूल्य तय कर दिया जाए-जैसे- 10 कौड़ी में एक घड़ा और 5 कौड़ी में एक सेर गेहूँ।
    (सभी सहमति में सिर हिलाते हैं।)

दृश्य-3: नया बाज़ार:
(लोग कौड़ियों से वस्तुएँ खरीद-बेच रहे हैं।)

  • मोहन: रामू, ये लो 10 कौड़ी और दो घड़े दे दो।
  • रामू: जरूर, अब तो व्यापार आसान हो गया है।
  • गंगा: देखो, अब झगड़ा खत्म हो गया है, सबको समान माप पर सामान मिल रहा है।

दृश्य-4: समापनः

  • राजा विक्रम: आज से हमारे राज्य में कौड़ी, कवच और ऐसी अन्य वस्तुएँ विनिमय का माध्यम होंगी। यह हमारे व्यापार को सरल और सबके लिए उपयोगी बना देगा।
    (तालियों की गूँज के साथ पर्दा गिरता है।)
  • नाटक का महत्व: छात्रों के द्वारा नाटक मंचन से वस्तु विनिमय की चुनौतियों और मुद्रा के महत्व का अनुभव होता है।

प्रश्न 8.
भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी. आई.) ही कागजी मुद्रा को छापने व वितरण करने का एकमात्र वैधानिक स्रोत है। नोटों की अवैध छपाई और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने कई सुरक्षा कदम उठाए हैं। पता लगाइए कि ऐसे कुछ उपाय कौन-से हैं और अपनी कक्षा में उनकी चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मुख्य सुरक्षा विशेषताएँ-

  • वाटरमार्क-एक पारदर्शी छवि (जैसे-गाँधीजी का चित्र) जिसे रोशनी में देखने पर दिखाई देती है।
  • सुरक्षा धागा-‘आर.बी.आई.’ और नोट के मूल्य को थोड़ा तिरछा करने पर रंग बदल जाता है, तथा एक चाँदी की पट्टी दिखाई देती है।
  • अस्पष्ट छवि-छिपा हुआ संख्यात्मक मान जो एक कोण से देखने पर दिखाई देता है।
  • छोटी लिखावट-आवर्धन के तहत पठनीय छोटे ‘आर. बी.आई.’ शब्द।
  • फ्लोरोसेंट स्याही-पराबैंगनी प्रकाश से यह स्याही चमकती है, जो नंबर पैनल पर होती है।
  • सी.थू. रजिस्टर-इस फीचर के माध्यम से जब नोट को लाईट के सामने लाया जाता है, तो 500 या 2000 की वैल्यू (मूल्य) चमकने लगते हैं।
  • इटैग्लियो छपाई-स्पर्शनीय पहचान के लिए उभरी हुई स्याही होती है।

कक्षा चर्चा बिंदु:

  • ये विशेषताएँ जालसाजी को कैसे रोकती हैं? जैसे-माइक्रो-प्रिटिंग के लिए उन्नत तकनीक की आवश्यकता होती है।
  • पुराने बनाम नए नोटों की तुलना करें, जैसे-2016 की नोटबंदी से पहले और बाद के नोटों की तुलना।
  • सुरक्षा क्यों विकसित होती है, जैसे-विमुद्रीकरण के बाद 2000 का नोट जारी किया गया।

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प्रश्न 9.
अपने परिवार के कुछ सदस्यों और स्थानीय दुकानदारों का साक्षात्कार लीजिए और उनसे पूछिए कि वे भुगतान करने या प्राप्त करने में नकद या यू.पी.आई. में किसको वरीयता देंगे और क्यों?
उत्तर:
(छात्र स्वयं परिवार के कुछ सदस्यों और दुकानदारों का साक्षात्कार करेंगे।)
संभावित उत्तर निम्न हो सकते हैं:
1. वृद्ध लोग ( 60 + आयु वर्ग ) नकद भुगतान पसंद करेंगे क्योंकि:

  • नकद् भुगतान के परिपक्व
  • स्मार्ट फोन का सीमित ज्ञान
  • नकद लेन-देन में सहज महसूस करना।

2. नवयुवक व शहरी उपभोक्ता: यूपीआई, फोन पे, गूगल पे, पेटीएम पसंद करते हैं, क्योंकि:

  • तत्काल स्थानांतरण
  • खुले पैसों की समस्या नहीं
  • लेन-देन का डिजिटल रिकार्ड दर्ज होना

3. दुकानदारः

  • मिश्रित प्रतिक्रियाएँ।
  • यूपीआई पसंद किया जाता है क्योंकि नकली नकदी से बचाता है।
  • छोटी खरीददारी के लिए अभी भी नकद का उपयोग किया जाता है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क समस्याओं के कारण नकद भुगतान के लिए प्राथमिकता दी जाती है।
  • कुछ बैंक भुगतान पर कुछ प्रतिशत शुल्क लेते हैं।

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