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झाँसी की रानी कविता का सारांश
झाँसी की रानी Class 9 Summary Explanation
Class 9 Hindi Chapter 11 Summary – झाँसी की रानी Summary Class 9
‘झाँसी की रानी’ कविता सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित है। यह कविता सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस कविता में रानी लक्ष्मीबाई के जीवन-संघर्ष, वीरता और अंग्रेजों के विरुद्ध उनके विद्रोह की गौरवगाथा का वर्णन है। इस कविता का मुख्य उद्देश्य पाठकों में साहस का संचार करना तथा उनमें देश के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना जागृत करना है। कविता का सार इस प्रकार है-
लक्ष्मीबाई अपने पिता की इकलौती संतान थी और नाना साहब के साथ पली-बढ़ी थी। बचपन से ही उनकी रुचि साधारण खेलों के बजाय बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी जैसे शस्त्रों में थी। नकली युद्ध करना, व्यूह की रचना करना और दुर्ग तोड़ना उनके प्रिय खेल थें।
उनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ। लेकिन राजा की निःसंतान अवस्था में अकाल मृत्यु हो गई, जिससे सम्पूर्ण झाँसी शोक में डूब गई और रानी विधवा हो गईं। झाँसी को लावारिस समझकर भारत के तत्कालीन
गवर्नर-जनरल डलहौजी ने उसे ब्रिटिश राज्य में मिलाने का मौका ढूँढ़ लिया और दुर्ग पर अपना ध्वज फहरा दिया। अंग्रेजों ने न केवल भारतीय राज्यों को हड़पा, बल्कि उनकी रानियों और बेगमों के गहने, कपड़े इत्यादि भी कलकत्ता (अब कोलकाता) के बाजारों में नीलाम किए।
इस अपमान ने पूरे देश में विद्रोह की ज्वाला भड़का दी। नाना धुंधूपंत, ताँतिया, अजीमुल्ला और लक्ष्मीबाई जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। रानी ने युद्ध के मैदान में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी। उन्होंने लेफ्टिनेंट वॉकर को जख्मी कर भगा दिया और ग्वालियर पर अपना अधिकार कर लिया। अंत में जब वे शत्रुओं से घिर गई और उनका नया घोड़ा एक नाले के पास अड़ गया, तब वे वीरता से लड़ते हुए मात्र 23 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हुई।

रानी का यह बलिदान भारतवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे स्वयं अपनी एक अमिट निशानी बन गईं, जिन्होंने आनेवाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता का मार्ग दिखाया।
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झाँसी की रानी कविता का कवि परिचय
सुभद्रा कुमारी चौहान – एक प्रसिद्ध हिंदी कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी थीं। उनका जन्म 16 अगस्त 1904 को प्रयागराज में हुआ था। उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता “झाँसी की रानी” है, जो देशभक्ति से भरपूर है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और कई बार जेल भी गई।
उनकी रचनाएँ सरल भाषा में लिखी गई हैं, जो आज भी बच्चों और युवाओं को प्रेरित करती हैं।

शब्दार्थ (पृष्ठ 176) : आरंभिक – सबसे पहले वाला। जनमानस – लोगों का मन। प्रतिबद्धता – साथ जुड़े होने का भाव। व्यापक – विस्तृत, फैला हुआ। आकस्मिक – अचानक। पृष्ठभूमि – पीछे की स्थितियाँ। अविस्मरणीय – जिसे भूल न सकें। जीवन-वृत्त – जीवन की कहानी। ओजपूर्ण – जोश से भरपूर। ओत-प्रोत – भरा हुआ। कथात्मक – कहानी जैसा।
कविता का संदेश
हमें अपने देश की रक्षा के लिए साहसी और निडर बनना चाहिए। कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं माननी चाहिए और संघर्ष करते रहना चाहिए। महिलाओं में भी अद्भुत शक्ति और नेतृत्व की क्षमता होती है. उन्हें कभी कम नहीं आंकना चाहिए।
झाँसी की रानी कविता का भावार्थ व्याख्या
काव्यांश – 1
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फ़िरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 177)
शब्दार्थ : भृकुटी तानना – क्रोध करना। गुमी हुई – खोई हुई। फ़िरंगी – अंग्रेज। मन में ठानना – पक्का निश्चय करना। सन सत्तावन – वर्ष 1857। हरबोलों – बुंदेलखंड के लोकगायक जो राजाओं की वीरता के गीत गाते हैं। मर्दानी – पुरुषों के समान साहस और वीरता दिखाने वाली।
संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ में संकलित कविता ‘झाँसी की रानी’ से ली गई हैं। इसकी रचयिता वीर रस की प्रख्यात कवयित्री ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ हैं।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की परिस्थितियों और उसमें रानी लक्ष्मीबाई के अभूतपूर्व साहस का वर्णन किया है। इन पंक्तियों में बताया गया है कि कैसे अंग्रेजों की नीतियों से त्रस्त होकर सम्पूर्ण भारत में विद्रोह की लहर दौड़ गई थी।
व्याख्या – अंग्रेजों की कूटनीतियों के कारण भारतीय राजाओं के सिंहासन संकट में पड़ने लगे थें और राजघरानों में भारी असंतोष व्याप्त था। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी भौहें तान ली थीं। सदियों की गुलामी से जर्जर और हताश हो चुके भारत में स्वतंत्रता की लहर ने नए जोश और उत्साह का संचार कर दिया था। भारतीय जनता अब समझ चुकी थी कि इस गुलामी के कारण उन्होंने अपना आत्म सम्मान खो दिया है। सबने देश की खोई हुई आज़ादी को वापस पाने का मूल्य समझ लिया था।
सभी भारतीयों ने मिलकर यह संकल्प लिया कि अब वे अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ कर ही रहेंगे। इसी संकल्प के साथ सन 1857 में वह पुरानीं तलवार अर्थात भारतीय वीरता फिर से चमक उठी। कवयित्री सुभद्रा कुमारी जी कहती हैं कि बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों के मुख से हमने यह वीरता की गाथा सुनी है कि युद्ध के मैदान में पुरुषों की भाँति साहस दिखाने वाली वह वीरांगना कोई और नहीं, बल्कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं।
विशेष-
- भाषा – सरल, सुबोध और ओजपूर्ण खड़ी बोली।
- रस – वीर रस की सुंदर छटा देखते ही बनती है।
- शैली – वर्णनात्मक और उत्साहवर्धक।
काव्यांश – 2
कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ
उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 177)
शब्दार्थ : मुँहबोली – जिसे बहन माना गया हो। छबीली – सुंदर, प्यारी। संतान – औलाद। बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी – ये सभी युद्ध में प्रयोग होने वाले शस्त्र हैं। गाथाएँ – वीरता की कहानियाँ। ज़बानी – कंठस्थ, मौखिक रूप से याद।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के बचपन, उनके पालन-पोषण और उनके साहसी स्वभाव का वर्णन किया है। इसमें बताया गया है कि लक्ष्मीबाई बचपन से ही अन्य लड़कियों के विपरीत युद्ध कला और वीरता में रुचि रखती थीं।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि कानपुर के नाना साहब लक्ष्मीबाई को अपनी मुँहबोली बहन मानते थें और उन्हें प्यार से ‘छबीली’ पुकारते थे। लक्ष्मीबाई अपने पिता की इकलौती संतान थीं। उनका बचपन सामान्य लड़कियों की तरह गुड़िया – खिलौनों से नहीं, बल्कि नाना साहब के साथ पढ़ते और खेलते हुए बीता।
उनके खिलौने भी अनोखे थे वे बरछी, ढाल, तलवार और कटार के साथ खेलना पसंद करती थीं यही उनकें असली मित्र थे। उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता की कहानियाँ ज़बानी याद थीं। अंत में कवयित्री कहती हैं कि हमने बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) के मुँह से सुना है कि जो रानी युद्ध के मैदान में पुरुषों की भाँति बड़ी वीरता से लड़ी थीं वह झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं।
विशेष-
- भाषा – सरल और ओजपूर्ण खड़ी बोली।
- रस – वीर रस की सुंदर छटा देखते ही बनती है।
- अलंकार- ‘झाँसी वाली रानी थीं में अनुप्रास अलंकार की सुंदरता झलकती है।
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काव्यांश – 3
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी
भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 177-178)
शब्दार्थ : वीरता की अवतार – बहादुरी का साक्षात रूप।
पुलकित – प्रसन्न। वार – प्रहार। व्यूह की रचना – युद्ध के लिए सैनिकों को विशेष घेरे में खड़ा करना। खिलवार – खेल-खेल में किया जाने वाला काम। कुल-देवी – परिवार की आराध्य देवी। आराध्य – जिसकी पूजा की जाए।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के असाधारण व्यक्तित्व और उनकी युद्ध कौशल में रुचि का वर्णन किया है। कवयित्री बतलाती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई बचपन से ही साधारण लड़कियों के खेल छोड़कर वीरतापूर्ण कार्यों में मग्न रहती थीं।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि वह साक्षात धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी जी या शक्ति की देवी दुर्गा माँ की स्वरूप थीं, यह कहना कठिन है, क्योंकि वे स्वयं वीरता की अवतार थीं। उनकी तलवार चलाने की कला और उनके प्रहारों को देखकर मराठा सैनिक गर्व से भर जाते थे और अत्यंत प्रसन्न होते थे।
रानी लक्ष्मीबाई के बचपन के खेल आम लड़कियों जैसे नहीं थे। उन्हें नकली युद्ध करना, सेना की चक्रव्यूह रचना सीखना, शिकार करना, दुश्मन की सेना को घेरना और किलों को जीतना इत्यादि खेल बहुत पसंद थें। ये कठिन कार्य उनके लिए अन्य सामान्य खेलों की ही भाँति थें।
महाराष्ट्र की कुलदेवी माँ भवानी (दुर्गा / पार्वती) ही लक्ष्मीबाई की भी पूज्य देवी थीं, जिनसे वे शक्ति प्राप्त करती थीं। अंत में कवयित्री कहती हैं कि हमने बुंदेलखंड के उन गायकों (हरबोलों) के मुख से यह गौरवशाली गाथा सुनी है कि जो रानी पुरुषों के समान अदम्य साहस के साथ युद्ध के मैदान में लड़ीं वह झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं।

विशेष-
- भाषा – सरल, सुबोध और ओजपूर्ण खड़ी बोली।
- रस – वीर रस की सुंदर छटा देखने को मिलती है।
- उपमा / रूपक – रानी को ‘वीरता की अवतार’ कहकर उनको साक्षात शक्ति की देवी, माँ दुर्गा का स्वरूप कहा गया है।
- शैली – वर्णनात्मक और आख्यान गीत शैली का प्रयोग किया गया है, जहाँ एक महान व्यक्तित्व की कहानी कविता के माध्यम से सुनाई गई है।
काव्यांश – 4
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुँदेलों की विरुदावलि सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया,
शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 178)
शब्दार्थ : वैभव – ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति। ब्याह – विवाह। बधाई – मंगलगान। सुभट – वीर योद्धा। विरुदावलि – यशोगान। चित्रा – अर्जुन की पत्नी (सुभद्रा)। भवानी – माँ पार्वती / दुर्गा।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के विवाह और उनके झाँसी आने पर होने वाले हर्षोल्लास का वर्णन किया है। यहाँ लक्ष्मीबाई (वीरता) और झाँसी के राजा गंगाधर राव (वैभव) के मिलन को ऐतिहासिक और दिव्य उपमाओं के माध्यम से दर्शाया गया है।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि झाँसी में वीरता (लक्ष्मीबाई) की सगाई वैभव (राजा गंगाधर राव) के साथ हुई। जब लक्ष्मीबाई विवाह करके रानी बनकर झाँसी आईं, तो पूरे राजमहल में खुशियाँ छा गई और मंगलगीत गाए जाने लगे। लक्ष्मीबाई झाँसी में बुंदेलों के गौरवशाली इतिहास की यश-गाथा की तरह आई।
रानी लक्ष्मीबाई और राजा गंगाधर राव का मिलन ऐसा था मानो चित्रा को वीर अर्जुन मिल गए हों या साक्षात शिव से पार्वती (भवानी) का मिलन हुआ हो। कवयित्री कहती हैं कि हमने बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) के मुख से यह कहानी सुनी है कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में पुरुषों की भाँति बड़ी बहादुरी से लड़ी थीं।
विशेष-
- भाषा – सरल, सुबोध और ओजपूर्ण खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग।
- रस – वीर रस की प्रधानता।
- अलंकार – ‘ विरुदावलि-सी’ में उपमा अलंकार है। ‘चित्रा-अर्जुन’ और ‘शिव भवानी’ के उदाहरणों द्वारा दृष्टांत अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है।
- शैली – वर्णनात्मक और प्रभावपूर्ण काव्य शैली।
- भाव – रानी लक्ष्मीबाई के आगमन को झाँसी के लिए अत्यंत मंगलकारी और गौरवशाली बताया गया है।
काव्यांश – 5
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजाजी
रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 178)
शब्दार्थ : उदित – उदय होना। सौभाग्य – अच्छा भाग्य। मुदित – प्रसन्न। उजयाली – उजाला। कालगति – समय की चाल। काली घटा – संकट के बादल / मुसीबत। कर – हाथ। विधवा – वह स्त्री जिसका पति मर चुका है। विधि – नियति / भाग्य। निःसंतान – बिना किसी संतान के। शोक-समानी – शोक में डूबी हुई।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के पति, झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु और उसके बाद झाँसी पर छाए संकट के बादलों का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि विवाह के बाद झाँसी के महलों में सौभाग्य का उदय हुआ और चारों ओर खुशियाँ छा गईं। रानी के आने से महलों में उजाला हो गया था। लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि चुपके-चुपके झाँसी पर दुर्भाग्य के काले बादल मँडराने लगे।
नियति (भाग्य) को यह मंजूर नहीं था कि जिन हाथों ने धनुष की प्रत्यंचा खींची हो और जो हाथ अस्त्र-शस्त्र चलाने के लिए बने हों, उनमें सुहाग की चूड़ियाँ शोभा दें। अत्यंत दुख की बात है कि राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई और रानी, विधवा हो गईं। भाग्य को भी उन पर दया नहीं आई।
राजा बिना किसी संतान के ही परलोक सिधार गए, जिससे झाँसी का उत्तराधिकारी कोई न रहा। रानी शोक के गहरे सागर में डूब गईं। यह कहानी हमने बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) के मुख से सुनी है कि झाँसी की रानी पुरुषों के समान वीरता से लड़ने वाली महान वीरांगना थीं।
विशेष-
- भाषा – सरल, सुबोध और ओजपूर्ण खड़ी बोली का प्रयोग।
- रस – इन पंक्तियों में ‘करुण रस’ का अत्यंत मार्मिक प्रभाव है, जो राजा की मृत्यु को दर्शाता है।
- शैली – वर्णनात्मक और वीरगाथात्मक शैली।
- भाव – रानी का व्यक्तिगत दुख और झाँसी के राजनीतिक संकट (निःसंतान मृत्यु) को एक साथ पिरोया गया है।
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काव्यांश – 6
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा
झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 179)
शब्दार्थ : बुझा दीप – राजा की मृत्यु होना (वंश का चिराग बुझना)। हरषाया- खुश हुआ। हड़प करना – अनैतिक तरीके से छीन लेना। दुर्ग – किला। लावारिस – जिसका कोई उत्तराधिकारी न हो। वारिस – उत्तराधिकारी। अश्रुपूर्ण – आँसुओं से भरी हुई। बिरानी – पराई या सुनसान।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में राजा गंगाधर राव भी असामयिक मृत्यु के बाद लॉर्ड डलहौजी की ‘हड़प नीति’ का वर्णन किया गया है। राजा के निःसंतान मरने पर अंग्रेज झाँसी को लावारिस मानकर उस पर कब्जा करने पहुँच गए थे।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि जब झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हुई और झाँसी का दीपक बुझ गया, तब ब्रिटिश गवर्नर जनरल डलहौजी मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ। उसे झाँसी के राज्य को हड़पने का यह सबसे अच्छा अवसर लगा, क्योंकि राजा नि:संतान मरे थे।
उसने तुरंत अपनी सेनाएँ भेजकर झाँसी के किले पर अपना झंडा फहरा दिया। डलहौजी ने इस प्रकार व्यवहार किया जैसे वह उस लावारिस राज्य का असली वारिस बनकर आया हो। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी आँखों में आँसू भरकर देखा कि उनकी प्रिय झाँसी अब बिरानी (पराई ) हो रही थी और उस पर शत्रुओं का अधिकार हो रहा था।
बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) के मुख से हमने यही कहानी सुनी है कि वह झाँसी वाली रानी युद्ध के मैदान में पुरुषों की भाँति वीरता से लड़ी थी।
काव्यांश – 7
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फ़िरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह
दासी अब महरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥ (पृष्ठ 179)
शब्दार्थ : अनुनय-विनय – प्रार्थना। विकट – कठिन। फ़िरंगी – अंग्रेज। माया – छल-कपट। पैर पसारे – विस्तार करना। पलट गई काया – किसी स्थिति का पूरी तरह बदल जाना। नव्वाबों – शासक (कविता में नव्वाबों शब्द उन शासकों के लिए हुआ है जो उस समय अलग-अलग रियासतों पर शासन करते थे)। ठुकराया – अपमानित करना अस्वीकार करना।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने बताया है कि किस प्रकार अंग्रेज भारत में व्यापारी बनकर आए थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने यहाँ के राजाओं और नवाबों को अपमानित कर पूरे देश पर कब्जा कर लिया।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि अंग्रेजों की माया बहुत विचित्र और कुटिल (कपटपूर्ण) है। वे किसी की प्रार्थना या विनती नहीं सुनते। जब ये अंग्रेज भारत आए थे, तब वे केवल एक साधारण व्यापारी थे और यहाँ के राजाओं से व्यापार की दया और अनुमति माँगते थे।
परंतु समय के साथ लार्ड डलहौजी ने धीरे-धीरे पूरे भारत में अपने पैर पसार लिए। जो अंग्रेज कभी हाथ जोड़कर खड़े रहते थे, आज उन्होंने बड़े-बड़े राजाओं और नवाबों को भी अपमानित कर उनकी सत्ता को अस्वीकार कर दिया है।
स्थिति यह हो गई है कि जो रानियाँ महलों में राज करती थीं, वे अब दासियों की तरह असहाय हो गई हैं और जो अंग्रेज व्यापार के लिए दास बनकर आए थे, वे अब यहाँ के शासक बनकर बैठ गए हैं। बुंदेलखंड के लोकगायकों के मुख से हमने यही सुना है कि वह वीरता के साथ लड़ने वाली रानी झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं।

विशेष-
- ऐतिहासिक चित्रण – अंग्रेजों के व्यापार से शासक बनने तक के सफर का प्रभावशाली चित्रण है।
- मुहावरों का प्रयोग – ‘पैर पसारना’ और ‘काया पलटना ‘ जैसे मुहावरों ने भाषा को जीवंत बना दिया है।
- विरोधाभास – ‘रानी दासी बनी’ और ‘दास अब शासक बन बैठे थे’ के माध्यम से सत्ता परिवर्तन के दर्द को उभारा गया है।
- रस – इसमें ओज गुण और वीर रस की योग है।
- शैली – कविता सरल खड़ी बोली में है जो सीधे हृदय पर प्रभाव डालती हैं।
काव्यांश – 8
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की
भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी। (पृष्ठ 179)
शब्दार्थ : बातों-बात – बड़ी आसानी से। घात – धोखा।
बिसात – हैसियत। ब्रह्म – बर्मा (म्यांमार)। वज्र-निपात – बिजली
गिरना, भारी मुसीबत आना। बुंदेले हरबोलों – बुंदेलखंड के लोकगायक।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने 1857 की क्रांति से पूर्व की स्थिति का भावपूर्ण वर्णन किया है, जिसमें अंग्रेज भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर दक्षिण और सुदूर पूर्व तक के राज्यों को अपने अधिकार में लेते जा रहे थे।
व्याख्या – कवयित्री अंग्रेजों के बढ़ते प्रभुत्व का वर्णन करते हुए कहती हैं कि अंग्रेजों ने भारत की राजधानी दिल्ली को मुग़लों से छीन लिया और लखनऊ पर तो उन्होंने बहुत ही आसानी से अधिकार कर लिया। उन्होंने पेशवा को बिठूर (कानपुर जनपद का एक कस्बा) में कैद कर दिया और नागपुर पर भी धोखे से हमला कर उसे हड़प लिया।
जब दिल्ली, लखनऊ और नागपुर जैसे बड़े शहरों का यह हाल हुआ तो उदयपुर, तंजौर, सतारा और कर्नाटक जैसे छोटे शहरों की क्या हैसियत थीं? उन्हें भी अंग्रेजों ने कुचल डाला और उनपर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इस प्रकार, सिंध, पंजाब और बर्मा (म्यांमार) पर भी अंग्रेजों का भीषण आक्रमण हुआ। आगे वे भी पराधीन हो गए। बंगाल और मद्रास (अब चेन्नई) जैसे प्रांतों की भी यही कहानी थी, वे भी अंग्रेजों के गुलाम बन चुके थे।
बुंदेलखंड के लोकगायकों के माध्यम से हमने यही वीरता की गाथा सुनी है कि ऐसी विषम परिस्थितियों में भी झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने डटकर मुकाबला किया और वह अंग्रेजों से पुरुषों के समान वीरता से लड़ीं।
विशेष-
- भौगोलिक विस्तार – भारत के मानचित्र पर अंग्रेजों के बढ़ते कब्जे का ऐतिहासिक और भौगोलिक वर्णन सटीक है।
- भाषा – वीर रस के अनुकूल ओजस्वी भाषा और खड़ी बोली का प्रयोग।
- शब्द चयन – ‘वज्र-निपात’ और ‘घात’ जैसे शब्दों का प्रयोग अंग्रेजों की निर्दयता को स्पष्ट करता है।
- शैली – यह एक वीरगाथात्मक कविता है जो पाठकों में देशभक्ति का संचार करती है।
काव्यांश – 9
रानी रोईं रनिवासों में बेगम राम से थीं बेजार
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
‘नागपूर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार,’
यों परदे की इज्जत पर-
देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 180)
शब्दार्थ : रनिवासों – रानियों के रहने का स्थान। बेज़ार – दुखी / परेशान। कलकत्ते के बाज़ार – कोलकाता के बाज़ार। सरे आम – सबके सामने। नीलाम – सार्वजनिक बोली लगाकर बेचना। परदे की इज्जत – स्त्रियों की मान-मर्यादा। बिकानी – बिक जाना (यहाँ दूसरों के नियंत्रण में हो जाना)।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने अंग्रेजों की नीचता और संवेदनहीनता का चित्रण किया है। जब अंग्रेजों ने भारतीय राज्यों पर कब्जा किया, तो उन्होंने न केवल ज़मीन छीनी, बल्कि राजघरानों की रानियों के गहने और कपड़े तक सरेआम बाज़ारों में नीलाम किए।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि अंग्रेजों के अत्याचारों के कारण रानियाँ अपने रनिवासों में रो रही थीं और वे दुख व शोक से बेहाल थीं। अंग्रेजों की निर्लज्जता का यह आलम था कि वे रानियों के कीमती गहने और कपड़े कलकत्ता के बाज़ारों में बेच रहे थे।
अंग्रेजों के समाचार पत्रों में सरेआम इन चीज़ों की नीलामी के विज्ञापन छपते थे । उन विज्ञापनों में लिखा होता था-
“नागपुर के जेवर ले लो” या “लखनऊ के नौलखा हार खरीद लो।” इस प्रकार जो भारतीय नारियाँ परदे में रहकर अपनी मान-मर्यादा की रक्षा करती थीं, आज उनकी इज्जत विदेशियों के हाथों सरेआम बाजारों में बिक रही थीं।
बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) के मुख से हमने यही वीरगाथा सुनी है कि ऐसी अपमानजनक स्थिति के विरुद्ध झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई पुरुषों के समान वीरता से युद्ध के मैदान में लड़ी थीं।
विशेष-
- मार्मिक चित्रण – राजघरानों की दुर्दशा और स्त्रियों के अपमान की अत्यंत दुखद और संजीव चित्रण है।
- ऐतिहासिक सत्य – यह अंश अंग्रेजों द्वारा की गई लूट-खसोट और भारतीय संस्कृति के अपमान को दर्शाता है।
- भाषा – सरल और ओजपूर्ण खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
- भावुकता – पंक्तियों में करुणं रस और वीर रस का अनूठा चित्रण है, जो पाठक के मन में अंग्रेजों के प्रति रोष उत्पन्न करता है।
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काव्यांश – 10
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो
सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 180)
शब्दार्थ : कुटियों – छोटी-छोटी झोंपड़ियाँ या घर। विषम वेदना – गहरा या कठिन दुख। आहत अपमान – चोट पहुँचा हुआ सम्मान/बेइज्जती का घाव। पुरखों – पूर्वजों। अभिमान – गौरव गर्व। रण-चंडी – युद्ध की देवी (दुर्गा का स्वरूप)। आह्वान – पुकारना। यज्ञ – यहाँ इसका अर्थ स्वतंत्रता संग्राम रूपी पवित्र संघर्ष से है।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने उस समय की विषम परिस्थितियों का वर्णन किया है जब अंग्रेजों की नीतियों से भारत के हर वर्ग में असंतोष था । यहाँ रानी लक्ष्मीबाई और उनके सहयोगियों द्वारा स्वतंत्रता के महायज्ञ को प्रारंभ करने का सजीव चित्रण किया गया है।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि अंग्रेजों के शासन में झोंपड़ियों में रहने वाले गरीब लोग विषम वेदना (गहरे कष्ट ) झेल रहे थे, वहीं महलों में रहने वाले राजा-महाराजा अपने अपमान से दुखी और आहत थे। भारतीय वीर सैनिकों के मन में अपने पूर्वजों का गौरव और स्वाभिमान अभी भी जीवित था, जो उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने को उकसा रहा था।
इसी बीच, नाना धुंधूपंत पेशवा युद्ध के लिए आवश्यक युद्ध – सामग्री और संसाधन जुटा रहे थे। दूसरी ओर उनकी बहन छबीली ने ‘रण-चंडी’ का रूप धारण कर लिया और खुलेआम युद्ध का आह्वान (घोषणा) कर दिया। इस प्रकार स्वतंत्रता का वह पवित्र यज्ञ शुरू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य सोई हुई देशभक्ति की ज्योति को पुनः जगाना था।
अंत में कवयित्री बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) का हवाला देते हुए कहती हैं कि हमने उनके मुख से यही सुना है कि झाँसी की रानी पुरुषों के समान अदम्य साहस के साथ अंग्रेजों से लड़ी थीं।
विशेष-
- रस – इसमें वीर रस की प्रधानता है, जो पाठक में जोश भर देती है।
- भाषा – सरल, सुबोध और ओजपूर्ण खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
- शैली – वर्णनात्मक और ओजस्वी शैली है।
- अलंकार – ‘सोई ज्योति जगानी थी’ प्रतीकात्मक प्रयोग है।
- तुकबंदी – अपमान अभिमान सामान आह्वान’ जैसे शब्दों से कविता में गेयता और प्रवाह उत्पन्न हुआ है।
- प्रतीक – ‘यज्ञ’ शब्द का प्रयोग स्वतंत्रता संग्राम की पवित्रता को दर्शाने के लिए किया गया है।
काव्यांश – 11
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी
कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 180)
शब्दार्थ : ज्वाला – आग की लपटें (यहाँ विद्रोह की तीव्रता)। सुलगाई – आग लगाई (कविता में विद्रोह या क्रांति की आग भड़काने के अर्थ में)। चिनगारी – आग की छोटी चिंगारी (कविता में क्रांति की शुरुआत या विद्रोह के छोटे बीज का प्रतीक)। अंतरतम – हृदय की गहराई से। चेती – जाग्रत हुई। लपटें – युद्ध या विद्रोह का विस्तार। धूम मचाई – बहुत प्रभाव डालना / सक्रिय होना। हलचल – विद्रोह के संकेत। उकसानी भड़काना। मर्दानी – पुरुषों के समान पराक्रमी।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने बताया है कि स्वतंत्रता की चिंगारी किसी एक स्थान तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पूरे भारत में फैल चुकी थी। इसमें समाज के हर वर्ग (अमीर-गरीब) की भागीदारी और विद्रोह के प्रमुख केंद्रों का वर्णन है।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि आजादी की इस लड़ाई में महलों (राजाओं) ने आग दी, तो झोंपड़ियों (आम जनता) ने उस ज्वाला को सुलगाकर और बड़ा कर दिया। इसका अर्थ है कि व्रिदोह की शुरुआत भले ही उच्च वर्ग से हुई, पर उसे असली ताकत आम जनता के समर्थन से मिली। यह स्वतंत्रता की भावना किसी के थोपने से नहीं, बल्कि लोगों के अपने हृदय की गहराई से निकली थी।
विद्रोह की लहर तेजी से फैली। झाँसी जागी, दिल्ली जागी और लखनऊ में भी व्रिदोह की लपटें छा गईं। मेरठ, कानपुर और पटना जैसे शहरों ने आज़ादी की इस जंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और भारी धूम मचाई। इतना ही नहीं, दक्षिण की ओर जबलपुर और कोल्हापुर में भी विद्रोह की कुछ हलचल साफ दिखाई दे रही थी।
कवयित्री कहती हैं कि बुंदेलखंड के लोकगायक ‘हरबोलों’ के मुख से हमने यही कहानी सुनी है कि झाँसी की रानी (लक्ष्मीबाई) युद्ध के मैदान में पुरुषों के समान वीरता से लड़ी थीं।
विशेष-
- विद्रोह की व्यापकता – इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री ने यह सिद्ध किया है कि 1857 का संग्राम एक राष्ट्रीय विद्रोह था, जो उत्तर से लेकर दक्षिण तक फैला था।
- एकता का प्रतीक – ‘महलों’ और ‘झोंपड़ी’ का साथ आना वर्ग-भेद से ऊपर उठकर राष्ट्रप्रेम को दर्शाता है।
- भाषा – वीर रस के अनुकूल ओजपूर्ण और सरल खड़ी बोली का प्रयोग।
- अलंकार – ‘लपटें छाई थीं’, ‘ज्वाला सुलगाई थी’ में प्रतीकात्मक प्रयोग है।
- रस – वीर रस का सटीक प्रयोग पाठक के मन में उत्साह और गौरव का भाव जगाती है।
काव्यांश – 12
इस स्वतंत्रता – महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास- गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती
उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 181
शब्दार्थ : स्वतंत्रता-महायज्ञ – आजादी के लिए किया गया सामूहिक संघर्ष। वीरवर – वीरों में श्रेष्ठ। आए काम – शहीद होना (बलिदान देना)। सरनाम – प्रसिद्ध। अभिराम – सुंदर या आकर्षक (यहाँ गौरवशाली व्यक्तित्व के लिए)। इतिहास-गगन – इतिहास रूपी आकाश। जुर्म – अपराध। कुरबानी – बलिदान।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के साथ-साथ उन अन्य वीर क्रांतिकारियों का उल्लेख किया है जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यहाँ उनके त्याग और उस समय की विडंबना को दर्शाया गया है।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि स्वतंत्रता के इस महान यज्ञ (संग्राम) में देश के कई श्रेष्ठ वीर काम आए यानी शहीद हो गए। इनमें नाना धुंधूपंत ताँतिया टोपे, चतुर अजीमुल्ला खाँ, अहमद शाह मौलवी और ठाकुर कुँवरसिंह जैसे साहसी और सुंदर व्यक्तित्व वाले सैनिक शामिल थे। इन सभी वीरों के नाम भारत के इतिहास रूपी आकाश में हमेशा सितारों की तरह अमर रहेंगे।
विडंबना यह थी कि जिस देश की आज़ादी के लिए इन वीरों ने अपना सब कुछ त्याग दिया, अंग्रेजों के शासन में उनकी वही कुर्बानी ‘जुर्म’ कहलाती थी। अंग्रेज उन्हें विद्रोही और अपराधी मानते थे।
अंत में कवयित्री दोहराती हैं कि बुंदेलखंड के लोकगायकों से हमने यही सुना है कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में पुरुषों जैसी वीरता के साथ लड़ी थीं।
विशेष-
- श्रद्धांजलि – कवयित्री ने रानी के साथ-साथ अन्य क्रांतिकारियों के योगदान को भी रेखांकित किया है, जो इतिहास की व्यापकता को दर्शाता है।
- इतिहास-गगन में रूपक अलंकार – यहाँ ‘इतिहास’ को ‘आकाश’ माना गया है, जिसमें वीरों के नाम चमक रहे हैं।
- शब्द चयन – ‘स्वतंत्रता महायज्ञ’ जैसे शब्दों के प्रयोग से आंदोलन की पवित्रता प्रकट होती है।
- भाषा – वीर रस से ओत-प्रोत खड़ी बोली, जो सरल और प्रभावशाली है।
- ऐतिहासिक – यह काव्यांश 1857 के वास्तविक नायकों का परिचय कराता है।
काव्यांश – 13
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वॉकर भागा,
उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 181)
शब्दार्थ : गाथा – कहानी। मर्दानों में – पुरुषों के बीच। द्वंद्व – दो वीरों के बीच होने वाला युद्ध (मल्लयुद्ध)। असमानों – जो बराबर न हों (यहाँ रानी और वॉकर की तुलना के संदर्भ में)। अजब – विचित्र। हैरानी – आश्चर्य।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री अन्य क्रांतिकारियों की गाथा को पीछे छोड़ते हुए सीधे झाँसी के युद्ध मैदान का दृश्य प्रस्तुत करती हैं। यहाँ रानी लक्ष्मीबाई द्वारा अंग्रेज अधिकारी वॉकर को परास्त करके और उनकी वीरता से वॉकर के चकित होने का वर्णन है।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि अन्य वीरों की कहानियों को छोड़कर अब झाँसी के उन मैदानों की ओर चलते हैं, जहाँ युद्ध छिड़ा हुआ है, वहाँ रानी लक्ष्मीबाई पुरुषों के बीच एक वीर पुरुष बनकर खड़ी हैं। इसी बीच अंग्रेज लेफ्टिनेंट वॉकर अपनी सेना के साथ वहाँ पहुँचता है और सैनिकों के बीच से आगे बढ़कर रानी को चुनौती देता है।
रानी लक्ष्मीबाई तुरंत अपनी तलवार खींच लेती हैं और दोनों के बीच भीषण युद्ध हो जाता है। कवयित्री इस युद्ध को ‘असमानों का द्वंद्व’ कहती हैं, क्योंकि एक ओर मदांध (अहंकारी) अंग्रेज अधिकारी था और दूसरी ओर भारत की वीर नारी। रानी के प्रहारों से लेफ्टिनेंट वॉकर बुरी तरह जख्मी हो जाता है, और अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग खड़ा होता है। वह एक महिला की ऐसी वीरता और युद्ध कौशल देखकर अत्यधिक हैरान रह जाता है।
अंत में कवयित्री कहती हैं कि बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) से हमने यही सुना है कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई युद्ध में पुरुषों की तरह बहुत वीरता से लड़ी थीं।
विशेष-
- वीर रस की अभिव्यक्ति – पंक्तियों में ओजपूर्ण गुण और वीर रस का पूर्ण परिपाक (मिलन) हुआ है।
- अलंकार – ‘मर्द बनी मर्दानों में अनुप्रास अलंकार है। ‘द्वंद्व असमानों’ द्वारा युद्ध की विशिष्टता बताई गई है।
- ऐतिहासिक घटना – यह काव्यांश झाँसी के युद्ध की एक वास्तविक घटना को दर्शाता है।
- नारी शक्ति का चित्रण – यहाँ रानी को ‘अबला’ नहीं बल्कि ‘मर्द’ (शक्तिशाली) के रूप में प्रस्तुत कर नारी सशक्तीकरण का संदेश दिया गया है।
- प्रवाह – खड़ी बोली का प्रयोग सरल और प्रभावपूर्ण है, जो युद्ध का चित्र आँखों के सामने खींच देता है।
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काव्यांश – 14
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया
ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 181-182)
शब्दार्थ : कालपी – एक स्थान (उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक नगर)। निरंतर – लगातार। तत्काल सिधार – तुरंत मर जाना (यहाँ शहीद होना)। अधिकार – कब्जा। सिंधिया – ग्वालियर के तत्कालिन शासक। रजधानी – हेडक्वार्टर।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में रानी लक्ष्मीबाई के निरंतर संघर्ष का चित्रण है। झाँसी के बाद रानी द्वारा कालपी की यात्रा, उनके प्रिय घोड़े का बलिदान, यमुना तट पर अंग्रेजों की पराजय और अंततः ग्वालियर पर अधिकार करने की ऐतिहासिक घटना का वर्णन किया गया है।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि झाँसी से निकलने के बाद रानी लक्ष्मीबाई लगातार सौ मील का रास्ता तय करके कालपी पहुँचीं। इतनी लंबी और तेज यात्रा के कारण उनका घोड़ा बुरी तरह थक गया और जमीन पर गिरते ही उसने प्राण त्याग दिए।
इसके बाद, यमुना तट पर एक बार फिर रानी और अंग्रेजों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेज़ों को फिर से हार का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद रानी आगे बढ़ी और उन्होंने ग्वालियर पर अपना अधिकार कर लिया। ग्वालियर के राजा सिंधिया, जो अंग्रेजों के मित्र थे, रानी के डर से अपनी राजधानी छोड़कर भाग खड़े हुए।
अंत में, कवयित्री कहती हैं कि बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) से हमने यही सुना है कि झाँसी की रानी पुरुषों जैसी वीरता के साथ अंत तक लड़ती रहीं।

विशेष-
- ऐतिहासिक सत्य – यह काव्यांश रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध कौशल और उनके साहस के ऐतिहासिक तथ्यों को उजागर करता है।
- घोड़े का बलिदान – पशु और मनुष्य के बीच भावनात्मक संबंध और कर्तव्य के प्रति पशु के समर्पण को भी यहाँ दर्शाया गया है।
- रस – इन पंक्तियों में उत्साह और विजय का भाव है, जो वीर रस की सृष्टि करता है।
- भाषा – सरल खड़ी बोली का प्रयोग है जिसमें प्रवाह और लयबद्धता है।
- विरोधाभास – यहाँ रानी की वीरता और ग्वालियर के राजा की कायरता के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से दिखाया गया है।
काव्यांश – 15
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यू रोज आ गया,
हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 182)
शब्दार्थ : सन्मुख – सामने। मुँह की खाना – बुरी तरह हारना। काना और मंदरा – रानी लक्ष्मीबाई की दो वीर सखियाँ। भारी
मार मचाना – वीरता के साथ शत्रुओं का संहार करना। घिरी – चारों ओर से शत्रुओं द्वारा घेर लिया जाना।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में ग्वालियर की विजय के बाद रानी लक्ष्मीबाई के सामने आई नई चुनौतियों का वर्णन है। यहाँ रानी की सखियाँ-काना और मंदरा के युद्ध कौशल और रानी के दो तरफा अंग्रेज सेना के बीच घिर जाने की विडंबना को दर्शाया गया है।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि ग्वालियर पर अधिकार करने के बाद रानी को विजय तो मिली, लेकिन वह सुख क्षणिक थी, क्योंकि अंग्रेजों की सेना ने उन्हें फिर से घेर लिया। इस बार रानी के सामने जनरल स्मिथ की सेना थी। रानी ने उसे युद्ध में परास्त कर दिया था।
इस युद्ध में रानी अकेली नहीं थीं, उनकी दो सखियाँ काना और मंदरा भी उनके साथ थीं। इन दोनों वीरांगनाओं ने भी युद्ध क्षेत्र में अपनी तलवारों से शत्रुओं के बीच तबाही मचा दी थी और अद्भुत पराक्रम दिखाया था। लेकिन तभी स्मिथ को हराने के बाद एक दुखद् मोड़ सामने आया, पीछे की ओर से अंग्रेज अधिकारी ह्यूरोज अपनी सेना लेकर आ पहुँचा। अब रानी दोनों ओर से अंग्रेज सेनाओं के बीच घिर गई थीं।
बुंदेलखंड के लोकगायकों के मुख से हमने यही कहानी सुनी है कि झाँसी की रानी अंत तक पुरुषों की तरह वीरता से लड़ती रहीं।
विशेष-
- नारी शक्ति का प्रदर्शन – कवयित्री ने केवल रानी ही नहीं, बल्कि उनकी सखियों के माध्यम से भारतीय नारी के शौर्य को रेखांकित किया है।
- वीर और करुण रस का मेल – इन पंक्तियों में जहाँ एक ओर वीरता का वर्णन है, वहीं ‘हाय! घिरी अब रानी थी ‘ में करुणा और चिंता का भाव भी झलकता है।
- मुहावरेदार भाषा – ‘मुँह की खाई थी’ जैसे मुहावरों के प्रयोग से भाषा अधिक प्रभावशाली हो गई है।
- ऐतिहासिक घटनाक्रम – यह 1857 की क्रांति के अंतिम चरण की वास्तविक परिस्थितियों का सजीव चित्रण है जब रानी दोनों ओर से दुश्मनों से घिर गई थीं।
- भाषा – ओजपूर्ण और सरल खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
काव्यांश – 16
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी
उसे वीर गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 182)
शब्दार्थ : सैन्य के पार – सेना को पार करके। विषम अपार – बहुत कठिन और बड़ी (मुसीबत)। घोड़ा अड़ा – घोड़े का रुक जाना। शत्रु – दुश्मन। बहुतेरे – बहुत सारे। सिंहनी – शेरनी (यहाँ रानी के लिए प्रयुक्त)। वीर-गति – युद्ध में लड़ते हुए सम्मानजनक मृत्यु प्राप्त करना।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम युद्ध का वर्णन है। जब रानी शत्रुओं की सेना को चीरते हुए आगे बढ़ रही थीं, तभी एक नाला सामने आया और नया घोड़ा नाले के पास जाकर रूक गया। इतने में शत्रुओं ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया और वे वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गईं।
व्याख्या – कवयित्री वर्णन करती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई शत्रुओं को काटते हुए और भीषण मार-काट मचाते हुए अंग्रेजी सेना के पार निकल गईं। लेकिन तभी अचानक सामने एक नाला आ गया। यह रानी के लिए एक अपार संकट था, क्योंकि उनका पुराना और प्रशिक्षित घोड़ा मारा जा चुका था और यह नया घोड़ा था। वह नया होने के कारण नाला पार करने के बजाय वहीं अड़ गया।
इतने में पीछा करते हुए अंग्रेज घुड़सवार वहाँ पहुँच गए। रानी अकेली थीं और शत्रु बहुत सारे थे। दोनों ओर से वार पर वार होने लगे। अंत में, वह वीर सिंहनी (रानी) घायल होकर भूमि पर गिर पड़ीं। उन्हें देश के लिए वीर गति प्राप्त करनी थी, और वे लड़ते-लड़ते शहीद हो गईं।
बुंदेलखंड के लोकगायकों के मुख से हमने यही कहानी सुनी है कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने पुरुषों के समान साहस दिखाकर अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया।
विशेष-
- करुण और वीर रस – इन पंक्तियों में वीरता के साथ-साथ एक महान वीरांगना के अंत का करुण चित्रण है।
- उपमा और रूपक – रानी को ‘सिंहनी’ कहकर उनके अदम्य साहस को रेखांकित किया गया है।
- ऐतिहासिक महत्व – यह अंश रानी के बलिदान की उस ऐतिहासिक घटना को दर्शाता है जहाँ एक नाले के कारण वे वीरगति को प्राप्त हुई।
- भाषा – इन पंक्तियों में ओजपूर्ण खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है जो पाठक के मन में श्रद्धा और गर्व का भाव पैदा करती है।
- भावुकता – ‘रानी एक शत्रु बहुतेरे’ पँक्तियाँ रानी की विवशता और उनके महान साहस के बीच के द्वंद्व को खूबसूरती से दर्शाती हैं।
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काव्यांश – 17
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई
हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 183)
शब्दार्थ : सिधार – मृत्यु को प्राप्त होना। चिता – शव को जलाने की लकड़ी की संरचना। दिव्य – अलौकिक। तेज – चमक।
अधिकारी – पात्र (योग्य व्यक्ति)। मनुज – मनुष्य। अवतारी – ईश्वर का अंश। पथ – रास्ता।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के स्वर्गारोहण (मृत्यु) और उनके महान व्यक्तित्व का चित्रण किया है। यहाँ बताया गया है कि किस प्रकार रानी का बलिदान भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गईं और स्वर्ग सिधार गईं। अब युद्ध के मैदान का घोड़ा नहीं, बल्कि चिता उनकी अलौकिक सवारी थी। उनकी आत्मा का प्रकाश परमात्मा के प्रकाश में मिल गया; वह वास्तव में उस ईश्वरीय प्रकाश की सच्ची हकदार थीं।
रानी की आयु उस समय मात्र तेईस वर्ष थी। इतनी छोटी उम्र में उन्होंने जो वीरता दिखाई, उससे लगता था कि वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि कोई दैवीय अवतार थीं। वे एक ऐसी ‘स्वतंत्रता की देवी’ बनकर आईं जिन्होंने हम भारतीयों को गुलामी की नींद से जगाकर जीवित कर दिया। वे हमें आज़ादी का रास्ता दिखा गई और वह सीख दे गई जो हमें सीखनी जरूरी थी – कि देश के लिए सर्वस्व न्योछावर कैसे किया जाता है।
बुंदेलखंड के लोकगायक ‘हरबोलों’ के मुख से हमने यही कहानी सुनी है कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई पुरुषों के समान वीरता से लड़ी थीं।
विशेष-
- अलंकार – ‘मिला तेज से तेज’ में अनुप्रास अलंकार और आध्यात्मिक एकता का भाव है।
- श्रद्धांजलि – यहाँ रानी को ‘दैवीय अवतार’ और ‘स्वतंत्रता की देवी’ कहकर उनके प्रति सर्वोच्च सम्मान व्यक्त किया गया है।
- वीर और शांत रस – यहाँ वीरता के साथ-साथ मृत्यु के पश्चात की शांति और दिव्यता का सुंदर मिश्रण है।
- भाषा – शुद्ध, सरल और ओजपूर्ण खड़ी बोली।
- प्रेरणा – यह अंश संदेश देता है कि महापुरुष मरकर भी अपने विचारों और सीख के माध्यम से हमेशा जीवित रहते हैं।
काव्यांश – 18
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारत वासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी,
तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।। (पृष्ठ 183)
शब्दार्थ : कृतज्ञ – उपकार मानने वाला। बलिदान – किसी महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन त्याग देना। अविनाशी – जिसका कभी विनाश न हो (अमर)। मदमाती – गर्व या जोश से भरी हुई। विजय – जीत। स्मारक – यादगार अमिट – जो कभी मिट न सके। निशानी चिह्न या प्रतीक।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – इन पंक्तियों में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई को अंतिम विदाई देते हुए उनके बलिदान के महत्व को बताया है। इससे यह भाव व्यक्त होता है कि रानी का भौतिक शरीर भले ही न रहे, पर उनका यश और प्रेरणा भारतीयों के मन में हमेशा जीवित रहेगी।
व्याख्या – कवयित्री कहती हैं कि हे रानी! अब आप स्वर्ग सिधार जाइए, हम सभी भारतवासी आपके इस महान बलिदान के प्रति हमेशा कृतज्ञ (आभारी) रहेंगे। आपका यह बलिदान भारत में ऐसी स्वतंत्रता की ज्योति जलाएगा जो कभी नष्ट नहीं होगी।
भले ही इतिहास आपके बारे में चुप हो जाए, भले ही सच बोलने वालों को फाँसी पर चढ़ा दिया जाए या फिर गोलों की बौछार से झाँसी का नामोनिशान मिटा दिया जाए, लेकिन आपकी वीरता को कोई नहीं मिटा पाएगा। अंत में कवयित्री कहती हैं कि हे रानी! आपको किसी स्मारक की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप स्वयं अपनी एक ऐसी यादगार हैं जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता। आपका व्यक्तित्व ही आपका सबसे बड़ा स्मारक है।
बुंदेलखंड के हरबोलों से हमने यही सुना है कि झाँसी की रानी पुरुषों के समान अदम्य साहस के साथ अंग्रेजों से लड़ी थीं।
विशेष-
- भावपूर्ण श्रद्धांजलि – कवयित्री ने रानी को एक अमर सेनानी के रूप में चित्रित किया है।
- अलंकार – ‘तेरा स्मारक तू ही होगी’ में अनन्वय अलंकार की झलक है (जहाँ उपमेय की समानता उपमेय से ही की जाए)।
- भाषा – ओजपूर्ण, सरल और प्रभावशाली खड़ी बोली का प्रयोग।
- राष्ट्रीय भावना – कविता का यह अंश देशप्रेम और बलिदान की भावना से ओत-प्रोत है।
- वीर रस – पूरी कविता की तरह यहाँ भी वीर रस का-प्रवाह है जो पाठक को गौरव की अनुभूति कराता है।
Class 9 Hindi Chapter 11 झाँसी की रानी Summary
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फ़िरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ
उसको याद ज़बानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
की युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी
भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाईं झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया,
शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजाजी
रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
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बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा
झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फ़िरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह
दासी अब महरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की
भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी रोईं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेजार
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
‘नागपूर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’,
यों परदे की इज़्ज़त पर-
देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो
सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी
कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती
उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबालों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,

जख्मी होकर वॉकर भागा,
उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया
ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
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विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,

पर, पीछे ह्यू रोज आ गया,
हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी
उसे वीर गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई
हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारत वासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी,
तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।

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