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Class 7 Social Science Chapter 6 Question Answer in Hindi पुनर्गठन का काल
पुनर्गठन का काल Question Answer in Hindi
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 के प्रश्न उत्तर पुनर्गठन का काल
प्रश्न 1.
मौर्योत्तर काल को कभी-कभी ‘पुनर्गठन का काल’ क्यों कहा जाता है? ( पृष्ठ 117)
उत्तर:
मौये साम्राज्य एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य था, जिसने भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया।
- सम्राट अशोक के बाद साम्राज्य का पतन शुरू हो गया।
- मौर्य साम्राज्य का अंत लगभग 185 ई.पू. में हो गया।
- मौर्य साम्राज्य के अंत के बाद भारत कई छोटे-छोटे राज्यों और क्षेत्रों में बँट गया।
- ये छोटे राज्य अपनी संस्कृति को स्थापित और विकसित करने लगे।
- इस काल में शुंग. सातवाहन, कुषाण और गुप्त जैसे नए शक्तिशाली राज्यों का उद्य हुआ।
- अलग-अलग भागों में, शासकों ने अपनी भाषाओं, संस्कृतियों, रीति-रिवाजों को आगे बढ़ाया, जिससे पुनर्गठन काल प्रतिस्थापित हुआ।
प्रश्न 2.
वह कौन-से मूल्य और सिद्धांत थे जिन्होंने इस काल के सम्राटों का मार्गदर्शन किया? ( पृष्ठ 117)
उत्तर:
पुनर्गठन के युग के दौरान सम्राटों के मूल्य और सिद्धांत-
- न्याय-कई शासकों का लक्ष्य न्यायपूर्ण शासन करना और अपने लोगों के अधिकारों की रक्षा करना था।
- धर्म-अशोक से प्रेरित होकर कई शासकों ने धर्म का मार्ग अपनाया जिसका अर्थ है अच्छे आचरण और नैतिक कर्तव्यों का पालन।
- धार्मिक सहिष्णुता-कुषाण शासकों ने बौद्ध. हिन्दू और जैन जैसे कई धर्मों का समर्थन किया।
- संस्कृति के प्रति सम्मान-कला, साहित्य और शिक्षा को बढ़ावा दिया ताकि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएँ सुरक्षित रहें।
- जनकल्याण-सड़कें, विश्राम गृह, सिंचाई प्रणाली बनाई और व्यापार को बढ़ावा दिया ताकि रोजगार में बढ़ोतरी हो।
- मजबूत प्रशासन-सम्राटों ने संगठित शासन प्रणाली की स्थापना की, मंत्रियों और अधिकारियों की मद्द से साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों को सभाला।
- व्यापार को प्रोत्साहन-आंतरिक और विदेशी व्यापार को बढ़ावा दिया विशेषकर कुषाणों ने भारत को रेशम मार्ग (सिल्क रूट) से जोड़ा।
- विविधता में एकता-शासकों ने अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान किया, जिससे शांति और सौहार्द बना रहे।
- सुरक्षा और संरक्षण-शक्तिशाली सेनाएँ तैयार की ताकि लोगों और राज्यों को आक्रमणकारियों से बचाया जा सके।
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प्रश्न 3.
विदेशी आक्रमणकारियों ने किस प्रकार भारतीय समाज में समाहित होकर सांस्कृतिक संगम में योगदान दिया? ( पृष्ठ 117)
उत्तर:
विदेशी आक्रमणकारियों के भारत में सांस्कृतिक संगम में योगदान को निम्न तथ्यों से समझा जा सकता है-
(i) भारत में बसना-कई विदेशी आक्रमणकारियों जैसे-कुषाण, शक और यूनानी सिर्फ लड़े और वापस नहीं गए बल्कि भारत में ही बस गए, स्थानीय लोगों से विवाह किए और इस भूमि को अपना घर बना लिया।
(ii) भारतीय रीति-रिवाजों को अपनाना-इन शासकों ने भारतीय भापा वस्त्र, भाजन और स्थानीय परम्पगाएँ अपनाई। उन्हाने हिंदु और वांद्ध धर्म जंमे भाग्नीय धर्मों का भी अपनाया।
(iii) कला और संस्कृति को बढ़ावा-उन्होंने भारतीय मूर्तिकला, वास्तुकला और साहित्य को प्रोत्साहन दिया।
उदाहरणत:-गांधार कला यूनानी, रोमन और भारतीय शैलियों का मिश्रण थी, जो कुषाणों के समय विकसित हुईं।
(iv) शिक्षा को प्रोत्साहन-विदेशी शासकों ने विश्वविद्यालय और पुस्तकालय बनाने में मदद की। उन्होंने भारतीय ग्रन्थों का अध्ययन और अनुवाद करवाया।
(v) सांस्कृतिक आदान-प्रदान-
- विदेशियों ने नए विचार, सिक्के लिपियाँ और व्यापारिक वस्तुएँ लाए।
- भारतीय संस्कृति ने भी उन पर प्रभाव डाला, जिससे एक नई संस्कृति का जन्म हुआ।
(vi) व्यापार और बौद्ध धर्म का विकास-
- कुषाणों ने रेशम मार्ग (सिल्क रूट) को प्रोत्साहित किया, जिससे भारत मध्य एशिया और चीन से जुड़ा।
- उन्होंने बौद्ध धर्म को भी चीन और मध्य एशिया जैसे देशों में फैलाने में मदद की।
- परिणाम-भारतीय और विदेशी संस्कृतियों का मेल सांस्कृतिक संगम कहलाया। इससे समाज में कला, धर्म, साहित्य, भाषा और परंपराओं के क्षेत्र में विविधता और समृद्धता आई।
आइए पता लगाएँ ( पृष्ठ 118)
प्रश्न 1.
एक पृष्ठ पर दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. के प्रारंभिक वर्ष से लेकर तीसरी शताब्दी सा.सं. के अंतिम वर्ष तक की अवधि को चिह्नित करते हुए एक समय-रेखा बनाइए। यह अवधि कुल कितने वर्षों को सम्मिलित करती है? जैसे-जैसे हम अध्याय में आगे बढ़ेंगे, समय-रेखा पर प्रमुख व्यक्तियों, राज्यों और घटनाओं को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
200 ई.पू. (दूसरी शताब्दी ई.पू. की शुरूआत) से 300 ई. (तीसरी शताब्दी ई. का अंत) तक का इतिहास। यह काल 500 वर्षों का है। इसमें मौर्य साम्राज्य का अंत काल, शुंग और सातवाहन वंश का उदय, इंडो-ग्रीक और कुषाणों का प्रभाव, तथा प्रतिष्ठित भारतीय सभ्यता के प्रारंभिक चरण सम्मिलित हैं।

– 200 ई.पू. से 101 ई.पू. तक ( दूसरी शताब्दी ई.पू. )
(A) 187 ई.पू.-अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या।
(B) 185 ई.पू.-पुष्यमित्र शुंग द्वारा शुंग वंश की स्थापना।
(C) 180 ई.पू.-इंडो-ग्रीक शासकों ने उत्तरपश्चिमी भारत में अपने पैर जमाए।
(D) 150 ई.पू.-मौर्यों के पतन के बाद, दक्षिण में सातवाहन वंश का उदय हुआ।
(E) 100 ई.पू.-चेदियों का आगमन हुआ।
- 100 ई.पू. से 100 ई. ( पहली शताब्दी ई.)
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(F) 75 ई.पू.-शुंग वंश का पतन।
(G) 68 ई.पू.-शक (इंडो-सिथियन) पश्चिमी भारत में बसने लगे।
- सातवाहनों ने मध्य और दक्षिणी भारत में अपना प्रभाव बढ़ाया।
(H) 50 ई.-गौतमीपुत्र शातकर्णी के शासन के दौरान सातवाहनों का सत्ता चरमोत्कर्ष।
(I) 78 ई.-भारतीय कैलेंडर में प्रयुक्त शक संवत् की शुरूआत।
(J) 80-100 ई.-कुषाण साम्राज्य का उदय।
- हिंद महासागर के मार्गों के माध्यम से रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार का विकास।
- दूसरी शताब्दी ई. ( 101-200 ई.)
(K) 127-150 ई.
- बौद्ध धर्म और गांधार कला के संरक्षक महान राजा कनिष्क का शासन काल।
- मध्य और पूर्व एशिया में महायान बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार।
- संस्कृत साहित्य, चिकित्सा और खंगोलीय ग्रन्थों (आयुर्वेद, ज्योतिष का शुरूआती रूप) का विकास।
- दूसरी शताब्दी के अंत में सातवाहन वंश का पतन।
तीसरी शताब्दी ई. ( 201-300 ई.)
(L) 250 ई.-कुषाण साम्राज्य का क्रमिक पतन।
प्रश्न 2.
पिछले अध्याय में आपने मौर्य साम्राज्य का मानचित्र देखा (चित्र 5.13 पाठ्यपुस्तक)। चित्र 6.2 (पाठ्यपुस्तक) मौर्योत्तर काल का मानचित्र है। आप उस क्षेत्र में कितने राजवंशों की गणना कर सकते हैं, जो पूर्व में मौर्य शासन के अधीन थे? ( चित्र 6.1, पृष्ठ 120 देखें ) ( पृष्ठ 120)

उत्तर:
दिए गए मानचित्र (चित्र 6.1, पृष्ठ 120 देखें) में मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत आने वाली जगहों को नारंगी रंग में दर्शाया गया है।
दिए गए मानचित्र (चित्र 6.1, पृष्ठ 120 देखें) में उन साम्राज्यों को दिखाया गया है, जो पहले मौर्य साम्राज्य के अधीन थे:
- इण्डो-ग्रीक
- कुषाण
- शुंग
- शक (इंडो-सिथियन)
- सातवाहन
- चेदि
- चेर
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प्रश्न 3.
नीचे भरहुत स्तूप की एक पट्टिका का चित्र है। दाहिने तरफ की दोनों आकृतियों को ध्यानपूर्वक देखिए। वे क्या कर रही हैं? क्या आप उनके व्यवसाय का अनुमान लगा सकते हैं? उनके परिधानों पर ध्यान दीजिए। यह हमें उनके बारे में क्या बता रहे हैं? पट्टिका में आपको जो अन्य विवरण दिखे, उन्हें सूचीबद्ध कर कक्षा में उन पर चर्चा कीजिए।

उत्तर:
दाहिने ओर की दो आकृतियाँ शिल्पकार या श्रमिक की प्रतीत होती हैं। वे किसी-न-किसी निर्माण या सजावट के काम में लगे हुए प्रतीत होते हैं-शायद स्तूप या रेलिंग पर नक्काशी या पॉलिश कर रहे हैं। उनकी झुकी हुई मुद्रा और हाथों में औजार शारीरिक श्रम का संकेत देंते हैं। उनकी वेशभूषा साधारण है।
संभवतः चलने-फिरने में आसानी के लिए, जो दर्शाता है कि वे किसी श्रमिक वर्ग से संबंधित हैं। इससे हमें पता चलता है कि कुशल कारीगरों ने स्तूप के निर्माण और सजावट में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मध्य के चिह्न जो संभवतः एक पवित्र वस्तु है समृद्ध रूप से सजाई गई है, जो बौद्ध वास्तुकला में कला और भक्ति दोनों के महत्त्व को दर्शाता है। आस-पास के नमूने और नक्काशी उस काल के उन्नत कौशल और सौंदर्य को दर्शाते हैं।

प्रश्न 4.
चित्र सं. 6.6 (NCERT) के कोलाज (चित्र समूह/संकलन ) में चित्रों को ध्यान से देखिए। कपड़ों, आभूषणों और दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं पर अपने विचार लिखिए। (पृष्ठ 124)
उत्तर:
कोलाज (चित्र संग्रह) में प्रदर्शित चित्र शुंग काल की कलात्मक उपलब्धियों को दर्शाते हैं और हमें इससे उस समय की जीवनशैली की झलक प्राप्त होती है-
(i) कपड़े-पुरुष और महिला की आकृतियों में दोनों को धोती और साड़ी जैसे लपेटे जाने वाले वस्त्रों में दिखाया गया है। इन डिजाइनों से प्लीट्स और सजावटी कपड़ों के प्रयोग का पता चलता है, जो उस काल के लोगों का कपड़े पहनने के ढंग और शैली के प्रति ध्यानाकर्षण करता है।
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(ii) आभूषण-आभूषण को कई रूपों में दर्शाया गया है-
- चूड़ियों को (चित्र 6.6.8 पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 123 ) में और हार (चित्र 6.6.10) को धातु और मोतियों के प्रयोग को दर्शाया गया है, जो यह प्रदर्शित करता है, कि व्यक्तिगत भृंगार के प्रति उस काल में विशेष झुकाव था। महिला आकृतियों (चित्र 6.6.3; 6.6.4; और 6.6.6, पाठ्यपुस्तक, पेज 123 ) में, महिला सिर पर वस्त्र और बालियाँ पहने हुए हैं, जो उस काल में अलग-अलग प्रकार के आभूषणों के प्रयोग को दर्शाते हैं।
(iii) अन्य वस्तुएँ
- (चित्र 6.6.5 पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 123) में फूलदान उस काल में सजावटी बर्तनों के प्रयोग की ओर इशारा करते हैं। जिनका प्रयोग पानी और अन्य अनुष्ठानों के लिए होता था।
- कंघी (चित्र 6.6.9 पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 123) हाथी दाँत से बनी हुई हैं, यह दैनिक जीवन में सौंदर्य व शृंगार सम्बन्धी वस्तुओं के महत्त्व को दर्शाता है।
- टेराकोटा मूर्तियाँ (चित्र 6.6.6 पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 123) और पारिवारिक जीवन के चित्रण-चित्र (चित्र 6.6.7 पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 123) में घरेलू जीवन और राजसी ठाठ-बाट को दर्शाया गया है। ये कलाकृतियाँ उस काल की शिल्पकला को प्रदर्शित करती है, तथा शुंग वंश के दौरान के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को प्रदर्शित करती हैं।
प्रश्न 5.
आपके विचार में कुछ इंडो-ग्रीक सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण या लक्ष्मी जैसे देवी-देवताओं के चित्र अंकित होने का क्या अर्थ रहा होगा? (पृष्ठ 135 )

उत्तर:
इंडो-ग्रीक सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण या लक्ष्मी आदि के चित्र अंकित होने के निम्नलिखित पहलू हो सकते हैं-
- भारतीय मान्यताओं के प्रति सम्मान-अपने सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण या देवी लक्ष्मी जैसे देवताओं को अंकित करके, उन्होंने भारतीय लोगों के धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया।
- भारतीय लोगों से जुड़ने के लिए-अपने सिक्कों पर भारतीय देवताओं का चित्र अंकित करके भारतीय स्थानीय लोगों के विश्वास को इंडो-यूनानी शासकों ने जीतने की कोशिश की। इससे वह मित्र शासक प्रतीत होने की कोशिश करने में लगे थे, जिससे भारतीय स्थानीय लोग उनको विदेशी आक्रमणकारी ना समझे।
- सिक्कों के प्रयोग और व्यापार को बढ़ावा देना-परिचित देवी-देवताओं वाले सिक्के भारतीय बाजारों में आस्था की वजह से आसानी से स्वीकार किए जाएँगे, इससे व्यापार और दैनिक लेन-देन सुचारु रूप से चलेगा। ऐसी सोच के साथ उन्होंने सम्भवतः ऐसा किया जाना प्रतीत होता है।
- सांस्कृतिक मिश्रण/संगम-ये सिक्के उस काल के यूनानी और भारतीय संस्कृतियों के मिश्रण को भी दिखाते हैं। ये सिक्के विविधता में एकता के उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं।
प्रश्न 6.
इस विशाल मूर्ति ( 1.85 मीटर ऊँची ) (चित्र 6.15 , पृष्ठ 125 देखें) को ध्यान से देखिए। इसके वस्त्र, आयुध और जूतों को देखिए। इनसे इस आकृति के बारे में क्या पता चलता है? (पृष्ठ 136)
उत्तर:
यह प्रसिद्ध ‘सिरविहीन’ मूर्ति कुषाण वंश के सबसे शक्तिशाली राजा कनिष्क की है। इस मूर्ति पर ब्राह्मी लिपि में ‘महाराजा राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क’ लिखा है। जिसका अर्थ होता है-‘राजाओं के राजा महाराजा देवपुत्र, कनिष्क’। यह चित्र उस वंश के राजाओं के वस्त्र, हथियार और मूर्ति शैली का चित्रण करती है।
प्रश्न 7.
इन ( चित्र 6.25 ) सिक्कों को ध्यान से देखिए। सम्राट के अतिरिक्त और कौन इस मुद्रा पर अंकित है? (पृष्ठ 136)

उत्तर:
इन सिक्कों को देखने से सम्राट के अतिरिक्त निम्न इन मुद्राओं पर अंकित प्रतीत होते हैं-
- रानियाँ और पारिवारिक सदस्य-कभी-कभी रानियों और शाही रिश्तेदारों को राजा के साथ या उनके विपरीत वाले हिस्से में दिखाया गया है। इससे शाही महिलाओं और शासक के परिवार की वंशावली के महत्त्व का पता चलता है।
- प्रतीक और पशु-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हाथी या बैल. शक्ति के प्रतीक के रूप में शेर या बाघ, साम्राज्यों के प्रतीक के रूप में-पांड्यों के लिए मछली, चरों के लिए धनुप-बाण आदि प्रतीकों का प्रयोग हुआ है।
- देवी-देवता-वासुदेव-कृष्ण, देवी लक्ष्मी, शिव और नन्दी आदि प्रतीकों का प्रयोग हुआ है।
- सांस्कृतिक चित्रण-कुछ सिक्कों में साधुओं, व्यापारियों और योद्धाओं की उपलब्धियों या दन्त कथाओं, किंवर्दतियों को प्रतीकों के रूप में दर्शाया हुआ है।
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प्रश्न 8.
अब आप मथुरा और गांधार कला शैलियों की मूल विशेषताओं से परिचित हो चुके हैं। नीचे दी गई कलाकृतियों को देखिए और पहचानिए। क्या आप बता सकते हैं कि चित्र में दी गई प्रत्येक कलाकृति किस कला शैली से संबंधित है? अपने विचार कारण सहित लिखिए और सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए। ( पृष्ठ 140)

उत्तर:
- चित्र (A)-यह बुद्ध की मृत्यु का एक दृश्य है। यह गांधार कला शैली से संबंधित है। यह भूरे रंग के शिष्ट पत्थरों और रोमन-यूनानी कला शैली का एक अद्भुत उदाहरण है। जिसमें यथार्थता और वस्त्रों की सजावट को स्पष्टतः देखा जा सकता है।
- चित्र (B)-यह चित्र बोधिसत्व मैत्रेय से संबंधित है। यह गांधार कला शैली से संबंधित है। यूनानी रोमन कला का प्रभाव, वस्त्रों की तहें और चेहरे की भाव-भंगिमाएँ स्पष्टतः देखी जा सकती हैं।
- चित्र (C)-कुषाण भक्तों द्वारा पूजे जा रहे शिवर्लिंग का चित्र प्रदर्शित है। यह मथुरा कला शैली से संबंधित है जिसमें लाल बलुआ पत्थर और स्वदेशी भारतीय कला शैली का मिश्रण देखने को मिलता है।
- चित्र (D)-दो नागिनों के बीच में नाग प्रदर्शित है। यह मधुरा कला शैली से संबंधित है, जिसमें विषय संबंधी विशिष्ट सामग्री देखी जा सकती है।
- चित्र (E)-यह युद्ध के देवता कार्तिकेय से संबंधित चित्र है, जो मथुरा कला शैली का है, जिसमें भारतीय शैली से बनी एक पूर्ण प्रतिमा, जो भारतीय शैली में बनी है, को दर्शाया गया है।
- चित्र (F)-यह खड़े बुद्ध की प्रतिमा है, जो गांधार कला शैली की है, इसमें वस्त्रों का पैटर्न और यूनानी-रोमन कला को देखा जा सकता है।
पुनरावलोकन करें ( पृष्ठ 119)
प्रश्न 1.
समय-रेखा पर कार्य करते हुए क्या आपने सा.सं.पू. से सा.सं. तक के बदलाव पर ध्यान दिया है? याद कीजिए कि आपने कक्षा 6 के अध्याय ‘इतिहास की समयरेखा एवं उसके स्रोत’ के अंतर्गत इतिहास में समय को मापने के बारे में क्या पढ़ा था?
उत्तर:
इतिहास में. समय को ‘समय-रेखा’ का उपयांग करके मापा जाता है. जो हमें यह समझने में मद् करता है कि घटनाएँ कब घटित हुई और वे किससे संबंधित हैं।
- समय-रेखा एक सीधी रेखा की तरह है। समय-रेखा के केंद्र में वर्ष 1 ई. है। (इस प्रणाली में कोई वर्ष 0 नहीं है)
- 1 ई. से पहले की तिथियों को ईसा पूर्व के रूप में चिह्नित किया जाता है और पीछे की ओर गिना जाता है, उदाहरण के लिए 500 ई.पू., 300 ई.पू. से पहले है।
- 1 ई. के बाद की तिथियों को ई. के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, और गणना आरोही क्रम में करते हैं। उदाहरण के लिए, 300 ई., 100 ई. के बाद में आने वाली तिथि है।
उदाहरण-500 ई.पू. → 400 ई.पू. → 2 ई.पू. →1 ई.पू. → 1ई. → 2 ई. → ………. 2025 ई.
आइए विचार करें ( पृष्ठ 126)
प्रश्न 1.
आपके अनुसार राजा के नाम के आरंभ में उसकी माँ का नाम लिखने की परंपरा का क्या अर्थ है?
उत्तर:
शासक के नाम के आरंभ में माता का नाम लिखने की परंपरा कई कारकों की ओर संकेत करती हैं-
- माताओं के प्रति सम्मान-यह दर्शाता है कि समाज और राजपरिवारों में माताओं का बहुत सम्मान किया जाता था।
- माता का शाही राजवंशों से संबंध-कभी-कभी माता किसी शक्तिशाली या कुलीन राजवंश/ परिवारों से जुड़ी होती थीं। उनके नाम का उल्लेख करने से राजा को अधिक अधिकार और सम्मान मिलता था।
- पारिवारिक पहचान और गौरव-यह पारिवारिक पृष्ठभूमि को उजागर करके, राजा की पहचान को और अधिक विशिष्ट और प्रतिष्ठित बनाने का एक तरीका हो सकता है।
- मातृसत्तात्मक प्रभाव-यह दर्शाता है कि शाही निर्णयों और सार्वजनिक जीवन में, विशेष रूप से प्रारंभिक दक्कन क्षेत्र में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
- ऐतिहासिक अभिलेख रखना-माताओं का उल्लेख इतिहासकारों को शाही वंश वृक्ष का पता लगाने और राजवंशों को बेहतर ढंग से समझने में मद् करता है।
– निष्कर्ष-यह परंपरा दर्शाती है कि प्राचीन भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में महिलाएँ, विशेषकर माताएँ, कितनी मूल्यवान और प्रभावशाली थीं।
प्रश्न 2.
निम्न अंकों की भृंखला में से कौन-से अंक कुछ-कुछ हमारे आधुनिक अंकों जैसे दिखते हैं? कौन-से नहीं? ( पृष्ठ 126)
उत्तर:
ऊपर दिए गए अंकों की भृंखला में 6 और 7 आधुनिक अंकों के समान दिखाई दे रहे हैं। संख्या 9 भी कुछ-कुछ वर्तमान अंक 9 के अल्पाकृति के रूप में दिखाई दे रही हैं। 1,2,4 और 10 आधुनिक अंकों से पूर्णतया भिन्न हैं।
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प्रश्न 3.
पीतलखोरा से प्राप्त यक्ष की इस मूर्ति के हाथ पर एक लेख उत्कीर्ण है-‘कन्हणदासेन हीरामकारेना काट’ जिसका अर्थ है-‘कन्हणदास नामक स्वर्णकार द्वारा निर्मित’। क्या यह रोचक नहीं है कि एक सुनार भी पत्थर की मूर्ति बना सकता था? आपके विचार में इससे हमें उस समय के लोगों के व्यवसायों के बारे में क्या पता चलता है (चित्र 6.7, पृष्ठ 123 देखें)? (पृष्ठ 127)
उत्तर:
यह मूर्ति इस बात का संकेत है कि प्राचीन काल के चित्रकार, शिल्पकार या सुनार जैसे कलाकार किसी एक क्षेत्र में ही सीमित नहीं थे। वे अपने अन्य कौशलों को भी उकेरने के लिए स्वतंत्र थे। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा और समाज की लचीली कार्य प्रणाली को दर्शाता है।
- इससे पता चलता है कि उस समय विभिन्न व्यवसायों के बीच की सीमाएँ कम कठोर थी।
- शासकों ने स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए लोगों के विविध कौशलों को बढ़ावा दिया और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए संगठन बनाए।
प्रश्न 4.
लगभग दो सहस्त्राब्दी पूर्व के इन शैलकृत कक्षों की समरूपता पर ध्यान दीजिए। शिल्पकारों को केवल छेनी और हथौड़ी से यह अद्भुत दक्षता कैसे प्राप्त हुई होगी? कल्पना कीजिए कि आप उस युग में एक शिल्पी हैं और अपने कौशल से पत्थर को कला में रूपांतरित कर रहे हैं। आप किन उपकरणों का प्रयोग करेंगे? ( पृष्ठ 129)

उत्तर:
ऊपर दिए गए अंकों की श्रृंख्या में 6 और 7 आधुनिक अंकों के समान दिखाई दे रहे हैं। संख्या 9 भी कुछ्ह-कुछ वर्तमान अंक 9 के अल्पाकृति के रूप में दिखाई दे रही हैं। 1,2,4 और 10 आधुनिक अंकों से पूर्णतया भिन्न हैं।
प्रश्न 3.
पीतलखोरा से प्राप्त यक्ष की इस मूर्ति के हाथ पर एक लेख उत्कीर्ण है-‘कन्हणदासेन हीरामकारेना काट’ जिसका अर्थ है-‘कन्हणदास नामक स्वर्णकार द्वारा निर्मित’। क्या यह रोचक नहीं है कि एक सुनार भी पत्थर की मूर्ति बना सकता था? आपके विचार में इससे हमें उस समय के लोगों के व्यवसायों के बारे में क्या पता चलता है (चित्र 6.7, पृष्ठ 123 देखें)? (पृष्ठ 127)
उत्तर:
यह मृत्ति इस बात का संकेत है कि प्राचीन काल के चित्रकार, शिल्पकार या सुनार जैसे कलाकार किसी एक क्षेत्र में ही सीमित नहीं थे। वे अपने अन्य कौशलों को भी उकेरने के लिए स्वतंत्र थे। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा और समाज की लचीली कार्य प्रणाली को दर्शाता है।
- इससे पता चलता हैं कि उस समय विभिन्न व्यवसायों के बीच की सीमाएँ कम कठोर थी।
- शासकों ने स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए लोगों के विविध कौशलों को बढ़ावा दिया और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए संगठन बनाए।
प्रश्न 4.
लगभग दो सहस्त्राब्दी पूर्व के इन शैलकृत कक्षों की समरूपता पर ध्यान दीजिए। शिल्पकारों को केवल छेनी और हथौड़ी से यह अद्भुत दक्षता कैसे प्राप्त हुई होगी? कल्पना कीजिए कि आप उस युग में एक शिल्पी हैं और अपने कौशल से पत्थर को कला में रूपांतरित कर रहे हैं। आप किन उपकरणों का प्रयोग करेंगे? (पृष्ठ 129)
उत्तर:
- पत्थर के मूर्तिकारों या राजमिस्त्रियों को मंदिरों, मूर्तियों और स्मारकों को तराशने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
- वे कठोर सामग्रियों को आकार देने में विशेषज्ञ हैं।
यदि मैं उस समय का मूर्तिकार होता, तो निम्नलिखित उपकरण का प्रयोग करता-
- छेनी (सेन्नी या खडग )-पत्थर काटने और आकार देने के लिए एक तेज, लोहे की छेनी का उपयोग किया जाता है।
- हथौड़ा-छेनी से पत्थर तोड़ने या तराशने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
- नुकीला उपकरण-मूर्तिकला में बारीक विवरणों व चिह्नों को उकेरने के लिए नुकीले प्रकार के उपकरण की आवश्यकता होगी।
- पंजाकार उपकरण-ऐसे उपकरण का प्रयोग किनारे को दांतेदार या अन्य बनावट या पैटर्न बनाने के लिए किया जाता है।
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प्रश्न 5.
दिए गए मानचित्र ( चित्र 6.10, पृष्ठ 124 ) में आप विभिन्न राज्यों के नामों के साथ कुछ विशिष्ट चिह्न भी देख सकते हैं। ये चिह्न क्या दर्शाते हैं? विचार कीजिए कि ये प्रत्येक राज्य की विशिष्ट पहचान को किस प्रकार दर्शाते हैं? ( पृष्ठ 129)
उत्तर:
दिए गए मानचित्र में तीन राज्यों को उनके प्रतीकों से चिह्नित किया गया है-
- चेरो के नाटक में ‘धनुष बाण’ का प्रदर्शन किया जाता है। जो दर्शाता है कि चेर राजा महान योद्धा थे और युद्ध कौशल में उनकी निपुणता को भी दर्शाया गया है। यह प्रतीक लोगों को व्यापार मार्गों और वनों की भूमि पर चेरों के नियंत्रण को याद दिलाता है।
- पांड्य साम्राज्य का ध्वज ‘मछलियों के एक जोड़े’ का प्रतीक है। पांड्यों ने दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु पर शासन किया और वे हिंद महासागर के निकट थे। उनके ध्वज पर मछलियों का जोड़ा एक प्रतीक रूप में है, जो समुद्र के साथ उनके मजबूत जुड़ाव का प्रतीक है। यह उनके समृद्ध समुद्री जीवन, मछली पकड़ने से होने वाली आमदनी ओर सुस्थापित समुद्री व्यापार का भी प्रतिनिधित्व करता है।
- चोल साम्राज्य का प्रतीक ‘बाघ’ है, जो उनकी वीरता, मजबूत सेना और बड़े क्षेत्रों पर शासन करने की क्षमता का प्रतीक है।
प्रश्न 6.
राजा की मूर्ति को ध्यान से देखिए। इस मूर्ति में राजा को कैसे दर्शाया गया है? उनकी देह-मुद्रा, वस्त्र और मुख-मुद्रा उनके सामर्थ्य एवं प्रतिष्ठा के विषय में क्या संकेत देते हैं? (पृष्ठ 132)

उत्तर:
यह मूर्ति राजा करिकाल की है। यह हमें यह बताती है कि वह एक शक्तिशाली. सम्मानित और बुद्धिमान राजा थे। वह राजसी वस्त्र पहने है और उन्हें गौरव और गरिमा के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है।
- स्थिति प्रतीक-राजाशाही और ताकत।
- परिधान प्रतीक-समृद्ध और पारपरिक।
- अभिव्यक्तिकरण प्रतीक-आत्मविश्वास और शान्त भाव।
प्रश्न 7.
क्या आपने कभी सोचा है कि इतिहासकार कई शताब्दियों पहले सुदूर स्थित दो राज्यों के बीच व्यापारिक संबंधों का पता कैसे लगाते हैं? आइए, इस पर विचार-विमर्श करें कि यह जानकारी कैसे प्राप्त की जाती होगी। ( पृष्ठ 133)
उत्तर:
इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त साक्ष्य-
- सिक्के-भारतीय सिक्कों का विदेशों में पाया जाना व विदेशी सिक्कों का भारत में पाया जाना, विभिन्न देशों के मध्य व्यापार और विनिमय दर्शाते हैं।
उदाहरण-तमिलनाडु में पाए गए रोमन स्वर्ण सिक्के हमें भारत और रोम के बीच के व्यापार के विषय में बताते हैं। - मिट्टी के बर्तन और कलाकृतियाँ-मिट्टी के बर्तन, मोती और कांच के बर्तन, जो निर्माण स्थल से दूर मिले हैं, उनसे पता चलता हैं कि वह व्यापार के सामान के रूप में प्रयोग होते थे।
उदाहरण-भारतीय तटीय क्षेत्रों में पाए गए एम्फोरा जार (जो तेल/शराब बनाने के लिए प्रयोग किए जाते थे।) - प्राचीन ग्रंथ और अभिलेख-यात्रा वृतान्त, कविताओं और अभिलेखों में जहाजों, बंदरगाहों और आयातित-निर्यातित सामान का उल्लेख मिलता है।
उदाहरण-संगम साहित्व में काली मिर्च और मोतियों को विदेश भेजे जाने का उल्लेख है। - बंदरगाहों और जहाजों के अवशेष-दीवारों. पत्थरों या मुहरों पर, बंदरगाहों और जहाजों के अवशेष समुद्री व्यापार के प्रमाण देते हैं।
- शिलालेख और भिच्तिचित्र-दीवारों पर उकेरे गए चित्रों व शिलालेखों पर व्यापारियों, बंदरगाहों या व्यापार की जाने वाली वस्तुओं के नाम अंकित हैं।
- विदेशी विवरण-चीनी यात्री फैक्सियन जैसे यात्रियों के लेख, मेगस्थनीज की पुस्तक, इंडिका से भी कुछ जानकारी प्राप्त हुई है, मेगस्थनीज एक यूनानी इतिहासकार और राजनयिक थे और चन्द्रगुप्त मौर्य ने उन्हें अपने दरबार में ठहराया था। दुर्भाग्य से उनकी लिखित सामग्री खो गई है, लेकिन कुछ अंश उपलब्ध हैं, जिन्हें बाद में कुछ यूनानी विद्वानों ने लिख्वा।
प्रश्न 8.
पांड्य रान्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था। आपके विचार में मोती उस समय व्यापार की दृष्टि से क्यों महत्त्वपूर्ण था? (पृष्ठ 134)
उत्तर:
- मोती दुर्लभ और सुंदर थे।
- दक्षिण भारत में प्राकृतिक मोती. मछली पकड़ने के क्षेत्र थे।
- विदेशों में भारी मौग।
- धन और सामाजिक स्तरता का प्रतीक।
- व्यापार के लिए महत्त्वपृष्ण।
प्राचीन तमिल साहित्य में मांतियों का ‘समुद्र से धन’ भी कहा गया है।
प्रश्न 9.
क्या आप जानते हैं कि गांधार कहाँ है? क्या यह आपको महाकाव्य महाभारत के किसी पात्र की याद दिलाता है? (पृष्ठ 137)
उत्तर:
गांधार आज के उत्तरी पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान में स्थित एक प्राचीन साम्राज्य था।
यह एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र था। जो विशेष रूप से अपनी सुंदर बौद्ध कला के लिए जाना जाता था, जिसमें भारतीय और यूनानी शैलियों का मिश्रण था। गांधार, हमें महाभारत महाकाव्य के एक पात्र गांधारी की याद दिलाता है। वह गांधार की राजकुमारी थी। उन्होंने हस्तिनापुर के अंधे राजा धृतराष्ट् से विवाह किया था और दुयोंधन की माँ थी।
क्या आप जानते हैं?
शक संवत एक प्राचीन भारतीय कैलेंडर है जिसका उपयोग आज भी आधिकारिक दस्तावेजों और हिंदू त्योहारों में किया जाता है।
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शक सवंत् के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य-
- 78 ई. (सामान्य युग ) में शुरूआत-यह कैलेंडर 78 ई, में प्रारंभ हुआ, जब कुषाण वंश के शासक कनिष्क के शासनकाल में इसकी शुरूआत हुई।
- सौर कैलेंडर-यह मुख्यतः सूर्य की गति पर आधारित होते है, कुछ कैलेंडर चंद्रमा की गति पर आधारित होते हैं।
- भारत का आधिकारिक नागरिक कैलेंडरभारत सरकार ग्रंगोरियन कैलेंडर वं
- साथ-साथ शक कैलेंडर का भी उपयोग करती है।
उदाहरण के लिए भारतीय दस्तावेजों में, आपको अक्सर दो तिथियाँ मिलेंगी-एक ग्रेगोरियन कैलेंडर में और एक शक संवत् में। - शक कैलेंडर में महीने-इसमें 12 महीने होते हैं जो चैत्र (मार्च-अप्रैल के आस-पास) से शुरू होते हैं। शक कैलेंडर ग्रेगोरियन कैलेंडर से 78 वर्ष पीछे है. (जनवरी-मार्च तक 79 वर्ष पीछे होता है)
रोचक तथ्य
यदि वर्तमान वर्ष 2025 ईसवी है, तो शक वर्ष 1947 होगा, क्योंकि शक संवत् 78 ई. में शुरू हुआ था।
2025 – 78 = 1947 शक वर्ष
पुनर्गठन का काल Class 7 Question Answer in Hindi
Class 7 Samajik Vigyan Chapter 6 Question Answer
प्रश्न 1.
मौर्योत्तर काल को पुनर्गठन का काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मौयौत्तर काल को पुनर्गठन का काल कहने के मुख्य कारण निम्न हैं-
1. मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद अनेक छोटे साप्राज्यों का उद्यमौर्य साम्राज्य ( 185 ई.पू. के आस-पास) अनेक छोटे साम्राज्यों में टूट गया जैसे-
- शुंग
- सातवाहन
- कुषाण
- इंडो-रोमन
- चेर, चोल और पांड्य (दक्षिण भारत में)
2. राजनैतिक व्यवस्था में परिवर्तन:
- इन राजाओं ने अपनी नई स्थानीय प्रणाली और सरकारों का गठन किया।
- प्रत्येक राज्यों ने अपने स्वयं के शासन तंत्र और रक्षा तंत्र को विकसित किया।
3. कला, धर्म और संस्कृति का विकास:
- बौद्ध और हिन्दू कला का विकास (जैसेमधुरा और गांधार शैली)
- व्यापार और शहरों का विकास।
- स्थानीय संस्कृति और रीति-रिवाजों का मजबूती व तेजी के साथ विकास।
4. व्यापार और सिक्कों को बढ़ावा-
- नए राज्यों के राजाओं ने स्वयं के सिक्कों को जारी किया।
- व्यापार मार्गों का पुनर्गठन हुआ, दोनों तरह के मार्गो-देश के आन्तरिक व बाहरी देशों के साथ भी व्यापार मार्गों का पुर्नगठन हुआ। जैसे-रोम और चीन के साथ।
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प्रश्न 2.
संगम साहित्य पर 150 शब्दों में एक लेख लिखिए।
उत्तर:
संगम साहित्य सबसे प्राचीन ज्ञात तमिल साहित्य है, जो दक्षिण भारत में 300 ई.पू. से 300 ई. के बीच लिखा गया।
- ‘संगम’ शब्द का अर्थ ‘इकट्ठा होना’ या ‘जुड़ना’, जो विद्वानों और कवियों के परिपेक्ष्य में है।
- चेर, चोल और पांड्य साम्राज्यों के समय यह साहित्य लिखा गया।
- इसमें प्यार, युद्ध, प्रकृति और दैनिक जीवन पर गीत और कविताएँ लिखी गई।
- पुरुष और महिला दोनों प्रकार के कवियों द्वारा कविताएँ लिखी गयीं।
प्रश्न 3.
इस अध्याय में उल्लिखित किन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया?
उत्तर:
सातवाहन वंश के शासकों ने मुख्यतः माताओं के नाम अपने नाम के साथ जोड़ा। उदाहरण के लिए-वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी (एक सातवाहन शासक) ने अपनी माता का नाम शामिल किया, जिससे उनके पालन-पोषण और राज्य की विरासत में उनकी भूमिका के प्रति सम्मान प्रकट हुआ।
यह उनकी माता का सम्मान करने और यह दर्शाने का एक तरीका था कि उन्होने शासक के जन्म. पालन-पोषण और शाही वंश में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे यह भी उजागर हुआ कि माता का परिवार महत्वपूर्ण था और शाही वंश माता-पिता दोनों से आता था। माता का नाम जोड़कर, शासकों ने दिखाया कि वे मातृवंशीय विरासत (माता के वंश) का सम्मान करते थे, जो कुछ प्राचीन संस्कृतियों में महत्वपूर्ण थी।
प्रश्न 4.
इस अध्याय में वर्णित किसी एक राज्य जो आपको रोचक लगता है, के विषय में 250 शब्दों का एक लेख लिखिए। आपने उस राज्य का चयन क्यों किया? अपना लेख कक्षा में प्रस्तुत कीजिए और यह जानने का प्रयास कीजिए कि आपके सहपाठियों ने कौन-से राज्यों का सर्वाधिक चयन किया है?
उत्तर:
चोल साम्राज्य दक्षिण भारतीय इतिहास के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राजवंशों में से एक था। इसने तीसरी शताब्दी ई.पू. से तेरहवीं शताब्दी ई. तक शासन किया और राजराजा चोल प्रथम और राजेन्द्र चोल प्रथम जैसे शासकों के अधीन अपने चरम पर पहुँचा। चोल साम्राज्य ने नौसैनिक अभियानों के माध्यम से दक्षिण भारत, श्रीलंका और यहाँ तक कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों पर अपना नियंत्रण बढ़ाया।
चोल अपने कुशल प्रशासन के लिए प्रसिद्ध हैं जिसमें स्थानीय स्वशासन की एक सुव्यवस्थित प्रणाली. विशेष रूप से गाँवों में शामिल थी। उनके पास एक मजबूत संना और नौसंना थी. जिससे उन्हें विदेशों में अपने क्षेत्र और प्रभाव का विस्तार करने में मदद मिली। चोलों की सबसे बड़ी उपलब्धियों में सं एक वास्तुकला और कला के क्षेत्र में थी। उन्होंने भव्य मंदिरों का निर्माण किया। जैसे तंजावुर स्थित बृहदेश्वर मोंदर, जो अब यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में है। ये मंदिर न केवल पूजा स्थल थे, बल्कि अर्थिक और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र भी थे।
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चोलों ने तमिल साहित्य, व्यापार और संस्कृति को भी बढ़ावा दिया और इस क्षेत्र में एक स्थायी विरासत छोड़ी। उनके शिलालेख जो अधिकतर तमिल और संस्कृत में हैं, उनके शासन, समाज और उपलब्धियों के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं। चोल काल को अक्सर दक्षिण भारत में तमिल, संस्कृति और शाही गौरव के स्वर्णयुग के रूप में याद किया जाता है।
मैंने इस साम्राज्य को क्यों चुना-मैंने चोल साम्राज्य को इसलिए चुना क्योंकि मुझे उनकी उपलब्धियाँ वास्तव में प्रेरणादायक लगी। वे न केवल शक्तिशाली योद्धा थे, बल्कि महान निर्माता और प्रशासक भी थे। मैं उनकी कला को बढ़ावा देने, स्थानीय शासन का सम्मान करने और व्यापार तथा नौसैनिक शक्ति के माध्यम से विदेशी देशों से जुड़ने के तरीके की प्रशंसा करता हूँ। उनके बारे में जानकर मुझे भारत के समृद्ध और शक्तिशाली इतिहास पर गर्व हुआ।
प्रश्न 5.
कल्पना कीजिए कि आपको एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ है। आप कौन-सा राजचिह्न चुनेंगे और क्यों? आप एक शासक के रूप में कौन-सी उपाधि धारण करेंगे? अपने राज्य के विषय में एक लेख लिखिए जिसमें राज्य के मूल्य, नियमावली एवं विशिष्टताएँ सम्मिलित हों।
उत्तर:
अगर मुझे अपना राज्य बनाने का मौका मिले तो मैं शाही प्रतीक के रूप में ‘दुर्गा’ चुनूँगा/चुनूँगी. जो राज्य की शक्ति और दिव्य सुरक्षा का प्रतीक है। एक शासक के रूप में मैं ‘प्रकाश की रानी/राजा’ की उपाधि धारण करूँगी/करूँगा और अपने लोगों के लिए सकारात्मकता, आशा और शांति लाऊँगा/लाऊँगी।
राज्य के मूल्य-
- माँ, प्रकृति और देवी-देवताओं के प्रति सम्मान।
- पक्षपात रहित समाज व्यवस्था।
- हर व्यवसाय और कौशल को बढ़ावा।
- सांस्कृतिक प्रथाओं और मान्यताओं में लचीलापन।
राज्य की कानून व्यवस्था-जाति, धर्म या व्यवसाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं।
पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा प्रणाली की स्थापना।
प्रत्येक वयस्क को सेना में सेवा करने और लोगों की रक्षा में योगदान देने का उचित अवसर दिया जाएगा।
- जनसंघर्षों पर सभाओं में चर्चा की जाएगी और शांतिपूर्ण ढंग से उनका समाधान किया जाएगा।
विशिष्ट विशेषताएँ-
- कला, वास्तुकला और साहित्य को बढ़ावा दिया जाएगा और संरक्षित किया जाएगा।
- विद्वानों और कलाकारों को संरक्षण दिया जाएगा।
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प्रश्न 6.
आपने मौर्योत्तर काल के वास्तु कलात्मक विकास के विषय में पढ़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप के एक रेखांकित मानचित्र पर इस अध्याय में उल्लिखित कुछ स्थापत्य कलाओं के स्थान को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
इस प्रश्न के उत्तर को निम्न प्रकार से छात्र स्वयं करें-
- मानचित्र में भारत का साधारण रूपरेखा मानचित्र बनाइए।
उस पर निम्न स्थानों को चिह्नित कीजिए-
- साँची ( मध्य प्रदेश )-शुंग व सातवाहन कालीन स्तूप।
- भरहुत (मध्य प्रदेश)-शुंग कालीन स्तूप और रेलिंग स्तूप।
- अमरावती (आंध्रप्रदेश)-सातवाहन कालीन विशाल स्तूप।
- नासिक (महाराष्ट्र)-सातवाहन कालीन गु फाएँ।
- कार्ले व भाजा (महाराष्ट्र)-सातवाहन काल की चैत्य गुफाएँ।
- कन्हेरी (महाराष्ट्र)-गुफा स्थापत्य।
- उदयगिरि (ओडिशा)-गुफाएँ।
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