Teachers recommend Class 7 Social Science Notes in Hindi and Class 7 SST Chapter 7 Notes in Hindi गुप्त काल अथक सृजनशीलता का युग for mastering important definitions and key concepts.
The Gupta Era An Age of Tireless Creativity Class 7 Notes in Hindi
गुप्त काल अथक सृजनशीलता का युग Class 7 Notes
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान अध्याय 7 नोट्स गुप्त काल अथक सृजनशीलता का युग
→ एक नई शक्ति का उदय
- तीसरी शताब्दी ई. तक, उपमहाद्वीप के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में कुषाण साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा था।
- गुप्त साम्राज्य की स्थापना चंद्रगुप्त प्रथम ने 320 ई. के आस-पास वर्तमान उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में की थी और चंद्रगुप्त द्वितीय के अधीन यह एक शक्तिशाली साम्राज्य बना।

- यह साम्राज्य कला, वास्तुकला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के अधीन अपने चरम पर पहुँचा।
- दिल्ली में लौह-स्तंभ पर मिला शिलालेख ‘चंद्र’ नामक एक राजा का उल्लेख करता है, जिसकी पहचान चंद्रगुप्त द्वितीय के रूप में की गई है, जिसे ‘विक्रमादित्य’ के नाम से भी जाना जाता है।
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→ योद्धा राजा
- हरिषेण समुद्रगुप्त (चंद्रगुप्त द्वितीय के पिता) का दरबारी कवि और मंत्री था।
- उसने प्रयागराज में एक स्तंभ पर प्रयाग प्रशस्ति नामक एक प्रसिद्ध शिलालेख की रचना की।
- यह शिलालेख संस्कृत में लिखा गया है और ब्राह्मी लिपि का उपयोग किया गया है। यह बताता है कि समुद्रगुप्त की महत्वाकांक्षा ‘धरणी-बंध’ यानी ‘पृथ्वी को एकजुट करना’ था।
- यह समुद्रगुप्त को उसकी बहादुरी, सैन्य विजय और व्यक्तिगत गुणों के लिए सम्मानित करता है।
- यह बताता है कि उसने उत्तरी और दक्षिणी भारत में कई शासकों को कैसे हराया?
- कुछ राजा युद्ध में हार गए, कुछ ने आत्मसमर्पण कर दिया और कुछ ने सम्मान सहित विलय किया।
- शिलालेख से पता चलता है कि समुद्रगुप्त कला, संगीत और शिक्षा का भी संरक्षक था।
- यह गुप्त साम्राज्य की सीमा और शक्ति को समझने का एक प्रमुख स्रोत है।
- सिक्कों पर शिलालेखों का उपयोग शासकों द्वारा अपनी उपलब्धियों को उजागर करने के लिए किया जाता था, जिन पर
- अक्सर धार्मिक प्रतीक और मान्यताएँ चित्रित होती थीं। विष्णु पुराण जैसे-साहित्यिक स्रोत, शासकों, साम्राज्यों और प्रजा के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं।

- अश्वमेध यज्ञ (राजाओं द्वारा एक वैदिक अनुष्ठान जिसमें योद्धाओं के साथ एक घोड़े को स्वतंत्र घूमने के लिए छोड़ा जाता था ताकि उस भूमि पर शासन करने के उनके अधिकार को प्रदर्शित किया जा सके) को भी साम्राज्य की शक्ति और विरासत पर जोर देने के लिए सिक्कों पर अंकित किया गया था।
→ गुप्तकाल में भारतीय समाज का यात्री विवरण
- फाह्यान एक चीनी बौद्ध भिक्षु और यात्री था, जिसने चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल के दोरान, लगभग 5 वीं शताब्दी ई.पू. में भारत का दौरा किया।
- वह बौद्ध धर्मग्रंथों को इकट्ठा करने और इसके उद्गम स्थान पर बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के लिए भारत आया था।
- उसने उत्तरी भारत की यात्रा की, जिसमें पाटलिपुत्र, कौशांबी और बोधगया जैसे स्थानों का दौरा किया।
- फाह्यान ने गुप्त शासन के दौरान की शांतिपूर्णता और समृद्धि की प्रशंसा की।
- उसने देखा कि लोग खुशी से रहते थे, और वैश्य (व्यापारिक) परिवारों द्वारा गरीबों और यात्रियों के लिए अस्पताल और विश्राम गृह जैसे धर्मार्थ संस्थान उपलब्ध थे।

- उनके लेख गुप्त काल के दौरान सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन के बारे में ज्ञानवर्धक और प्रत्यक्ष जानकारी प्रदान करते हैं।
- फाह्यान के यात्रा वृतांत को गुप्त शासन के दौरान भारत में जीवन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत माना जाता है।
- फाह्यान ने चांडालों के साथ दुर्व्यवहार का भी उल्लेख किया है, जिन्हें बहिष्कृत माना जाता था और वे शहर की सीमाओं से बाहर रहते थे।
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→ गुप्त साम्राज्य की झलकियाँ
- शासन और प्रशासन-कौटिल्य ने सुझाव दिया कि शासक सप्तांग के हिस्से के रूप में गठबंधन (मित्र) बनाए।
- उन्होंने अपनी शक्ति प्रदर्शित करने के लिए ‘महाराजाधिराज’, ‘सम्राट’ और ‘चक्रवर्ती’ जैसी उपाधियों का प्रयोग किया।
- उन्होने अपनं साम्राज्य को बढ़ाने और मजबूत करने के लिए सैन्य विजय, कूटनीति और गठबंधन का सहारा लिया।

- प्रभावती गुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री, वाकाटक साम्राज्य के एक राजकुमार से विवाहित थी-जो गुप्तों के दक्षिण में पड़ोसी थे। दुर्भाग्य से वह कम उम्र में मर गया, जिससे वह रीजेंट शासक (एक अस्थायी शासक) बन गई। उसने विष्णु और उनके विभिन्न रूपों को समर्पित सात मंदिरों का निर्माण कराया।
- गुप्त साम्राज्य में,राज्यों को प्रांतों में विभाजित किया गया था और स्थानीय शासकों, पुजारियों और सरदारों को भूमि प्रदान की गई थी।
- प्रांतों में विभाजित करने से उचित कर संग्रह व्यवस्था लागू करने में मदद मिली। और गुप्त शासकों को कुशलता से शासन करने में भी मदद् मिली।
→ व्यापार को बढ़ावा
- भूमि कर गुप्तों के लिए राजस्व का प्राथमिक स्रोत था। जुर्माना, खानों पर कर, सिंचाई, व्यापार और शिल्प राजस्व के अन्य स्रोत थे।
- यह राजस्व प्रशासन, सेना, मंदिर और बुनियादी ढाँचे के निर्माण और विद्वानों व कलाकारों के समर्थन के लिए वित्त की व्यवस्था थी।

- गुप्त साम्राज्य ने व्यापार को बढ़ावा दिया। इस अवधि के दौरान भारत ने भूमध्यसागरीय, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ वस्त्र, हाथीदाँत, मसाले और रत्न का व्यापार किया।
- हिंद महासागर व्यापार तंत्र ने भारतीय बंदरगाहों को दूर के बाजारों से जोड़ा। भूमध्यसागरीय बाजारों के मार्ग में एक महत्वपूर्ण पड़ाव सोकोट्रा द्वीप था, जो सामरिक रूप से अरब सागर में स्थित था।
- मिस्र, अरब, रोम और ग्रीस के व्यापारियों के अतिरिक्त पुरातात्विक साक्ष्य जैसे-मिट्टी के बर्तन, ब्राह्मी लिपि के अभिलेख और बौद्ध स्तूप वहाँ कई शताब्दियों से भारतीय व्यापारियों की उपस्थिति की पुष्टि करते हैं।
→ नवीन विचारों और उपलब्धियों का युग
- गुप्त शासक विष्णु के परम भक्त थे, उन्होंने अन्य परंपराओं और विचारधाराओं को भी संरक्षण दिया। उन्होंने प्रसिद्ध नालन्दा विश्वविद्यालय और कई अन्य बौद्ध विहारों सहित बौद्ध संस्थानों को संरक्षण दिया।
- गुप्त काल में शांति और स्थिरता ने साहित्य, विज्ञान और कला में प्रगति को जन्म दिया, जिससे इसे भारत का ‘शास्त्रीय युग’ कहा गया।
- आर्यभट और वराहमिहिर जैसे विद्वानों ने गणित, खगोल विज्ञान और अन्य विज्ञानों में प्रमुख प्रगति की, जबकि कालिदास ने अपनी परिष्कृत कविता से संस्कृत साहित्य को बहुत समृद्ध किया। उस समय के चिकित्सा ग्रंथों में सिद्धांतों और प्रथाओं को भी दर्ज किया गया था।
- गुप्त साम्राज्य की समृद्धि ने धातु विज्ञान को उन्नत किया, जैसे जंग रहित लौह-स्तंभ और चंद्रगुप्त द्वितीय ने विद्वानों, वैज्ञानिकों, कवियों और कलाकारों का सहयोग और समर्थन किया।
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→ सौंदर्य की खोज
- ‘गुप्त कला’ ने सौंदर्यशास्त्र और सुंदरता के उच्च मानक स्थापित किए, जिनका स्थायी प्रभाव पड़ा। जैसाकि महाराष्ट्र में अजंता गुफाओं की मूर्तियों में, बुद्ध की पेटिंग और मध्य प्रदेश में उदयगिरि में चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं और देवताओं की विस्तृत नक्काशी में देखा गया।

→ गुप्त वंश का पतन
- छठी शताब्दी ई. तक, गुप्त साम्राज्य का हूणों के बार-बार आक्रमणों और क्षेत्रीय शासकों के साथ बढ़ते आक्रामक संघर्षों के कारण पतन हो गया।

दक्षिण और पूर्वोत्तर का घटनाक्रम
- पल्लवों ने दक्षिण (वर्तमान तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य) पर शासन करते हुए कला और वास्तुकला को प्रोत्साहन दिया।
- काँचीपुरम (तमिलनाडु), पल्लवों की राजधानी व ‘हजार मंदिरों का शहर’ के रूप में जानी जाती थी।
- सातवाहनों के शासनकाल के दौरान, घटिकाएँ सीखने के प्रमुख केंद्र थे, जिन्होंने शिक्षा और बौद्धिक विकास के लिए एक वातावरण बनाया।
- पूर्वोत्तर क्षेत्र में, वर्तमान असम, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में, कामरूप साम्राज्य पर वर्मन राजवंश का शासन था।
- बह्मपुत्र घाटी का प्राचीन नाम ‘प्राग्ज्योतिष’ था, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है।
- समुद्रगुप्त ने ‘प्रयाग प्रशस्ति’ के उल्लेख के अनुसार पल्लव और कामरूप के शासकों को हराने के बाद भी उनके राज्यों में कोई सत्ता परिवर्तन नहीं किया, उन्होंने समुद्रगुप्त की सत्ता को स्वीकार किया व भेंट प्रदान करते रहे।
- गुप्त शासकों ने एक स्थिर और समृद्ध समाज का निर्माण किया और भारतीय संस्कृति, परंपराओं और आदर्शों को जीवित रखा।

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