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Class 7 Social Science Chapter 8 Question Answer in Hindi भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं?
भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं? Question Answer in Hindi
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 8 के प्रश्न उत्तर भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं?
प्रश्न 1.
‘पावनता’ क्या है? (पृष्ठ 167)
उत्तर:
पावनता का अर्थ है धार्मिक और आध्यात्मिकता से जुड़े शुद्ध और पवित्र भाव और विचार जो आदर और श्रद्धा के योग्य हों। यह विशेष स्थान भी हो सकता है, जैसे कोई धार्मिक या तीर्थ स्थल जहाँ लोग श्रद्धा व भक्ति से जाते हैं और आस्था प्रकट करते हैं। पावनता नदियों और पर्वतों की विशेष यात्रा या तीर्थ यात्रा से भी जुड़ी हो सकती है। पावनता धार्मिक रीति-रिवाजों, प्रकृति, विशेष स्थानों, परंपरा और संस्कृति से जुड़ी होती हैं।
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प्रश्न 2.
भूमि कैसे पावन हो जाती है? (पृष्ठ 167)
उत्तर:
भूमि का पावन बनना सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। भारतीय उपमहाद्वीप में भूमि को पावन मानने की परंपरा प्राचीन काल से रही है। धर्म, आध्यात्म, प्रकृति और आस्था का घनिष्ठ संबंध भूमि को पावन बनाता है। किसी धार्मिक, आध्यात्मिक अथवा ऐतिहासिक कारणों से भूमि श्रद्धा और साधना का केंद्र बन जाती है। उदाहरण-
- 51 शक्तिपीठ पूजनीय हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में देवी माता सती के अंग गिरे, वे स्थल पावन शक्तिपीठों के रूप में स्थापित हो गए।
- तीर्थयात्रा और मेला शताब्दियों से तीर्थयात्रा सी परंपरा ने पावन स्थलों को धार्मिक, अर्थिक और सांस्कृतिक रूप से विकसित किया है। कुंभ मेला-प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक जैसे पावन स्थलों में आयोजित होता है। करोड़ों श्रद्धालु विशेष खगोलीय अवधि में नदी में पवित्र स्नान करते हैं। यूनस्को ने कुंभ मेले को ‘अर्मूत सांस्कृतिक धरोहर’ के रूप में सूचीबद्ध किया है।
- अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, साँची, उज्जैन और द्वारका-ये स्थान धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़कर पावन स्थल बन गए।
- महात्मा बुद्ध के जीवन से जुड़े भौगोलिक क्षेत्र पावन स्थल बन गए हैं। उदाहरण-बोधगया (बिहार) जहाँ सिद्धार्थ गौतम को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ और सारनाथ (उत्तर प्रदेश) जहाँ बुद्ध ने पहला उपदेश दिया।
प्रश्न 3.
पावन स्थल और तीर्थ स्थल का अंतर्सबंध किस प्रकार मानव जीवन और संस्कृति से जुड़ जाता है? ( पृष्ठ 167)
उत्तर:
पावन स्थल और तीथ स्थल न सिर्फ धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़े हैं, बल्कि वे मानव जीवन के मूल्यों और रीति-रिवाजों को जीवित रखते हैं। वे मनुष्य को समाज और संस्कृति से जोड़ते हैं तथा आध्यात्मिकता व सामाजिक जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं। उदाहरण जैस-गंगा नदी, हिमालय, कैलाश मानसरोवर, शत्रुंजय पहाड़ी. बोधगया में बोधि वृक्ष, प्रयागराज, स्वर्ण मंदिर आदि। पावन स्थलों में लोग विशेषरूप से तीर्थ यात्रा करने जाते हैं। तीर्थ और पावन स्थलों के कारण स्थानीय क्षेत्रों में आर्थिक विकास, हस्तशिल्प, व्यापार और परिवहन जैसे क्षेत्रों में विकास होता है।
प्रश्न 4.
पावन भूगोल ने भारतीय उपमहाद्वीप के सास्कृतिक एकीकरण में किस प्रकार की भूमिका निभाई है? ( पृष्ठ 167)
उत्तर:
पावन भूगोल ने भारतीय उपमहाद्वीप को सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में पिरोया है। नदियाँ, पर्वत, वन. तीर्थ और पर्वों ने क्षेत्रीय भिन्नताओं को मिटाकर एक साझा पारंपरिक और सांस्कृतिक आधार मजबूत किया है। भारतवर्ष का पावन भूगोल विविधता में एकता की भावना को दृढ़ करता है। भारतीय उपमहाद्वीप के तीर्थ स्थलों में चार धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ और अन्य कई मदिरों ने सभी दिशाओं को जोड़ा है।
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इन तीर्थयात्राओं से भारतवासी और भारत से बाहर रहने वाले लोग एक धार्मिक और सांस्कृतिक भावना से बंधते हैं। पवित्र नदियों ने सांस्कृतिक एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गंगा, यमुना. सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा आदि नदियाँ पूजनीय हैं। इन नदियों के किनारे बसे तीर्थ जैसे-प्रयागराज (संगम), वाराणसी, द्वारका, नासिक सांस्कृतिक एकता और सौहार्द के केंद्र
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 168)
प्रश्न 1.
क्या आप इनमें से किसी चित्र से परिचित हैं? क्या आप अपने आस-पास इसी तरह के किसी स्थान का नाम बता सकते हैं?

उत्तर:
जी हाँ, मेरे इलाके में भी कुछ ऐसे धार्मिक एवं पवित्र स्थल हैं जो भारत देश के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों जैसे लगते हैं। यहाँ एक आदिशक्ति सती माता मंदिर है जो एक छोटे तालाब के पास है। सायंकाल वहाँ आरती होती है और दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं। यह दृश्य मुझे माँ गंगा की आरती की याद दिलाता है।
प्राकृतिक पूजन स्थलों पर वृक्षों और पत्थरों की पूजा होती है, वैसे ही मेरे क्षेत्र में एक धार्मिक स्थल है जो लोगों की आस्था से जुड़ा है। इस स्थल के प्रांगण में पीपल तथा बरगद के पेड़ की पूजा होती है। मंदिर में रखे एक विशेष पत्थर को माता खेड़ा देवी के रूप में पूजा जाता है। भारत ऐसा देश है जहाँ लगभग हर क्षेत्र में कई पवित्र स्थल पाए जाते हैं, जो धार्मिक मान्यताओं से संबंधित होते हैं।
यहाँ इतिहासकार एवं विचारक धर्मपाल के लेख से एक उद्धरण प्रस्तुत है-
“मैं ग्वालियर से दिल्ली की यात्रा कर रहा था… जब मैं लोगों के समूह से मिला… वे लगभग बारह व्यक्ति थे, जिनमें तीन या चार महिलाएँ तथा सात या आठ पुरुष थे।…उन्होंने बताया कि वे लगभग तीन महीनों से, अन्य स्थलों के साथ-साथ रामेश्वरम तक की तीर्थयात्रा पर हैं। वे लखनऊ के उत्तर में स्थित दो गाँवों से आए थे।
उनके पास मिट्टी के पात्रों के अतिरिक्त अनेक प्रकार की गठरियाँ थीं…उनके पास भोजन की सभी आवश्यक वस्तुएँ थीं, जैसे-आटा, घी, चीनी, आदि… मैंने उनसे पूछा, “क्या आप सभी इस समय दिल्ली जा रहे हैं?” “हाँ!” उन्होंने उत्तर दिया। “क्या आप दिल्ली में रुकेंगे?” “नहीं, हम केवल वहाँ ट्रेन बदलेंगे। हम हरिद्वार जा रहे हैं…हमारे पास समय नहीं है…हमें हरिद्वार पहुँचना है। उसके बाद हमें घर लौटना है।”
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प्रश्न 2.
इस उद्धरण को पढ़िए। इस विषय में आपका क्या अभिमत है? उस मार्ग को दर्शाइए, जिससे होकर उन यात्रियों ने रामेश्वरम से हरिद्वार तक की यात्रा की होगी। आपके अनुसार, इन यात्रियों ने दिल्ली रुकने के स्थान पर सीधे हरिद्वार की यात्रा क्यों की? (पृष्ठ 171)

उत्तर:
उद्धरण के आधार पर यात्रियों की यात्रा लंबी और कठिन तीर्थयात्रा है। उन्होंने देश के दक्षिण छोर (रामेश्वरम) से उत्तर में हरिद्वार तक की तीर्थयात्रा निश्चित की है। यात्रा के दौरान भोजन की पूर्ति के लिए जरूरी वस्तुएँ व सामग्री का प्रबंध किया गया है। यह यात्रा उनके धैर्य, साधना और आस्था को दर्शाती है।
यात्रियों द्वारा अपनाया गया मार्गः
रामेश्वरम (तमिलनाडु) → मदुरै → त्रिची → तिरुपति → पुणे → नासिक → उज्जैन → ओंकारेश्वर → दिल्ली → हरिद्वार।
तीर्थयात्रियों के पास सीमित समय है और उन्हें हरिद्वार पहुँचना है। दिल्ली उनकी धार्मिक यात्रा का हिस्सा नहीं है। दिल्ली से केवल ट्रेन बदली जाएगी। हरिद्वार में हर की ‘पौड़ी’ में पवित्र स्नान व पूजन के बाद यात्री अपने घर लखनऊ लौट जाएँगे।
प्रश्न 3.
प्राचीन काल में जब लोग तमिलनाडु के मदुरई से उत्तर प्रदेश के वाराणसी की यात्रा करते थे, तो उनका संपर्क किन-किन भाषाओं से होता होगा? उन स्थानों में वे लोगों से कैसे वार्तालाप करते होंगे? वे कहाँ ठहरते होंगे? वे किस प्रकार का भोजन करते होंगे? ( पृष्ठ 171)
उत्तर:
तमिलनाडु के मदुरई से उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक की तीर्थयात्रा भारत की सांस्कृतिक एकसूत्रता को दर्शाती होगी। इस यात्रा में कई भाषाओं, बोलियों, खान-पान, लोक परंपराओं और आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होते होंगे। संस्कृत, तेलगु, तमिल, कन्नड़, मराठी, हिंदी परिवार की बोलियाँ-भोजपुरी, अवधी, बुंदेली से यात्री अवगत होते होंगे।
संस्कृत धार्मिक स्थलों की मुख्य भाषा थी। श्लोकों, मंत्रों में संस्कृत प्रयुक्त होती थी। हाथ जोड़ना और संकेत भापा के माध्यम से वातचीत की जाती होगी। अनुभवी तीर्थयात्री और स्थानीय व्यापारी नए यात्रियों को मार्गदर्शन करते होंगे।
धार्मिक स्थलों के आस-पास विश्राम स्थल, आश्रम और धर्मशालाएँ होती थीं, जहाँ यात्री ठहरते थे। तीर्थयात्रा के समय कई भक्त व्रत रखते थे और सात्विक भाजन करते थे। मोटा अनाज, दाल-चावल, सब्जी, फल, दूध या छाछ और गुड़ का सेवन करते होंगे।
प्रश्न 4.
चार धामों की स्थिति का पता लगाइए। आपके अनुसार जब लोगों ने भारत के उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम की यात्रा की, तब उनके लिए इन धामों का क्या कोई विशेष महत्व था? (पृष्ठ 173)
उत्तर:
चार धाम भारत की चार दिशाओं में स्थापित हैं-बद्रीनाथ उत्तर में है, पूर्व में जगनाथ पुरी का मंदिर, पश्चिम में द्वारका में द्वारकाधीश मंदिर और दक्षिण में रामेश्वरम, रामनाथ स्वामी मंदिर है। चार धाम यात्रा शक्तिशाली तीर्थ परिक्रमा है और करोड़ों भक्त/श्रद्धालु आध्यात्मिक विकास, आत्मिक शुद्धि और परमात्मा से गहरा जुड़ाव प्राप्त करने की भावना से इस तीर्थयात्रा को करते थे। चार धाम यात्रा कठिन होती थी। पर्वतों, नदियों और वनों को पार करते हुए यह यात्रा कठिन तपस्या और गहरी भक्ति का प्रतीक मानी जाती थी। आज भी करोड़ों
प्रश्न 3.
प्राचीन काल में जब लोग तमिलनाडु के मदुरई से उत्तर प्रदेश के वाराणसी की यात्रा करते थे, तो उनका संपर्क किन-किन भाषाओं से होता होगा? उन स्थानों में वे लोगों से कैसे वार्तालाप करते होंगे? वे कहाँ ठहरते होंगे? वे किस प्रकार का भोजन करते होंगे? (पृष्ठ 171)
उत्तर:
तमिलनाडु के मदुरई से उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक की तीर्थयात्रा भारत की सांस्कृतिक एकसूत्रता को दर्शाती होगी। इस यात्रा में कई भाषाओं, बोलियों, खान-पान, लोक परंपराओं और आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होते होंगे। संस्कृत, तेलगु, तमिल, कन्नड़, मराठी, हिंदी परिवार की बोलियाँ-भोजपुरी, अवधी, बुंदेली से यात्री अवगत होते होंगे।
संस्कृत धार्मिक स्थलों की मुख्य भाषा थी। श्लोकों, मंत्रों में संस्कृत प्रयुक्त हांती थी। हाथ जोड़ना और संकत भापा के माध्यन से बातचीत की जाती होंगी। अनुभवी तीर्थयात्री और स्थानीय व्यापारी नए यात्रियों को मार्गदर्शन करते होंगे।
धार्मिक स्थलों के आस-पास विश्राम स्थल. आश्रम और धर्मशालाएँ होती थीं, जहाँ यात्री ठहरते थे। तीर्थयात्रा के समय कई भक्त व्रत रखते थे और सात्विक भोजन करते थे। मोटा अनाज, दाल-चावल, सब्जी, फल, दूध या छाछ और गुड़ का सेवन करते होंगे।
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प्रश्न 4.
चार धामों की स्थिति का पता लगाइए। आपके अनुसार जब लोगों ने भारत के उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम की यात्रा की, तब उनके लिए इन धामों का क्या कोई विशेष महत्व था? (पृष्ठ 173)
उत्तर:
चार धाम भारत की चार दिशाओं में स्थापित हैं-बद्रीनाथ उत्तर में है, पूर्व में जगनाथ पुरी का मंदिर, पश्चिम में द्वारका में द्वारकाधीश मंदिर और दक्षिण में रामेश्वरम, रामनाथ स्वामी मंदिर है। चार धाम यात्रा शक्तिशाली तीर्थ परिक्रमा है और करोड़ों भक्त/श्रद्धालु आध्यात्मिक विकास, आत्मिक शुद्धि और परमात्मा से गहरा जुड़ाव प्राप्त करने की भावना से इस तीर्थयात्रा को करते थे। चार धाम यात्रा कठिन होती थी।
पर्वतों, नदियों और वनों को पार करते हुए यह यात्रा कठिन तपस्या और गहरी भक्ति का प्रतीक मानी जाती थी। आज भी करोड़ों श्रद्धालु चार धाम के माध्यम से पूरे देश की यात्रा करते हुए आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जागृति और भारत की भौगोलिक विविधता का अनुभव करते हैं।
प्रश्न 5.
क्या आप दिए गए मानचित्र में कुछ पारंपरिक तीर्थों की पहचान कर सकते हैं? आप पुस्तक के अंत में दिए गए राजनैतिक मानचित्र की सहायता ले सकते हैं। (पृष्ठ 174)

पूर्व दिशा में कामाख्या देवी मंदिर, जगन्नाथपुरी. त्रिपुर सुंदरी, कालीघाट, बैद्यनाथधाम (ज्योतिर्लिंग) हैं। दक्षिण दिशा में रामेश्वरम, मल्लिकार्जुन (ज्योतिर्लिंग), कांची, मीनाक्षी देवी मंदिर, रामनाथस्वामी मंदिर आदि हैं।
सिख धर्म के पावन स्थल:
उत्तर दिशा में हरमंदिर साहब, हेमकुंड साहिब, अकाल तख स्वर्ण मंदिर, पश्चिम में तख़ श्री हजूर साहिब (नांदेड़), पूर्व में गुरुद्वारा पटना साहिब और गुरुद्वारा नानक मठ और दक्षिण में नानक झीरा साहिब।
बौद्ध धर्म के पावन स्थल:
उत्तर में कुशीनगर, श्रावस्ती, सारनाथ, नेपाल (भारत सीमा के पास) लुंबिनी तीर्थ है।
पश्चिम में अजंता, ऐलारा व कनहेरी।
पूर्व दिशा में बोधगया, नालंदा।
दक्षिण में अमरावती स्तूप-महायान।
जैन धर्म के पावन स्थल:
उत्तर में हस्तिनापुर (जैन तीर्थकरों से जुड़ा स्थल)
पश्चिम में दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू), शत्रुंजय और गिरनार (गुजरात)।
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पूर्व दिशा में पावापुरी (बिहार), राजगीर।
दक्षिण में जैन पावन स्थलों में कर्नाटक में कुथलगिरि, हम्मी हैं।
प्रश्न 6.
पारदर्शी कागज की एक शीट लीजिए जिसका उपयोग अनुरेखण ( टूसिंग ) के लिए किया जा सकता हो। ‘साम्राज्यों का उदय’ का नामक अध्याय में दिए व्यापारिक मार्गों के मानचित्र का अनुरेखण कीजिए। इसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों के मानचित्र पर रखिए। आप इसके द्वारा क्या अवलोकन कर पा रहे हैं? ( पृष्ठ 181)
उत्तर:
पारदर्शी कागज की सहायता से सर्वप्रथम हमने ‘साम्राज्य का उद्य’ अध्याय से व्यापारिक मार्गों का मानचित्र बनाया, उसके बाद उसे भारत के महत्त्वपूर्ण तीर्थों के मानचित्र पर रखकर किए गए अवलोकन बिंदु निम्नलिखित हैं-
- तीर्थ स्थल प्राचीन व्यापार मार्गों के पास बनाए गए। इससे यात्रा की सुविधा के साथ-साथ व्यापार और आर्थिक लाभ को बढ़ावा भी मिलता है।
- पुण्य स्थलों/तीर्थ स्थलों के आस-पास व्यापारिक केंद्रों का विकास हुआ। धार्मिक गतिविधियों की वजह से व्यापार सेवाएँ, बाजार, दुकानें और पर्यटन विकसित हुआ।
- उत्तरापथ और दक्षिणापथ जैसे प्रमुख व्यापार मार्ग तीर्थयात्रा मार्ग के साथ जुड़े थे। उत्तरापथ पर गंगा क्षेत्र आता है और इस मार्ग पर अनेक बौद्ध, जैन और हिंदू तीर्थस्थल थे। दक्षिणापथ में वाराणसी से उज्जैन और पैठन तक जाने वाले इस मार्ग पर कई मंदिर व तीर्थ स्थित हैं।
इसे अनदेखा न करें (पृष्ठ 176)
प्रयागराज में प्रत्येक छह वर्षों में कुंभ मेले का आयोजन होता है। प्रयाग तीन नदियों-गंगा, यमुना तथा अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्थित है। कुछ वर्ष पूर्व यूनेस्को ने कुंभ मेले को ‘अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ के रूप में सूचीबद्ध किया है।
लगभग 66 करोड़ लोगों ने 2025 के कुंभ मेले में भाग लिया था। भारत की पूरी जनसंख्या का यह कितना अनुपात है? ( कुंभ मेला चित्र 8.14 पेज नं. 5 पर देखें।)
उत्तर:
- प्रयागराज में आयोजित कुंभ मेला भारत की धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत के महत्त्व को उजागर करता है।
- 2025 में कुंभ मेले में लगभग 66 करोड़ लोगों ने पवित्र स्नान किया, जो भारत की पूरी जनसंख्या का लगभग 47% है।
आइए विचार करें ( पृष्ठ 177)
प्रश्न 1.
आपके विचार में किस प्रकार ये पावन स्थल लोगों के आर्थिक जीवन और गतिविधियों से जुड़े हुए हैं।मानस मानचित्र (माइंड मैप) के माध्यम से इन संबंधों का पता लगाएँ। (संकेत-चित्र 8.7 व 8.8 (पाठ्यपुस्तक) में इस विषय में जानकारियाँ दी गई हैं)
उत्तर:
भारत के पावन स्थलों का अर्धिक प्रभाव न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। धार्मिक पर्यटन, स्थानीय व्यवसायों और व्यापरिक उन्नति और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। पावन स्थलों व तीर्थ यात्राओं से सामाजिक-अर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है। आध्यात्मिक उन्नति के प्रतीक पावन स्थल शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय व्यापार, पर्यटन और बुनियादी ढाँचे के सुधार में भी योगदान देते हैं।
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प्रश्न 2.
नीचे दी गई तालिका में भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में पावन निकुंजों के लिए प्रयुक्त नाम दिए गए हैं। क्या आप कुछ नए नाम जोड़ सकते हैं? ( पृष्ठ 180)

उत्तर:
| गुजराती तेलगु मणिपुरी उड़िया बंगाली असम |
देववन/देव नो बाग देवस्थल वनम् लई खोंगबाअम देवबन देबउद्यान थान |
प्रश्न 3.
उन स्थानों और प्राणियों के चित्रों को सावधानीपूर्वक देखिए, जिन्हें पावन माना जाता है। उत्तर में यमुना, पूर्व में महानदी तथा दक्षिण में कावेरी, ये सभी नदियाँ पावन मानी जाती हैं। फिर भी ये इतनी प्रदूषित कैसे हो गईं? क्या आपके आस-पास ऐसे पावन स्थल हैं, जो मानवीय गतिविधियों के कारण इसी तरह प्रदूषित एवं क्षीण हो गए हैं? हमारे पावन स्थलों की पावनता को बनाए रखना किसका दायित्व है? कक्षा में इस विषय पर चर्चा कीजिए। ( पृष्ठ 182)

उत्तर:
भारतवर्ष में नदियों को पवित्र माना जाता है। धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से नदियों का विशेष महत्त्व है। परंतु मानवीय गतिविधियों के कारण नदियों की पवित्रता प्रदूषित हो गई हैं।
- औद्योगिक प्रदूषण ने प्राकृतिक संतुलन को अत्यधिक प्रभावित किया है। फैक्ट्रियों से निकलने वाला रसायन और अवशेष नदी के जल को प्रदूषित करते हैं। दुकानों और घरों से निकलने वाला सीवेज और कचरा सही तरीके से सीवर नेटवर्क से न जुड़ने के कारण जल प्रदूषण बढ़ता है। डिटर्जेंट, औद्योगिक कीटनाशकों के वजह से फोम (झाग) की समस्या उत्पन्न होती है।भूमि अतिक्रमण, वृक्षों के कटाव, गैरकानूनी बस्तियाँ जैसी समस्याएँ नदी मार्ग को छोटा कर देती हैं। हमारे पावन स्थलों की पवित्रता बनाए रखने का दायित्व सरकार, उद्योग संगठनों, स्थानीय समुदाय और जनता को मिल-जुलकर संभालना चाहिए। नदियाँ हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली सरकार ने यमुना को स्वच्छ करने के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं। यमुना बचाओ मिशन की सफलता सिर्फ योजना और तकनीकी उपायों से नहीं अपितु आम जनता की भागीदारी और स्वच्छ व्यवहार के पालन से पूर्ण होगी।
गुप्त काल अथक सृजनशीलता का युग Class 7 Question Answer in Hindi
Class 7 Samajik Vigyan Chapter 7 Question Answer
प्रश्न 1.
प्रसिद्ध पर्यावरणविद डेविड सुजुकी के निम्नलिखित वाक्य पढ़ें-
“हम जिस दृष्टि से विश्व को देखते हैं, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार करते हैं। अगर पर्वत एक देवता है, न कि खनिज का ढेर; अगर नदियाँ पृथ्वी की शिराएँ हैं, न कि केवल सिंचाई का स्रोतः अगर
वन पावन निकुंज है, न कि केवल इमारती लकड़ियों का ढेर; अगर अन्य प्रजातियाँ हमारे संबंधी हैं, न कि केवल साधनमात्र या अगर पृथ्वी हमारी माता है, न कि केवल संसाधनः तब हम इन सभी के साथ अत्यंत आदर के साथ व्यवहार करते हैं। अतः यह विश्व को एक अलग परिप्रेक्ष्य में देखने की चुनौती है।”
इस पर छोटे समूह में चर्चा कीजिए। आप उक्त वाक्यों से क्या समझते हैं? इससे हमारे चारों ओर विद्यमान वायु, जल, भूमि, वृक्ष तथा पर्वत के प्रति हमारे व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पर्यावरणविद डेविड सुजुकी का यह कथन पर्यावरण को आदर और सम्मान के साथ देखने के लिए प्रेरित करता है। यदि प्रकृति को सिर्फ एक साधन के रूप में देखेंगे, तो प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और शोषण होता रहेगा। इसलिए पृथ्वी को पूजनीय, जीवित और पावन स्थलों के रूप में देखे और समझें। प्रकृति ही जीवन है-इस भावना का सम्मान करें।
अगर पर्वतों को देवता मानकर पूजेंगे तो हम उन्हें नष्ट नहीं करेंगे। नदियों को प्राण देने वाली माता मानेंगे तो वे प्रदूषित नहीं होंगी। पेड़ों को पर्यावरण की आत्मा मानेंगे तो उनका संरक्षण होगा। सभी जीव-जंतुओं के लिए पृथ्वी घर है और माता की तरह पालन-पोषण करती है। हमें पृथ्वी को अपनी संपत्ति नहीं, बल्कि धरोहर मानना चाहिए जिसे आने वाली पीढ़ियों का भी भला हो।
प्रश्न 2.
आपने क्षेत्र के पावन स्थलों की सूची बनाइए। पता लगाइए कि ये स्थल पावन क्यों माने जाते हैं? क्या इनसे जुड़ी कोई कहानियाँ हैं? इस विषय में 150 शब्दों में एक संक्षिप्त लेख लिखिए। (संकेत-आप अपने परिवार एवं समुदाय के वरिष्ठ लोगों से चर्चा कर सकते हैं। अपने शिक्षक से भी विचार-विमर्श कीजिए। इस प्रकार की सूचनाओं का संग्रह करने के लिए लेख एवं पुस्तक पढ़िए)
उत्तर:
भारत एक धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध देश है। मैं हरियाणा में स्थित कुरुक्षेत्र की निवासी हूँ। यह स्थान धार्मिक और पौराणिक धरोहर का धनी है। कुरुक्षेत्र को धर्मभूमि भी कहा जाता है। यहाँ ऐसे कई पावन स्थल और तीर्थस्थल हैं जो महाभारत, वेद, उपनिषद् और धार्मिक परंपरा से संबंधित हैं।
कुरुक्षेत्र की धरती पर महाभारत का युद्ध हुआ और भगवान श्रीकृष्ण ने भगवदगीता का उपदेश दिया। आज भी गीता ज्ञान संपूर्ण विश्व को आध्यात्म और मूल्यों से जोड़ता है। यहाँ पर ज्योतिसर तीर्थस्थल है, जहाँ श्रीकृष्ण के उपदेश के बाद अर्जुन ने मोह त्यागकर धर्म के पथ पर चलने का दृढ़निश्चय किया। कुरुक्षेत्र में ब्रह्मासरोवर तीर्थ है। इस स्थल को ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि निर्माण का स्थल माना जाता है और कार्तिक पूर्णिमा पर विशाल मेले का आयोजन होता है। इस प्रकार यह स्थल आत्मिक शांति, ज्ञान और इतिहास का जीवंत केंद्र है।
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प्रश्न 3.
आपवे विचार में प्राकृतिक तत्व, जैसे-नदी, पर्वत और वन आदि लोगों के लिए पावन क्यों माने जाते हैं? वे हमारे जीवन में किस प्रकार योगदान देते हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक तत्व जैसे-पर्वत, नदी, जंगल आदि केवल भौतिक संसाधन नहीं है, ये मानव के जीवन में धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता को स्थापित करते हैं। उदाहरण के लिए जंगलों का योगदान। भारत में कई स्थान पर देववन (देवताओं के नाम पर सुरक्षित वन) होते हैं जहाँ वृक्षों को काटना वर्जित है। छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड में पवित्र जंगलों की परंपरा आज भी जीवित है। आदिवासी क्षेत्रों में वनों की ग्राम देवता के रूप में पूजा होती है। रामायण, महाभारत में प्रभु श्रीराम ने वनवास लिया और पांडवों ने वन में काफी समय बीताया।
गौतम बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया। बौद्ध संघों ने कई जगह वनों को ‘अरण्य’ के रूप में संरक्षित किया। कई जैन तपस्थल वन क्षेत्रों में स्थापित किए गए हैं। भौतिक दृष्टि से जंगल और वृक्ष ऑक्सीजन (प्राणवायु) देकर पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। वन आयुर्वेद और दवाओं के लिए जड़ी-बूटियाँ देते हैं तथा जीव-जंतुओं का संरक्षण करते हैं। इसी तरह नदियों ने मानव जीवन को हर प्रकार से समृद्ध किया है। ये केवल जल-स्रोत नहीं हैं, बल्कि जीवन, संस्कृति और विकास का आधार भी हैं। नदियाँ जलचक्र को संतुलित रखती हैं। ये पेयजल, सिंचाई और उद्योगों के लिए मुख्य जल-स्रोत हैं।
विश्व में प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ। गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों को देवी रूप में पूजा जाता है। प्रमुख तीर्थस्थल जैसे-हरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज नदियों के किनारे बसे हैं। इस प्रकार प्राकृतिक तत्वों को धार्मिक और आध्यात्मिक साधना के साथ जोड़ा जाता है तो पर्यावरण चेतना का विकास होता है।
प्रश्न 4.
लोग तीर्थ या अन्य पावन स्थलों की यात्रा क्यों करते हैं?
उत्तर:
लोग तीर्थ या पावन स्थलों की यात्रा निम्नलिखित कारणों से करते हैं-
- आध्यात्मिक ज्ञान और शांति के लिए। आत्मचिंतन और ध्यान-योग से लोग ईश्वर की सत्ता और जीवन की सार्थकता को महसूस कर पाते हैं।
- धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार, तीर्थ स्थलों की यात्रा सत्कर्म और पुण्य कार्यों के लिए प्रेरित करते हैं। चार धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, सप्तपुरी, हेमकुंड साहिब, अकाल तख्त (स्वर्ण मंदिर) आदि पावन स्थलों की यात्राएँ सेवाभाव और सच्चे जीवन की प्रेरणा देती हैं। बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्रा ज्ञान और जागरण हेतु की जाती हैं। तीर्थयात्राओं से सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल और नए अनुभव मिलते हैं। देश की भागौलिक विविधिता को समझने का मौका मिलता है।
प्रश्न 5.
प्राचीन तीर्थयात्रा मार्गों ने उस समय किस प्रकार व्यापार को प्रोत्साहित किया? आपके अनुसार ये पावन स्थल उन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायक बने?
उत्तर:
प्राचीन तीर्थयात्रा मार्गों ने व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया। तीर्थयात्री जिस मार्ग से जाते वहाँ जरूरत की वस्तुओं और सेवाओं की माँग बढ़ी। भोजन, वस्त्र, पूजन सामग्री, धर्मशालाओं और आश्रयगृह की जरूरत होती थी। इसके चलते तीर्थ स्थलों के नजदीक बाजारों का विकास हुआ। इससे हस्तकला, शिल्पकारों और छोटे-बड़े व्यापारियों के लिए भी आर्थिक उन्नति के नए मौके मिलने लगे। युवाओं को रोजगार मिला और आजीविका के स्रोत बने। तीर्थयात्राओं के द्वारा लघु उद्योगों को लाभ के अवसर मिलते थे।
प्रश्न 6.
पावन स्थल किस प्रकार वहाँ के लोगों की संस्कृति और परंपरा को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
पावन स्थल वहाँ के लोगों की संस्कृति, परंपराओं और भौगोलिक क्षेत्र की जीवन-शैली को गहराई से प्रभावित करते हैं-
- लोकगीत संगीत, नृत्य, उत्सवों और स्थानीय लोगों के आचार-व्यवहार में धार्मिक स्थल और संस्कृति का अमिट प्रभाव पड़ता है। उदाहरणमदुरै (तमिलनाडु)-मीनाक्षी मंदिर।
- लोक संगीत में तमिल भक्ति गीत, देवरा गीत हैं। भरतनाट्यम की प्रस्तुति मंदिरों में होती है। स्थानीय लोगों द्वारा मीनाक्षी तिरुकल्याणम उत्सव में पूजा, व्रत और पारंपरिक वस्त्रों को धारण करना आम है।
- स्थानीय भाषा और कला का संरक्षण-तीर्थ स्थल स्थानीय बोली, भाषा, लिपि और कला को धार्मिक ग्रंथों, साहित्यिक पुस्तकों, और भक्ति भजनों और शिष्पकला के द्वारा जीवित रखते हैं। जैसे जगन्नाथ- पुरी की संस्कृति ओड़िया भाषा, पाटचित्र और स्थानीय काष्ठ शिल्प पर आधारित है।
- आदिवासी और जनजातीय मान्यताओं में प्राकृतिक-तत्वों की देवी-देवताओं के रूप में पूजा की जाती है। यहाँ के पावन स्थल के लोग आस्था के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं।
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प्रश्न 7.
भारत के विविध प्रकार के पावन स्थलों में से अपनी रुचि के अनुसार किन्ही दो का चयन कीजिए तथा उनक्म महत्व बताते हुए एक परियोजना बनाइए।

उत्तर:
वाराणसी (काशी) अत्यंत प्राचीन और पवित्र हिंदू तीर्थस्थल है, जहाँ गंगा नदी के तट पर स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर और घाटों का विशेष महत्त्व है। काशी धर्म, अध्यात्म, परंपरा और संस्कृति का मुख्य केंद्र है। गंगा नदी में स्नान और काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना जाता है। वाराणसी विश्व के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक है और यह समृद्ध विरासत और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है।
2021 में काशी विश्वनाथ धाम परियोजना के अंतर्गत विश्वनाथ मंदिर और गंगा तट के बीच सुगम और सुविधाजनक रास्ता बनाया गया है, जिससे तीर्थयात्रियों को आने-जाने में आसानी हो। शिवरात्री और सावन के महीने में यहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं। इससे स्थानीय व्यापार, तीर्थ पर्यटक और अर्थिक सुविधाओं में वृद्धि हुई है। काशी की सांस्कृतिक व सामाजिक महत्ता ज्ञान की नगरी काशी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थित है। मदिरों में शास्त्रीय संगीत, कला और साहित्य की परंपरा जीवंत है।

विविधताओं का देश भारत आध्यात्मिकता और वास्तुकला की अनूठी मिसाल है। दिलवाड़ा जैन मंदिर, जो राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है-जैन धर्म के अनुनायियों के लिए एक पवित्र स्थल है। दिलवाड़ा मंदिर अपनी शिल्पकला इतिहास के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 11 वीं से 12 वीं शताब्दी के बीच सोलंकी राजवंश के शासनकाल में सफेद संगमरमर से निर्मित यह मंदिर बारीक
नक्काशी और शिल्पकला का अद्वितीय उदाहरण है। दिलवाड़ा में कुल 5 प्रमुख मदिर हैं-
- विमल वसाही मंदिर जो प्रथम तीर्थकर भगवान आदिनाथ को समर्पित है।
- लूण वसाही मंदिर तीर्थंकर नेमिनाथ को समर्पित है।
- पित्तलहर
- पाश्र्वनाथ मंदिर
- महावीर स्वामी मंदिर जो तीर्थंकर महावीर स्वामी को समर्पित है। दिलवाड़ा मंदिर संस्कृति और कला के लिए अनमोल धरोहर है।

प्रश्न 8.
तीर्थयात्राएँ किस प्रकार दोहरा महत्त्व रखती हैं?
उत्तर:
तीर्थयात्राएँ न केवल धार्मिक आस्था और रीति-रिवाजों की अभिव्यक्ति है, बल्कि वे सामाजिक एकता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आर्थिक विकास का मुख्य आधार बनती हैं। धार्मिक महत्त्व और कर्तव्यों को पूर्ण करने के लिए तीर्थयात्राएँ की जाती है। जीवन में मूल्यों और विश्वा़स को बनाए रखने में धार्मिक यात्राएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
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जैसे प्रयागराज (त्रिवेणी संगम) और चार धाम तीर्थ स्थलों को बहुत पवित्र माना जाता है। तीर्थयात्राएँ सामाजिक महत्त्व को भी उजागर करती हैं। अलग-अलग राज्यों, भाषाओं और जातियों के लोग मिलते-जुलते हैं। इससे मेल और सहयोग बढ़ता है। आर्थिक विकास के लिए भी तीर्थयात्राएँ महत्त्वपूर्ण हैं।
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