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Class 9 Hindi आखिरी चट्टान तक Extra Question Answer
Class 9 Hindi Chapter 5 आखिरी चट्टान तक Extra Question Answer
NCERT Class 9 Hindi Chapter 5 Extra Question Answer अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
लेखक कहाँ घूमने गया था और क्यों?
उत्तर:
लेखक कन्याकुमारी घूमने गया था; सूर्यादय और सूर्यास्त देखने।
प्रश्न 2.
विवेकानंद चट्टान क्यों प्रसिद्ध हैं?
उत्तर:
विवेकानंद चट्टान पर विवेकानंद जी ने समाधि ली थी इसीलिए वह चट्टान उनके नाम से प्रसिद्ध है।
प्रश्न 3.
समुद्र तट पर लेखक को कब घबराहट होने लगी थी?
उत्तर:
लेखक ने जब देखा कि समुद्र का पानी बढ़ने से तट की चौड़ाई केवल तीन- – चार फुट ही रह गई है और लहर उसके पैरों तक आ रही है तो उसे घबराहट होने लगी थी।
प्रश्न 4.
स्थानीय युवतियाँ क्या बेच रही थीं?
उत्तर:
स्थानीय युवतियाँ माला और शंख बेच रही थी।
प्रश्न 5.
सूर्यास्त देखने के लिए लेखक सबसे पहले कहाँ गया?
उत्तर:
हिल’ पर गया।
सूर्यास्त देखने के लिए लेखक सबसे पहले ‘सैंड
प्रश्न 6.
लेखक को समुद्र का सबसे अधिक खुला विस्तार कहाँ नजर आया?
उत्तर:
लेखक को समुद्र का सबसे अधिक खुला विस्तार पश्चिमी क्षितिज पर नजर आया।
प्रश्न 7.
सबसे ऊँचे टीले पर पहुँच कर लेखक को क्या लगा?
उत्तर:
सबसे ऊँचे टीले पर पहुँच कर लेखक को लगा जैसे वह दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर हो।
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प्रश्न 8.
लेखक को दूर-दूर हटकर क्या उगा नजर आ रहा था?
उत्तर:
लेखक को दूर-दूर हटकर नारियल के पेड़ों के झुरमुट नजर आ रहे थे।
प्रश्न 9.
सामने फैली रेत कैसी थी?
उत्तर:
सामने फैली रेत बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान थी।
आखिरी चट्टान तक Extra Question Answer लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
सबसे ऊँचे टीले पर पहुँच कर लेखक ने क्या देखा?
उत्तर:
सबसे ऊँचे टीले पर पहुँच कर लेखक को पश्चिमी क्षितिज का विस्तार नजर आया। वहाँ से दूर तक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो । सूर्य तब पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर लेखक टीले पर बैठ गया। उसे लगा जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी है और आज उसने उसे फतह कर लिया है।
प्रश्न 2.
सैंड टीले पर लेखक ने क्या देखा?
उत्तर:
लेखक ने देखा कि यात्रियों की बहुत-सी टोलियाँ सैंड टीले की तरफ सूर्यास्त देखने जा रही हैं। लेखक भी उस ओर चल दिया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि वहाँ पर बहुत-से लोग थे। आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति । वे शायद सूर्यास्त देख रहे थे। गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफी पिला रहे थे। उन लोगों के वहाँ होने से सैंडहिल बहुत रंगीन हो उठी थी । उन लोगों ने सूर्यास्त देखने के लिए विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना हुआ था।
प्रश्न 3.
लेखक को लौट जाने का ख्याल कब आया?
उत्तर:
जब लेखक सूर्यास्त देखने के लिए अनेक टीले पार करके बहुत दूर निकल आया तो वहाँ वह एक सबसे ऊँचे टीले समुद्र के सूर्यास्त को निहारने लगा। जब कुछ क्षण पश्चात सूर्यास्त हो गया तो चारों तरफ अंधकार छाने लगा। उस समय लेखक को लौट चलने का ख्याल आया क्योंकि वह सब लोगों से दूर अकेले ही वहाँ चला आया था।
प्रश्न 4.
क्या विवेकानंद चट्टान पर भी लेखक अकेला पहुँचा था?
उत्तर:
नहीं, विवेकानंद चट्टान पर लेखक अकेला नहीं गया था। वह मछुआ नाव से चट्टान तक पहुँचा था। उसके साथ उसे मिलाकर आठ आदमी थे। तीन नवयुवक और चार मल्लाह। उन तीन नवयुवकों में से एक ग्रेजुएट था जिससे लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय जीवन के बारे में जानकारियाँ हासिल की।
प्रश्न 5.
सूर्योदय के समय लेखक को घाट पर कैसा दृश्य दिख रहा था ?
उत्तर:
सूर्योदय के समय बहुत से लोग घाट पर थे। वे सूर्योदय का सुंदर नजारा देखने और उगते सूर्य को प्रणाम करने आए थे। कुछ लोग सूर्य को अर्घ्य दे रहे थे। घाट से थोड़ा हटकर गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे सरकारी मेहमानों को सूर्यादय के समय की कॉफी पिला रहे थे। कुछ युवतियाँ टोकरी में शंख और मालाएँ रखकर बेच रही थीं और साथ-साथ बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य दर्शन करवा रही थीं।
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Class 9 Hindi Chapter 5 Extra Questions and Answers दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
विवेकानंद चट्टान पर लेखक कैसे पहुँचा और वहाँ पहुँच कर उसने कैसा महसूस किया?
उत्तर:
विवेकानंद चट्टान पर लेखक मछुआ नाव से तीन नवयुवकों और चार मल्लाहों के साथ पहुँचा। विवेकानंद चट्टान तट से सौ- सवा सौ गज आगे समुद्र के बीच जाकर है – वहाँ, जहाँ बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक सीमा समाप्त होती है। रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़कर बनाई गई नाव में नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे। समुद्र को देखकर लेखक के अंदर एक डर था जो पिछली रात सूर्यास्त के समय उसके मन में बैठ गया था। जब लेखक चट्टान पर पहुँच गया तो डर उसकी टाँगों में उतर गया और वहाँ बैठे-बैठे भी उसके पैर हल्के-हल्के काँप रहे थे।
प्रश्न 2.
लेखक ने रेत के विभिन्न रंगों का वर्णन कैसा किया है?
उत्तर:
लेखक जब सूर्यास्त देखने के लिए एक के बाद एक कई टीले पार करके सबसे ऊँचे टीले पर पहुँचा तो सूर्य पानी की सतह के पास पहुँच गया था। वहीं लेखक ने देखा कि सुनहली किरणों ने पीली रेत को एक नया सा रंग दे दिया था। उस रंग में रेत इस तरह चमक रही थी जैसे अभी-अभी उसका निर्माण करके उसे वहाँ उड़ेला गया हो। लेखक ने रेत पर दूर तक बने अपने पदचिह्नों को भी देखा जो मात्र उसके ही थे क्योंकि वहाँ अन्य कोई दूसरा व्यक्ति नहीं आया था। रेत पर सुनहरे रंग के पश्चात लाल और बैंजनी रंग की भी आभा फैलने लगी। लेखक तट की रेत देखकर अँधेरे की बात भूलने लगा। उसने पहले भी समुद्र तट पर कई रंगों की रेत देखी थी जैसे सुरमई, खाकी, पीली और लाल । मगर जैसे रंग उसने आज उस रेत पर देखे थे वैसे पहले कभी नहीं देखे थे। वहाँ कितने ही अनाम रंग थे। एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग। एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितने मिश्रण बनाए जा सकते थे वे सभी वहाँ थे। लेखक का मन हुआ कि वह इन विभिन्न रंग की रेत को अपने साथ ले जाए।
प्रश्न 3.
सूर्यास्त को अधिक विस्तार से देखने की चाह में लेखक पर क्या बीती?
उत्तर:
सूर्यास्त को अधिक विस्तार से देखने की चाह में लेखक गलत कदम उठा बैठा। वह सैंड हिल पर सूर्यास्त देखने चढ़ा तो था परंतु तभी उसने देखा कि अरब सागर की तरफ एक ऊँचा टीला है जिसकी ओट में विस्तार छिपा है। वह अधिक स्पष्ट रूप से सूर्यास्त देखने को लिए उस टीले की तरफ चल दिया उसके बाद एक-एक करके कई टीले पार कर गया। अंत में एक ऊँचे टीले पर पहुँच कर उसने सूर्यास्त का आनंद लिया परंतु जब सूर्य के डूबने के पश्चात अँधेरा बढ़ गया तब उसे एहसास हुआ कि अब उसे वापस भी सुरक्षित रूप से लौटना है। तभी समुद्र का पानी बढ़ना शुरू हो गया। उसने चट्टान को घेरे में लेना शुरू कर दिया। लेखक चट्टान से उतर कर वहाँ पर चलने लगे तो देखा कि लगातार बढ़ते समुद्र से तट की चौड़ाई मात्र तीन-चार फुट ही रह गई है तो वह तेज-तेज कदमों से होटल की दिशा में चलने लगा परंतु जब समुद्र की लहर ने उसके पैरों को छुआ तो वह सिहर गया तभी सहसा दूर से आती समुद्री लहर को देखकर उसे लगा जैसे वह उसे समुद्र में खींच लेगी। यह देखकर घबराकर वह नुकीली चट्टान के ऊपर चढ़ गया और अपने को सुरक्षित किया।
मूल्यपरक प्रश्न
प्रश्न 1.
लेखक ने सूर्यास्त को सब लोगों के साथ न देखकर अकेले देखा। आप लेखक के इस निर्णय अथवा कार्य को कितना उचित मानते हैं?
उत्तर:
लेखक ने सूर्यास्त को सब लोगों के साथ न देखकर अकेले देखा। मैं लेखक का यह निर्णय बिल्कुल भी उचित नहीं मानता। मेरे हिसाब से लेखक को ‘सैंडहिल’ से ही सूर्यास्त देख लेना चाहिए था लेकिन अधिक विस्तार में दर्शन के लालच में वे अनेक टीलों को पार कर निर्जन स्थान पर पहुँचें। उन्होंने अपने अनुसार सूर्यास्त तो विस्तृत रूप से देख लिया परंतु अँधेरा होने पर उनकी मुश्किलें बढ़ गईं। उन्हें वहाँ से निकलने का स्पष्ट रास्ता नहीं समझ आ रहा था। उन्होंने अपने मन की दशा स्वयं व्यक्त की है कि जब पानी बढ़ने से समुद्र तट मात्र तीन-चार फुट का ही रह गया तो उन्हें एहसास हुआ कि कहीं समुद्र उन्हें निगल न जाए। इसी घबराहट में वे जूते उतार कर भागे । यहाँ सोचने की बात है कि ईश्वर न करे यदि सचमुच वे समुद्र की चपेट में आ जाते तो क्या करते? क्योंकि वहाँ तो कोई दूसरा नहीं था जो उनकी पुकार सुनकर सहायता के लिए आता। वहीं दूसरी तरफ यदि इस प्रकार का हादसा सैंड हिल की तरफ होता तो बचाव दल अवश्य रक्षा करता। मेरे नजरिए से हमें निर्जन स्थान से बचना चाहिए और सबके साथ रहना चाहिए। इससे हम सदैव सुरक्षित रहेंगे। साथ ही इससे प्रत्येक चीज़ का आनंद भी दूसरों से बाँटने पर दुगुना हो जाएगा।
प्रश्न 2.
यदि आप कहीं प्राकृतिक सौंदर्य के दर्शन हेतु जाएँ – किसी समुद्र अथवा नदी के किनारे, किसी पर्वतीय स्थल पर या वन्य प्रदेश में, तो क्या आप भी लेखक की तरह जिज्ञासु बनकर अकेले भ्रमण करेगें अथवा नहीं, विचार कर उत्तर दीजिए।
उत्तर:
यदि मैं किसी प्राकृतिक स्थान पर घूमने जाऊँगा तो निश्चय ही जिज्ञासु प्रवृत्ति रखूँगा परंतु लेखक की तरह अकेले भ्रमण पर कभी नहीं निकलूंगा। इसका कारण यह नहीं कि मैं डरपोक हूँ अथवा इसका कारण यह है कि मैं यह समझता हूँ कि किसी भी अनजाने स्थान पर अकेले भ्रमण हेतु निकलना उचित नहीं । यह खतरनाक और असुरक्षित हो सकता है। चलो, एक बार को यह मान भी लिया जाए कि वहाँ प्राकृतिक रूप से सब सुरक्षित है। तब भी संभव है, मेरी तबीयत खराब हो जाए अथवा मैं और चलने के लायक नहीं रहूँ या मैं रास्ता भटक जाऊँ। ऐसी किसी भी परिस्थिति में यदि कुछ हुआ तो मैं किसे सहायता के लिए पुकारूँगा । यदि मैं सबके साथ रहूँगा तो निश्चय ही मुझे दूसरों की मदद मिल जाएगी। इसलिए मेरी समझ यह कहती है कि यदि कहीं घूमने जाएँ तो सबको साथ रहें, अकेले रास्ते पर न जाएँ।
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Class 9 Ganga Chapter 5 Extra Question Answer अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
गद्यांश – 1
पृष्ठभूमि में कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के संगम स्थल-सी वह चट्टान, जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगायी थी, हर तरफ से पानी की मार सहती हुई स्वयं भी समाधिस्थ-सी लग रही थी। हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें मेरे आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं। बलखाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिससे उनके ऊपर चूरा बूँदों की जालियाँ बन जाती थीं। मैं देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से महसूस कर रहा था-शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति। तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी ही पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं। तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं हूँ, एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा- बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान। जब अपना होश हुआ, तो देखा कि मेरी चट्टान भी तब तक बढ़ते पानी में काफी घिर गई है। मेरा पूरा शरीर सिहर गया। मैंने एक नजर फिर सामने के उमड़ते विस्तार पर डाली ओर पास की एक सुरक्षित चट्टान पर कूदकर दूसरी चट्टानों पर से होता हुआ किनारे पर पहुँच गया। (पृष्ठ 85)
लघूत्तरात्मक प्रश्नः
प्रश्न 1.
विवेकानंद चट्टान कहाँ स्थित थी?
उत्तर:
विवेकानंद चट्टान कन्याकुमारी में अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी इन तीनों के संगम स्थल पर स्थित थी।
प्रश्न 2.
लेखक क्या देख और महसूस कर रहा था?
उत्तर:
लेखक चारों तरफ सागर की लहरों और उसके विस्तार को देख रहा था। उसने देखा कि हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें उसके आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं। बलखाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिससे उनके ऊपर चूरा बूँदों की जालियाँ बन जाती थीं। लेखक यह सब देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से शक्ति का विस्तार विस्तार की शक्ति को महसूस कर रहा था।
प्रश्न 3.
लेखक क्या भूल चुका था और होश आने पर उसने क्या देखा?
उत्तर:
तीन ओर से क्षितिज को आँखों में सिमेटे हुए लेखक कुछ देर तक भूल गया कि वह एक जीवित व्यक्ति है। दूर से आया एक यात्री है, एक दर्शक है। वो तो उस दृश्य का हिस्सा बन कर खड़ा था। जब होश आया तो उसने देखा कि वह जिस चट्टान पर खड़ा है वह समुद्र के पानी से काफी हद तक घिर गई है। यह देखकर उसका पूरा शरीर डर से सिहर गया। तब उसने पास की दूसरी चट्टान पर कूद कर अपने को सुरक्षित किया।
गद्यांश – 2
सूर्य का गोला पानी की सतह से छू गया। पानी पर दूर तक सोना-ही-सोना ढुल आया। पर वह रंग इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था किसी भी एक क्षण के लिए उसे एक नाम दे सकना असंभव था। सूर्य का गोला जैसे एक बेबसी में पानी के लावे में डूबता जा रहा था। धीरे-धीरे वह पूरा डूब गया और कुछ क्षण पहले जहाँ सोना बह रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा। कुछ और क्षण बीतने पर वह लहू भी धीरे-धीरे बैजनी और बैजनी से काला पड़ गया। मैंने फिर एक बार मुड़कर दाई तरफ पीछे देख लिया। नारियलों की टहनियाँ उसी तरह हवा में ऊपर उठी थीं। हवा उसी तरह गूँज रही थी, पर पूरे दृश्यपट पर स्याही फैल गई थी। एक-दूसरे से दूर खड़े झुरमुट, स्याह पड़कर, जैसे लगातार सिर धुन रहे थे और हाथ-पैर पटक रहे थे। मैं अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और अपनी मुट्ठियाँ भींचता खोलता कभी उस तरफ और कभी समुद्र की तरफ देखता रहा। (पृष्ठ 87)
लघूत्तरात्मक प्रश्नः
प्रश्न 1.
सूर्यास्त के समय कैसा दृश्य छा गया था?
उत्तर:
सूर्यास्त के समय जब सूर्य पानी की सतह छू रहा था तो सूर्य ने मानो सारे वातावरण में सोना बिखेर दिया हो। पहले चारों तरफ सुनहरा रंग बिखरा, फिर इतना लाल रंग हुआ मानो लहू बह रहा हो। धीरे-धीरे सूर्य डूब गया। फिर जहाँ लाल रंग था वहीं बैंजनी रंग हो गया और बाद में काला पड़ गया।
प्रश्न 2.
सूर्यास्त के पश्चात पेड़ों के झुरमुट कैसे लग रहे थे?
उत्तर:
सूर्यास्त के पश्चात पेड़ों के झुरमुट पर भी काली स्याही – सी फैल गई थी। एक-दूसरे से दूर खड़े वे झुरमुट, स्याह पड़कर, जैसे लगातार सिर धुन रहे थे और हाथ-पैर पटक रहे थे। लेखक को ऐसा इसलिए प्रतीत हुआ क्योंकि हवा से पेड़ों की टहनियाँ ऊपर की तरफ उठी थीं और हिल रही थीं।
प्रश्न 3.
धीरे-धीरे सूर्यास्त के पश्चात कैसा दृश्य हो गया था?
उत्तर:
धीरी – धीरे सूर्यास्त के पश्चात कुछ क्षण पहले जहाँ सोना बह रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा। कुछ और क्षण बीतने पर वह लहू भी धीरे-धीरे बैंजनी और बैंजनी से काला पड़ गया। सारे दृश्य पर स्याही फैल चुकी थी।
गद्यांश – 3
अचानक खयाल आया कि मुझे वहाँ से लौटकर भी जाना है। इस खयाल से ही शरीर में कँपकँपी भर गई। दूर सैंड हिल की तरफ देखा । वहाँ स्याही में डूबे कुछ धुंधले रंग हिलते नजर आ रहे थे। मैंने रंगों को पहचानने की कोशिश की, पर उतनी दूर से आकृतियों को अलग-अलग कर सकना संभव नहीं था। मेरे और उन रंगों के बीच स्याह पड़ती रेत के कितने ही टीले थे। मन में डर समाने लगा कि क्या अँधेरा होने से पहले मैं उन सब टीलों को पार करके जा सकूँगा? कुछ कदम उस तरफ बढ़ा भी पर लगा कि नहीं! उस रास्ते से जाऊँगा, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाऊँगा । इसलिए सोचा बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाऊँ-तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा। निर्णय तुरंत करना था, इसलिए बिना और सोचे मैं रेत पर बैठकर नीचे तट की तरफ फिसल गया। पर तट पर पहुँचकर फिर कुछ क्षण बढ़ते अँधेरे की बात भूला रहा। कारण था तट की रेत। यूँ पहले भी समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की रेत देखी थी- सुरमई, खाकी, पीली और लाल। मगर जैसे रंग उस रेत में थे, वैसे मैंने पहले कभी कहीं की रेत में नहीं देखे थे। कितने ही अनाम रंग थे वे एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग… और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जो सकते थे, वे सब वहाँ थे। (पृष्ठ 87)
लघूत्तरात्मक प्रश्नः
प्रश्न 1.
किस ख्याल से लेखक के शरीर में कँप – कँपी भर गई?
उत्तर:
जब लेखक एक टीले से दूसरे टीले तक पहुँचकर बहुत आगे आ गया तो उसे ख्याल आया कि उसे वहाँ से लौटकर वापस भी जाना है जबकि सूर्यास्त के पश्चात सब तरफ अँधेरा हो जाएगा। यही सब सोचकर उसके शरीर में कँपकँपी भर गई।
प्रश्न 2.
लेखक के मन में कैसा डर समाने लगा?
उत्तर:
जब सूर्यास्त के पश्चात उसने रेत के रंगों को स्याह पड़ते देखा तो उसके मन में डर समाने लगा कि क्या अँधेरा होने से पहले वह उन सब टीलों को पार कर सकेगा, क्योंकि उसे अपने होटल सुरक्षित वापस भी पहुँचना था। अँधेरा बढ़ने के साथ-साथ समुद्र का पानी भी बढ़ रहा था।
प्रश्न 3.
लेखक ने रेत के कैसे रूप वहाँ देखे?
उत्तर:
सूर्यास्त के समय लेखक ने रेत के विभिन्न रूप देखे। वैसे तो उसने पहले भी समुद्र तट पर कई रंगों की रेत देखी थी – सुरमई, खाकी, पीली और लाल। मगर जैसे रंग उस रेत में थे, वैसे उसने पहले कभी नहीं देखे थे। कितने ही अनाम रंग थे वे जो एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग थे। एक-एक रंग कई रंगों की झलक लिए हुए था।
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गद्यांश – 4
समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई, तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ। मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। तट का सिर्फ तीन-तीन चार-चार फुट हिस्सा पानी से बाहर था। लग रहा था कि जल्दी ही पानी उसे भी अपने अंदर समा लेगा। एक बार सोचा कि खड़ी रेत से होकर फिर ऊपर चला जाऊँ। पर वह स्याह पड़ती रेत इस तरह दीवार की तरह उठी थी कि उस रास्ते ऊपर जाने की कोशिश करना ही बेकार था। मेरे मन में खतरा बढ़ गया। मैं दौड़ने लगा। दो-एक और लहरें पैरों के नीचे तक आकर लौट गईं। मैंने जूता उतारकर हाथ में ले लिया। एक ऊँची लहर से बचकर इस तरह दौड़ा जैसे सचमुच वह मुझे अपनी लपेट में लेने आ रही हो। सामने एक ऊँची चट्टान थी। वक्त पर अपने को संभालने की कोशिश की, फिर भी उससे टकरा गया। बाँहों पर हल्की खरोंच आ गई, पर ज्यादा चोट नहीं लगी। चट्टान पानी के अंदर तक चली गई थी उसे बचाकर आगे जाने के लिए पानी में उतरना आवश्यक था। पर उस समय पानी की तरफ पाँव बढ़ाने का मेरा साहस नहीं हुआ। मैं चट्टान की नोकों पर पैर रखता किसी तरह उसके ऊपर पहुँच गया। सोचा नीचे खड़े रहने की अपेक्षा वह अधिक सुरक्षित होगा। पर ऊपर पहुँचकर लगा जैसे मेरे साथ एक मजाक किया गया हो। चट्टान के उस तरफ तट का खुला फैलाव था-लगभग सौ फुट का। कितने ही लोग वहाँ टहल रहे थे। ऊपर सड़क पर जाने के लिए वहाँ से रास्ता भी बना था। मन से डर निकल जाने से मुझे अपने आप काफी हल्का लगा और मैं चट्टान से नीचे कूद गया। (पृष्ठ 88)
लघूत्तरात्मक प्रश्नः
प्रश्न 1.
लेखक को खतरे का अहसास कब हुआ?
उत्तर:
लेखक जब सूर्यास्त के पश्चात समुद्र तट पर चलता हुआ वापिस अपने होटल की तरफ जा रहा था तो उसने देखा कि तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी और समुद्र का पानी बढ़ने लगा था। सहसा एक लहर लेखक के पैरों को छू गई तो लेखक को खतरे का अहसास हुआ।
प्रश्न 2.
लेखक को खरोंच क्यों आई?
उत्तर:
बढ़ते पानी को देखकर लेखक घबरा गया और वह तट पर तेजी से चलने लगा। तभी उसने देखा कि एक ऊँची लहर उसी की तरफ आ रही है; उसे लगा मानो वह उसे समुद्र में खींच ले जाएगी। यह सोचकर वह सामने की चट्टान की ओर बढ़ा और संभलते हुए भी उससे टकरा गया जिससे उसकी बाँहों पर हल्की खरोंच आ गई। लेखक ने जूता उतारकर हाथ में इसलिए लिया ताकि वह तेजी से दौड़ सके और ऊँची लहरों से बचते हुए आसानी से आगे बढ़ सके।
प्रश्न 3.
लेखक जूता हाथों में लेकर क्यों दौड़ा?
उत्तर:
बढ़ते पानी को देखकर लेखक घबरा गया और वह तट पर तेजी से चलने लगा। तभी उसने देखा कि एक ऊँची लहर उसी की तरफ आ रही है; उसे लगा मानो वह उसे समुद्र में खींच ले जाएगी। यह सोचकर वह सामने की चट्टान की ओर बढ़ा और संभलते हुए भी उससे टकरा गया जिससे उसकी बाँहों पर हल्की खरोंच आ गई। लेखक ने जूता उतारकर हाथ में इसलिए लिया ताकि वह तेजी से दौड़ सके और ऊँची लहरों से बचते हुए आसानी से आगे बढ़ सके।
गद्यांश – 5
सूर्यादय। हम आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे। चट्टान तट से सौ-सवा-सौ गज आगे समुद्र के बीच जाकर है- वहाँ, जहाँ बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक सीमा समाप्त होती है। मेरे अलावा कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक ग्रेजुएट था। चार मल्लाह थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में हमें वहाँ लाए थे। नाव क्या थी, रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था, बस नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे, तो मैंने आसमान की तरफ देखते हुए उतनी देर अपनी चेतना को स्थगित रखने की चेष्टा की थी। अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढक रखना चाहा था। पर जब चट्टान पर पहुँच गए, तो डर मेरी टाँगों में उतर गया क्योंकि वहाँ बैठे हुए भी वे हल्के-हल्के काँप रही थीं।
ग्रेजुएट नवयुवक मुझे बता रहा था कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य धंधा है नौकरियों के लिए अर्जियाँ देना और बैठकर आपस में बहस करना। वह खुद वहाँ फोटो एल्बम बेचता था। दूसरे नवयुवक भी उसी तरह के छोटे-मोटे काम करते थे। “हम लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं”, वह कह रहा था। “इस चट्टान से इतनी प्रेरणा तो हमें मिलती ही है।” मुझे दिखाने के लिए उसने वहीं से एक सीपी लेकर उसे तोड़ा और उसका गूदा मुँह में डाल लिया। (पृष्ठ 89)
लघूत्तरात्मक प्रश्नः
प्रश्न 1.
लेखक को ग्रेजुएट युवक ने क्या बताया?
उत्तर:
लेखक को ग्रेजुएट नवयुवक ने बताया कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य धंधा है-नौकरी की तलाश।
प्रश्न 2.
कन्याकुमारी के पढ़े-लिखे युवक भी क्या कार्य करते थे?
उत्तर:
कन्याकुमारी के पढ़े-लिखे युवक नौकरियों के लिए अर्जियाँ देते हैं। दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं एल्बम बेचते हैं। छोटे-मोटे काम करते हैं और सीपियों का गूदा खाते हैं।
प्रश्न 3.
लेखक की टाँगों में डर क्यों उतर आया था?
उत्तर:
लेखक एक दिन पहले सूर्यास्त के पश्चात कम चौड़ाई वाले समुद्र तट पर फँस गया था। वहाँ पानी बढ़ने के कारण उसके पैरों से टकरा रहा था और सुरक्षित चट्टान पर पहुँचते समय उसे चोट भी लग गई थी। इसी कारण जब वह अगले दिन सूर्योदय के समय विवेकानंद चट्टान पर पहुँच गया तो चारों तरफ पानी देखकर उसे घबराहट हो रही थी और डर उसकी टाँगों में उतर आया था।
गद्यांश – 6
पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिलाकर, छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी स्याह चट्टानों की ओट से सूर्य उदित हो रहा था। घाट पर बहुत से लोग उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए एकत्रित थे। घाट से थोड़ा हटकर गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे सरकारी मेहमानों को सूर्योदय के समय की कॉफी पिला रहे थे। दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख और मालाएँ दिखला रही थीं। वे लोग दोनों काम साथ-साथ कर रहे थे-मालाओं का मोल तोल और अपने बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य दर्शन। मेरा साथी अब मुहल्ले – मुहल्ले के हिसाब से मुझे बेकारी के आँकड़े बता रहा था। बहुत-से कडल काक हमारे आस-पास तैर रहे थे वहाँ की बेकारी की समस्या और सूर्योदय की विशेषता, इन दोनों से बे-लाग।
कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थीं। भक्तों की एक मंडली अंदर जाने से पहले मंदिर की दीवार के पास रुककर उसे प्रणाम कर रही थी। सरकारी मेहमान गेस्ट हाउस की तरफ लौट रहे थे। हमारी नाव और किनारे के बीच हल्की धूप में कई एक नावों के पाल और कडल काकों के पंख एक-से चमक रहे थे। मैं अब भी आँखों से बीच की दूरी नाप रहा था और मन में बसों का टाइम टेबल दोहरा रहा था। तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी….। (पृष्ठ 89-90)
लघुत्तरात्मक प्रश्न:
प्रश्न 1.
लोग घाट पर क्यों एकत्रित थे?
उत्तर:
पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिलाकर, छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी स्याह चट्टानों की ओर से सूर्य उदित हो रहा था। घाट पर बहुत-से लोग उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए एकचित्र थे क्योंकि उगते सूर्य को नमस्कार करने और अर्घ्य देने की एक परंपरा है।
प्रश्न 2.
स्थानीय युवतियाँ क्या कर रही थीं और क्यों?
उत्तर:
स्थानीय युवतियाँ अपनी टोकरी में शंख और मालाएँ रखकर बेच रही थीं। यही उनका मुख्य कार्य था। वे मालाओं को बेचकर मोल तोल कर रही थीं। साथ ही वे बाइनाक्यूलर्ज से उगते सूर्य के दर्शन भी करा रही थीं। वे दोनों कार्य बखूबी कर रही थीं।
प्रश्न 3.
कन्याकुमारी के मंदिर पर कैसा दृश्य था?
उत्तर:
कन्याकुमारी के मंदिर पर बड़ा भक्तिमय दृश्य था। मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थीं। भक्तों की एक मंडली अंदर जाने से पहले मंदिर की दीवार के पास रुककर उसे प्रणाम कर रही थी। सभी लोग श्रद्धापूर्वक मंदिर में दर्शन हेतु जा रहे थे।
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Class 9 Hindi Chapter 5 Extra Question Answer for Practice
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
सूर्यास्त देखने के लिए उन्होंने विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना था। हवा समुद्र की तरह उस रेशम में भी लहरें पैदा कर रही थी। कुछ युवतियाँ वहाँ आकर थकी-सी एक तरफ बैठ गईं- उस पूरे कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह। उनसे कुछ दूर पर एक रंगहीन बिंदु, मैं, ज्यादा देर अपनी जगह स्थिर नहीं रह सका। सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के विस्तार को ओट में लिए था। सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके, इसके लिए मैं कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे उस टीले की तरफ चल दिया। पर रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर लगता कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पच्छिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नज़र आएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया वहाँ से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो । सूर्य तब पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया-1 – ऐसे जेसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और मैंने, सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो। (पृष्ठ 86)
लघूत्तरात्मक प्रश्न:
प्रश्न 1.
लेखक की टाँगें क्यों थक रही थीं?
प्रश्न 2.
लेखक को क्षितिज का खुला विस्तार कब नज़र आया?
बहुविकल्पी प्रश्नः
प्रश्न 3.
लेखक को दाई तरफ दूर-दूर तक क्या नज़र आया?
(क) रेत ही रेत
(ख) समुद्र का पानी
(ग) नारियल के पेड़ों का झुरमुट
(घ) ऊँचे-ऊँचे टीले
प्रश्न 4.
हवा किसमें लहरें पैदा कर रही थीं
(क) रेशम के कपड़ों में
(ख) रेत में
(ग) नारियल के पेड़ों में
(घ) समुद्र की लहरों में
प्रश्न 5.
लेखक को टीला कैसा लगा?
(क) थोड़ा-सा छोटा
(ख) संसार की सबसे ऊँची चोटी की तरह
(ग) रूखा और वीरान
(घ) फिसलन भरा
बहुविकल्पी प्रश्न
प्रश्न 1.
सूर्य का गोला कहाँ छू गया था?
(क) लहरों पर
(ख) टीले पर
(ग) पानी के सतह से
(घ) समुद्र तट से
प्रश्न 2.
दूर रेत पर किसके चिह्न थे?
(क) लोगों के
(ख) केवल लेखक के
(ग) मल्लाह के
(घ) नवयुवकों के
प्रश्न 3.
ऊँची चट्टान से लेखक तट पर कैसे पहुँचा?
(क) छलाँग लगा कर
(ख) धीरे-धीरे चलकर
(ग) तेजी से भाग कर
(घ) रेत पर बैठकर नीचे फिसल कर
प्रश्न 4.
सूर्यास्त के समय लाल रंग के बाद कौन-सा रंग वातावरण में फैला?
(क) नारंगी
(ख) पीला
(ग) सुनहरा
(घ) बैजनी
प्रश्न 5.
लेखक के सामने ग्रेजुएट युवक ने किस का गूदा खाया?
(क) खरबूजे का
(ख) बेल का
(ग) सीप का
(घ) नारियल का
अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
लेखक ने रेत को हाथ में लेकर क्या किया?
प्रश्न 2.
समुद्र तट पर लेखक को खतरे का एहसास कब हुआ?
प्रश्न 3.
खतरा बढ़ते ही लेखक ने क्या किया?
प्रश्न 4.
चट्टान से लेखक को खरोंच क्यों आई?
प्रश्न 5.
भक्तों की मंडली मंदिर में जाने से पहले क्या कर रही थीं।
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लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
चट्टान पर सुरक्षित पहुँचने के बाद उसने दूसरी तरफ क्या नज़ारा देखा?
प्रश्न 2.
अनेक रंगों की रेत देखकर लेखक के मन में क्या विचार आया?
प्रश्न 3.
नाव से वापस लौटते समय लेखक क्या कर रहा था?
दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
‘सैंड हिल’ पर पहुँचकर लेखक ने क्या सोचा?
प्रश्न 2.
सूर्यास्त के बाद बढ़ते अँधेरे से पहले तो लेखक घबराया परंतु बाद में क्या देखकर अँधेरे की बात भूल गया?
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