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Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Question Answer
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Class 9 Question Answer
Class 9 Ganga Chapter 9 Question Answer – Class 9 Hindi राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Kavita Question Answer
अभ्यास (पृष्ठ 156-164)
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
प्रश्न 1.
“ पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?
(क) आदर और सम्मान
ख) भक्ति और श्रद्धा
(ग) भय और शिष्टाचार
(घ) प्रेम और सहिष्णुता
उत्तर:
(ग) भय और शिष्टाचार
क्यों : सभी लोग परशुराम से भयभीत थे। कोई भी उनके प्रति आदर, भक्ति या प्रेम नहीं रखता था । सभी ने भय और शिष्टाचार के नाते अपना-अपना परिचय दिया।
प्रश्न 2.
“जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
(क) संवेदनशीलता
(ख) शिष्टता
(ग) सहनशीलता
(घ) उदासीनता
उत्तर:
(ख) शिष्टता
क्यों : अपने घर आए अतिथि का सम्मान करना, उन्हें प्रणाम करना, अपने बच्चों से प्रणाम करवाना शिष्टता का पहला संस्कार है।
प्रश्न 3.
“अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था-
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
(ग) शिव धनुष का खंडित होना
(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
उत्तर:
(ग) शिव धनुष का खंडित होना
क्यों : यों तो (क) और (ख) दोनों भी ठीक कारण हैं; किंतु सबसे बड़ा कारण है अपने गुरु भगवान शिव के धनुष के प्रति मोह | वे जीते-जी यह नहीं देख सकते थे कि कोई उनके होते शिव धनुष को तोड़ दे। इसमें वे अपना अपमान मानते थे।
प्रश्न 4.
राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) कूटनीति और चतुराई
(ख) विनम्रता और मर्यादा
(ग) त्याग और समर्पण
(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
उत्तर:
(ख) विनम्रता और मर्यादा
क्यों : श्रीराम स्वभाव से चतुर नहीं थे। वे ज्ञानियों के प्रति मन से बहुत विनम्र थे और मर्यादा उनके स्वभाव में थी।
प्रश्न 5.
“सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।” लक्ष्मण के मुस्कराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
उत्तर:
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
क्यों : सही उत्तर इन चारों में कोई नहीं है। हाँ, इन चारों में से यही सर्वोत्तम है। न उनमें प्रदर्शन की भावना थी, न अंहकार। वे परशुराम की शक्ति से डरने वाले भी नहीं थे। अतः यही अंतिम उत्तर सही है कि वे किसी बड़बोले घमंडी का घमंड तोड़ना चाहते थे।
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मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
प्रश्न 1.
“अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
राम के धनुष तोड़ने पर सीता बहुत प्रसन्न थीं, किंतु परशुराम के धनुष तोड़ने वाले को मार डालने की प्रतिज्ञा की। वे परशुराम का महाक्रोधी और हठी स्वभाव जानती थीं। इसलिए वे बहुत अधीर और बेचैन हो उठीं। उनका एक-एक पल हजारों वर्षों के समान बीतने लगा।
प्रश्न 2.
“सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज- समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
महाक्रोधी परशुराम ने राजाओं से भरी सभा में यह कहा या तो धनुष तोड़ने वाले को मेरे हवाले कर दो, वरना मैं सभी राजाओं को मार डालूँगा। सभी राजा परशुराम के महाक्रोधी और हठी स्वभाव को जानते थे। इसलिए सभी राजा भयभीत हो गए होंगे। उन्हें पहले अपनी सुरक्षा ने सताया होगा। कुछ कुटिल राजा, जो धनुष नहीं तोड़ सके, इसलिए लज्जित थे, वे बहुत खुश हुए होंगे। वे मन-ही-मन कह रहे होंगे कि बच्चू! अब करलो सीता से शादी! अब यह परशुराम तुम्हें मजा चखाएगा।
प्रश्न 3.
तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
(ग) किसी भी परिस्थिति से निपटने के दो मार्ग हैं- चुनौती या विनम्रता। पहला मार्ग है- विनम्रता। यदि नरमी से बात करके काम चल जाए और घमंडी व्यक्ति लज्जित हो जाए तो सर्वोत्तम। यदि वह फिर भी नहीं मानता, . तो लक्ष्मण जैसा तेवर दिखाना उचित है, परंतु घमंडी आदमी को घमंड भरा उत्तर देने से बेकार की लड़ाई-झगड़ा बढ़ता है। उससे यथासंभव बचना चाहिए।
प्रश्न 4.
‘हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु ।’ श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
उत्तर:
प्रायः लोग शुभ समाचार पर खुश होते हैं और अशुभ होने पर रोते हैं। वे भावनाओं में जीते हैं। वे भावनाओं से प्रभावित हुए बिना शांत होकर नहीं जी सकते। श्रीराम सुख-दुख से ऊपर हैं। वे परिस्थिति से प्रभावित हुए बिना शांत होकर रास्ता निकालते हैं। यह रास्ता सबसे कठिन है। इसके लिए संतुलन चाहिए। यह संतुलन श्रीराम को अन्य पात्रों से अलग तथा विशेष बनाता है।
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर दीजिए-
प्रश्न 1.
कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
(क) मैं फलाँ देश का राजा हूँ। मैं भी दशरथ के दरबार में सीता की चाह में आया था, परंतु सफल नहीं हो सका। राम वास्तव में सीता के योग्य थे। उन्होंने जिस तरह धनुष को तोड़ डाला, वह मेरे लिए अनुकरणीय था। मैं उनसे प्रभावित हुआ।
तभी अचानक महाक्रोधी परशुराम जी जनक के दरबार में पधारे। आते ही ‘अंगारे’ उगलने लगे। उनके कंधों पर भयानक फरसा था। वे क्रोध में काँप रहे थे। उन्हें आता देखकर सभी राजा भयभीत हो उठे। वे जानते थे कि परशुराम सारी पृथ्वी के सभी राजाओं का संहार कर चुके हैं। सभी राजा भय के मारे काँप उठे। उन्होंने अपने पिता का तथा अपना नाम बताया और परशुराम के चरणों में प्रणाम किया।
राजा जनक ने भी उनके सामने शीश झुकाया। उन्होंने अपनी बेटी सीता को बुलाकर उससे भी प्रणाम करवाया। परशुराम ने सीता को आशीर्वाद दिया, जिससे वे और उनकी सखियाँ प्रसन्न हो गईं। सखियाँ उन्हें अपनी मंडली में ले गईं। इसके बाद विश्वामित्र उनसे मिले। उन्होंने राम और लक्ष्मण को भी परशुराम को प्रणाम करने के लिए कहा। परशुराम ने जाना कि ये दोनों सुंदर युवकों की जोड़ी राजा दशरथ की संतानें हैं। वे राम की सुंदरता को देखते ही रह गए।
उसके बाद परशुराम अपने मूल स्वभाव पर आए। उन्होंने राजा जनक से ललकार भरी वाणी में पूछा- ये सब राजा यहाँ क्यों एकत्र हैं? फिर धरती पर पड़े खंडित शिव धनुष को देखा तो क्रोध से काँपने लगे। राजा जनक ने शांत स्वर में उन्हें सीता स्वयंवर की बात बताई। वे क्रोध में बोले- जिस भी राजा ने शिव का धनुष तोड़ा है, वह इस राजसभा से उठकर अलग हो जाए। वरना हे राजा जनक! जहाँ तक तेरा राज है, उस सारी पृथ्वी को उलट-पलट डालूँगा। यह सुनकर सारे राजा काँपने लगे। कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन खुश हुए। सोचने लगे- चलो अच्छा हुआ, हम धनुष नहीं तोड़ सके। अब यह प्रचंड बाबा परशुराम राम-लक्ष्मण को मजे चखाएगा। होने दो झगड़ा। परशुराम का यह तेवर देखकर सीता की माता के मुँह से निकला हे भगवान! यह आफत बैठे-बिठाए कहाँ से आ गई? यह तुमने बनता हुआ खेल क्यों बिगाड़ दिया? सीता परशुराम के क्रोध को देखकर बेचैन हो उठी। उसे एक एक पल भारी लगने लगा।
तब श्रीराम ने सब राजाओं के भय और अपनी प्रिया की बेचैनी को देखकर शांत स्वर में परशुराम से कहा- हे ब्राह्मणदेव ! शिवधनुष तोड़ने वाला आपका ही एक सेवक है। क्रोध से काँपते हुए परशुराम ने कहा- सेवक वह होता है, जो सेवा करता है। जो शत्रुओं जैसा काम करता है, वह लड़ाई चाहता है। और तुम मुझे जानते हो? जिसने भी शिव- धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। उसे इस सभा में से अलग कर दो, वरना यहाँ बैठे सभी राजाओं को मार डालूँगा।
मुनि परशुराम के बड़बोले वचन सुनकर लक्ष्मण मुस्कराने लगे। वे बोले हे मुनिवर! ऐसे-ऐसे धनुष तो हमने बचपन में कई तोड़ डाले। कभी किसी ने उस पर क्रोध नहीं किया। परशुराम! इस धनुष पर अपनी इतनी ममता किसलिए है?
यह सुनकर परशुराम क्रोधित हो उठे। बोले- ओ राजकुमार लक्ष्मण ! लगता है तू काल के वश में आ गया है। तभी तुझसे सँभलकर बोला नहीं जा रहा। जो शिव धनुष सारे संसार में प्रसिद्ध है, उसे तुम तुच्छ-सा धनुष बता रहे हो!
प्रश्न 2.
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?
(संकेत – सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
उत्तर:
मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपनी उन्नति पर और अन्य लोगों की दुर्गति पर बहुत खुश होता है। परशुराम के क्रोध को देखकर जब राजा जनक डर से कुछ भी नहीं बोले तो कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन खुश हुए। उन्हें लगा कि अब राजा जनक, उनकी बेटी सीता और राम का अपमान होगा। हमारा क्या ! हमें मजा आएगा। हम मजे से उनकी दुर्गति देखेंगे।
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विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के ‘बालकांड’ का एक अंश है जहाँ शिव धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। दोनों के बीच के ये संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है, संवाद ही चरित्र का निर्माण करते हैं और संवादों से ही भावों में विविधता भी आती है। इस प्रकार यह कविता काव्यात्मक विधा में संवाद प्रस्तुति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।
संवादों की विशेषता

उत्तर:
राम की विनम्रता-
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही।
परशुराम का रौद्र रूप-
अति रिस बोले बचन कठोरा। बहु जड़ जनक धनुष के तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तब राजू।।
लक्ष्मण का प्रत्युत्तर-
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहु न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू।
पौराणिक संदर्भ-
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा। नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
नाटकीयता-
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि क रअ लराई।
भाव-पहचान एवं विश्लेषण
• आपने पढ़ा कि राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। नीचे दिए गए भावों/मन:स्थिति को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है? आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।

उत्तर:
| भाव / मन:स्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
| चिंता | बिधि अब सँवरी बात बिगारी | सीता की माता सुनयना | पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित |
| क्रोध | बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।। | परशुराम | अपने गुरु शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर क्रुद्ध |
| व्यग्रता | अरध निमेष कलप सम बीता।। | सीता | परशुराम के क्रोध से व्यग्र हुईं। |
| भय | पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड – प्रनामा।। | सभी भयभीत राजा | परशुराम की लाल-लाल आँखें और भयानक वेषभूषा तथा उनका भयंकर इतिहास |
| संयम / विनम्रता | नाथु संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा। | राम | कुद्ध परशुराम के क्रोध को शांत करने का प्रयास। |
| ईर्ष्या / कुटिलता | कुटिल भूप हरषे मन माहीं। | कुटिल पराजित राजा | परशुराम द्वारा धनुष-भंग करने वाले को दंड देने की घोषणा |
(• “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।”)
परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।
विश्लेषण कैसे करें
1. संदर्भ स्पष्ट कीजिए’ आरंभ में यह बताइए कि यह पंक्ति / घटना किस स्थिति में आई है, उससे पहले क्या घट चुका था।
2. विश्लेषण में घटना का वर्णन क्रम, उसका कारण और प्रभाव अधिक लिखना होता है- केवल क्या हुआ नहीं, बल्कि क्यों हुआ लिखिए।
3. कारण → भाव → परिणाम का क्रम बनाइए।
4. निष्कर्ष दीजिए अंत में 1-2 पंक्तियों में ‘अपना’ स्पष्ट निष्कर्ष लिखिए जैसे- ‘इससे स्पष्ट होता है कि…’ या ‘यह पंक्ति संकेत देती है कि….’
5. संक्षेप में क्या, क्यों, कैसे के आधार पर विश्लेषण कीजिए और निष्कर्ष लिखिए।
उत्तर:
संदर्भ – परशुराम अपने गुरु शिव के धनुष को टूटा हुआ देखकर क्रोध में आ गए। राजा जनक ने जब सीता स्वयंवर की कहानी बताई तो उन्होंने प्रचंड क्रोध में कहा- जिसने भी यह धनुष तोड़ा है, उसे मेरे हवाले करो। वरना मैं तुम्हारे पूरे राज्य को उलट-पलट दूँगा । राजा जनक ने तो स्वयं यह कार्य करवाया था। इसीलिए वे कोई उत्तर न दे सके। वे मुनि के क्रोध से डर भी गए।
राजा जनक के पास तीन रास्ते थे- चुप रहे, विनयपूर्वक क्षमा माँगें या अपनी सफाई में कुछ कहें। तीसरा रास्ता खतरनाक था। क्रोधी परशुराम कुछ सुनने को तैयार नहीं थे। विनयपूर्वक क्षमा माँगना कमज़ोरी का सूचक माना जाता। इससे राम और सीता के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता। अतः समझदारी दिखाते हुए वे चुप रहे। मेरे विचार से राजा जनक का ऐसे समय में मौन रहना ही सबसे उपयुक्त था।
काव्य पंक्ति और भाव
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।”
(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर:
(क) प्रचंड क्रोध का भाव होता। चेहरा तमतमाया हुआ होता।
(ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे-
• परशुराम
• राजा जनक
• लक्ष्मण
• राम
• सभा में उपस्थित अन्य राजा
उत्तर:
(ख) परशुराम – प्रचंड क्रोध द्वारा।
राजा जनक – समझदारी और शांति द्वारा।
लक्ष्मण – उग्र चुनौती और ललकार द्वारा।
राम – बहुत विवेक और शांति द्वारा।
सभा में उपस्थित अन्य राजा-
उपहास और परिहास (हँसी ठिठोली) द्वारा।
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विषयों से संवाद
प्रश्न 1.
सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदार चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
उत्तर:
जब मैं किसी संस्था, संगठन या समूह का मुखिया होता हूँ तो मुझे सबको सँभालना करना होता है। तब मैं धैर्य, संयम, शांति, समझदारी और उदारता विनम्रता से काम लेता हूँ। भूलकर भी क्रोध में नहीं आता। क्रोध से तू-तू, मैं-मैं और नोचानोची बढ़ती है।
प्रश्न 2.
कविता में वर्णित प्रसंग सीता स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक ऐतिहासिक आदि घटना/ प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
उत्तर:
रामायण- महाभारत के काल में भी राजसी घरानों में स्वयंवर – प्रथा प्रचलित थी । द्रौपदी और अर्जुन का विवाह इसी प्रथा के चलते हुआ था। संसार के सभी क्षत्रिय योद्धा द्रोणाचार्य के राज्य में एकत्र हुए थे। शर्त थी कि जो भी धनुर्धर जल में परछाई देखकर ऊपर घूमती मछली को भेदेगा, वही द्रौपदी का वर होगा।
पांडुपुत्र धनुर्धर अर्जुन ने नीचे जल में परछाई देखकर ऊपर घूमती मछली का बेधन किया था। इसी विजय से द्रौपदी और अर्जुन का विवाह हुआ था।
सृजन
प्रश्न 1.
परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मन:स्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
उत्तर:
सीता – हाय! यह क्या हो गया?
माँ – इस ब्राह्मण देवता ने भी अभी आना था?
सीता – न जाने, अब क्या होगा?
माँ – सब विधि का खेल है। जाने भगवान ने यह
बना – बनाया खेल क्यों बिगाड़ दिया ! मुझे तो ऐसे सुंदर सजीले दामाद मिले हैं।
सीता – हाय! अब क्या होगा? मेरे राम मुझसे छिन तो नहीं जाएँगे।
माँ – बेटी सीते! तू धीरज रख ! तेरे पिता बहुत सयाने हैं।
सीता – माँ ! मुझे तो अपने राम पर भरोसा है। जब भगवान ने उन्हें मेरे लिए बनाया है तो रास्ता भी वही निकालेंगे।
प्रश्न 2.
सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए।
(संकेत – लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)
उत्तर:
सीता – हे भगवान! हे मेरे राम!
पहले ही दिन आप मेरी कैसी परीक्षा ले रहे हैं। मैं खुश हूँ कि आप जैसा पति मिला, परंतु विवाह होते ही संकट ! न जाने मेरे भाग्य में क्या लिखा है ! क्या मैं कभी चैन से नहीं जी पाऊँगी।
ये परशुराम जी! फरसा उठाए न जाने कहाँ से टपक पड़े। न तो उन्हें ठीक से बात का पता है, न कुछ। बस यूँ ही आग हो रहे हैं। अरे, उनका स्वभाव ही महाक्रोधी है। को सचमुच पागल है।
और मेरे देवर! ये दिखने में तो बहुत कोमल, सुंदर और मनभावन हैं। पर हैं आग के गोले । उन्होंने परशुराम जी को ठीक जवाब दिया, पर कैसे बात बनेगी? न देवर जी चुप होंगे, न परशुराम जी!
हाय मेरी माँ! उनकी तो जान निकल गई होगी। और पिता जनक! उनके दिल पर क्या बीत रही होगी। क्या बताऊँ ! लगता है, मैं उनके संकट का कारण हूँ।
हे राम! अब तो आप पर ही भरोसा है। कुछ कीजिए। मैं आपके ही भरोसे हूँ।
प्रश्न 3.
कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्त्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
उत्तर:
मैं सोमेश भारत की राजधानी दिल्ली का रहने वाला हूँ। अभी कक्षा नवीं का छात्र हूँ। मैंने कक्षा आठ में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। गणित ओलंपियाड में प्रथम चुना गया था। मैं बैडमिंटन का पूरी दिल्ली का चैंपियन हूँ। मैं गा भी सकता हूँ और नाच भी सकता हूँ। आपने मुझे ‘नच बलिए नच!’ में देखा होगा।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए-
• “देखत भृगुपति बेषु कराला।”
• “बोले परसुधरहि अपमाने।।”
• “सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू”
यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है; जैसे- भृगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू। आप इस कविता में अनेक विशेषताएँ देख सकते हैं, जैसे- दोहा – चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उसका कथन कह देना, मुहावरों का उपयोग करना आदि । नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।
| विशेषता | अर्थ | उदाहरण |
| अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | अरि करनी करि करिअलराई |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | अरध निमेष कलप सम बीता |
| रूपक अलंकार | रूप का आरोपण करना | पद सरोज मेले दोउ भाई |
उत्तर:
अनुप्रास
1. अपार मार मद मोचन
2. बहुरि बिलोकि बिदेह
3. नाग नगर नर नारी
4. आयसु काह कहिअ किन
5. सहसबाहु सम सो, सकल संसार।
अतिशयोक्ति – उलटऊँ महि जहँ लहि तव राजू।
रूपक अलंकार – पाठ्य काव्यांश में रूपक अलंकार का अन्य कोई उदाहरण नहीं है।
जो लोग ‘भृगुकुलकेतू’ को रूपक अलंकार का उदाहरण मानते हैं, वे जान लें कि इसमें उपमेय पर उपमान का आरोप नहीं है। यह केवल बहुव्रीहि समास का उदाहरण है।
बहुभाषिकता
यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है जो कि हिंदी भाषा का ही एक स्वरूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।
उदाहरण-

उत्तर:
कोही – क्रोधी – गुस्सैल
वेषु – वेष – भेस
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लोक में भाषा
नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उसका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है-

उत्तर:
मन – मन चंगा ते कटौती में गंगा – यदि मन पवित्र हो तो गंगा स्नान का सुख उसी से मिल जाता है।
राम – मुँह में राम बगल में छुरी
अर्थ – दिखावा सज्जनता का अंदर से पापी।
वाक्य – उसकी मीठी-मीठी बातों में न आना। उसका तो वही हाल है-
मुँह में राम बगल में छुरी
राजा – कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली
अर्थ – दो असमान व्यक्तियों की तुलना।
वाक्य – प्रधानमंत्री मोदी और पकौड़े वाले दोनों की तुलना कहाँ कर रहे हो ? कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली।
बात – लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
अर्थ – दुष्ट लोग पिट कर ही मानते हैं।
वाक्य – यह दुष्ट समझाने से नहीं समझेगा। समझ लो, लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
सिरु (सिर) – छछूंदर के सिर में चमेली का तेल (अयोग्य व्यक्ति को मूल्यवान वस्तु मिल जाना)।
वाक्य – उस अँगूठा छाप को सुशिक्षित कन्या मिल गई। वाह ! छछूंदर के सिर में चमेली का तेल।
गद्य-रूप
नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए-
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।”
इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं। इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं- हे नाथ! शिव- धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या
आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।
अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए-
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।”
उत्तर:
बहुत भय के कारण राजा जनक उत्तर नहीं दे पा रहे थे। यह देखकर कुटिल राजा मन ही मन खुश होने लगे। वहाँ उपस्थित देवता, मुनि, नोगवंश के लोग, नगर के नर-नारी- सब के दिलों पर भयानक भय छा गया। वे सोच में पड़ गए।
गतिविधियाँ
प्रश्न 1.
यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही (✓) का चिह्न लगाइए-


उत्तर:
क. राम
ख. सीता की माता
ग. परशुराम
घ. जनक
ङ. लक्ष्मण
च. राम
छ. परशुराम
ज. लक्ष्मण
प्रश्न 2.
रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
अपने अध्यापक के मार्गदर्शन में नाटक खेलें।
प्रश्न 3.
‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
परिचर्चा-
उत्तर:
अध्यापक – क्यों नीलिमा! तुम बताओ, भय की स्थिति में सत्य कहना जरूरी है क्या?
नीलिमा – जी श्रीमान जी! भय को जीतना बहुत जरूरी होता है।
सुदेश – श्रीमन! ये कह तो रही हैं, पर परशुराम के क्रोध के सामने बोल सकेंगी क्या?
नीलिमा – मैं मानती हूँ श्रीमान जी! यह बहुत कठिन होगा।
सुदेश – कठिन ही नहीं, असंभव! जब देश गुलाम था, सारे लोग जैसे-तैसे जी ही रहे थे।
नीलिमा – परंतु भूलो मत! भगतसिंह, सुभाष, सावरकर और गाँधी जैसे कुछ लोगों ने हिम्मत की। वे अंग्रेज़ों के सामने बोलने का साहस कर सके, तभी देश आज़ाद हुआ।
सुदेश – हाँ, यह बात ठीक है। कोई इन जैसा हो तो वह कहने से नहीं चूकता।
नीलिमा – श्रीमन! कोई कैसा है, इसका आकलन परिस्थिति पड़ने पर होता है। कक्षा में बातें करने से नहीं। मैं इतना जानती हूँ कि कठिन समय आने पर भी कुछ लोग हिम्मत रखते हैं, परंतु कुछ लोग कहने की सोच भी नहीं पाते हैं। उनके बारे में मैं क्या कहूँ।
सुदेश – श्रीमन! नीलिमा ठीक कह रही हैं। हिम्मती लोग कम होते हैं, परंतु होते जरूर हैं। हमें अपनी-अपनी हिम्मत टटोलनी चाहिए।
मेरी पहेली
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों-

उत्तर:
पहेलियाँ
समाचार – नई-नई नित बात बताता
कहाँ क्या हुआ, सब बतलाता
रहता नया सदा हर बार।
क्यों सखि साजन? न! समाचार
धनुष – मूँछों जैसी दो छोरों पर बँधी हुई है डोर। तीर खींच कर छोड़ा ऐसे घायल है चितचोर।
मन – उसके होने से जय होती
न होने से हार।
तेरे भीतर छिपा है हरदम
नहीं देता दीदार।
नाग –
लंबी मोटी पूँछ-सा हूँ मैं
किसी से भी भयभीत नहीं मैं
लोग मुझे जहरीला कहते
किसी का भी मनमीत नहीं मैं।
नगर – पक्की सड़कें, पक्के घर हैं
कच्ची कोई नहीं डगर है।
हर सुविधा से युक्त है रहता
बूझो मेरा वास किधर है?
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भाषा संगम
“अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक ‘धनुष’ कै तोरा।।”
नीचे ‘धनुष’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
कमान (हिंदी); धनुः, चापम् (संस्कृत); धणुख (पंजाबी); कमान (क्रौस) (उर्दू); कमान (कश्मीरी ) ; धनुषु, कमानु (सिंधी); धनुष्य (मराठी); धनुष, कामठु (गुजराती); धनुश (कोंकणी); धनु (नेपाली); धनुक (बांग्ला); धनु (असमिया); लिरुर् (मणिपुरी); धनुष, धनु, कार्मुक (ओड़िआ); धनुस्सु, विल्लु (तेलुगु); विल् (तमिल) ; धनुस्सु, विल्लु (मलयालम); बिल्लु, धनुष (कन्नड़)
• इनके अतिरिक्त यदि आप धनुष शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
• उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
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उत्तर:
बहूँ गुस्से नाल कौड़े बोल बोल्या मूरख जनक! तू इस ए धनुष कैं तोड़े ? (सिरायकी)
खोजबीन
बालकांड का यह अंश और गोस्वामी तुलसीदास जी की अन्य रचनाएँ इंटरनेट की सहायता से सुनिए और देखिए-
उत्तर:
तुलसीदास-राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
https://www.youtube.com/ watch?v=M7yZx2C0O68
दोहे- कबीर, रहीम, तुलसी
https://www.youtube.com watch?v=A5v38R3VwaE
गोस्वामी तुलसीदास
https://www.youtube.com/watch?v=MJbKZoLLess
कवि तुलसीदास और उनकी कविता
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