Friday, 5 June 2026

रीढ़ की हड्डी Class 9 Summary in Hindi Ganga Chapter 6

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रीढ़ की हड्डी पाठ का सारांश

रीढ़ की हड्डी Class 9 Hindi Summary

Class 9 Hindi Chapter 6 Summary – रीढ़ की हड्डी Summary Class 9

‘रीढ़ की हड्डी’ व्यंग्य प्रधान एकांकी है। इसमें समाज में लड़कियों की उपेक्षा पर ध्यान आकर्षित किया गया है। एकांकी का सार इस प्रकार है-

रामस्वरूप द्वारा मेहमान के स्वागत की तैयारी – परदा खुलने पर बाबू रामस्वरूप अपने नौकर रतन के साथ मिलकर अतिथि कक्ष को सजा रहे हैं। वे तख्त बिछाकर रतन को दरी तथा चादर लाने का आदेश देते हैं। नौकर बिछाने की चादर की बजाय मालकिन प्रेमा से मालिक की धोती माँगता है। इस पर मालकिन गुस्सा करती हुई वहाँ आती है।

रामस्वरूप और प्रेमा की चिंता-रामस्वरूप प्रेमा को बताते हैं कि उसने बिछाने वाली चादर मँगाई है। प्रेमा रतन को अलमारी से चादर लाने का आदेश देती है। रामस्वरूप कमरे में हारमोनियम भी रखवाते हैं। तभी प्रेमा बताती है कि बेटी उमा तो रूठी हुई है। वह न तो पाउडर लगाने को तैयार है, न शादी के लिए उत्साहित है। है। रामस्वरूप पत्नी को कहते हैं-बेटी को संभालने-समझाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है। पत्नी अपना पल्ला झाड़ती हुई यह काम पति पर डालती है कि उसे इतना पढ़ाना-लिखाना नहीं चाहिए था। वह इंट्रेंस पास कर लेती-इतना ही काफ़ी था।

बाबू रामस्वरूप पत्नी को डाँटते हुए कहते हैं- तुम्हें समझाया था कि हमें उमा की पढ़ाई को छिपाना है। तुम फिर भी इंट्रेंस का नाम मुँह पर ला रही हो। रामस्वरूप आने वाले अतिथि गोपालप्रसाद के बारे में बताते हैं कि वे यूँ तो वकील हैं और सभा – सोसाइटियों में जाते हैं, परंतु बहू अधिक पढ़ी-लिखी नहीं चाहते। कैसे दकियानूसी खयाल हैं इनके। उनका बेटा तो बाप से भी आगे है। वह बी.एस-सी. करने के बाद मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा है। परंतु लड़की वह भी कम पढ़ी-लिखी चाहता है। इतना बताकर रामस्वरूप पत्नी को कहते हैं कि वह बेटी उमा को समझा-बुझाकर ठीक ढंग से नीचे भेजे।

गोपालप्रसाद और शंकर का आगमन – नौकर बताता है कि बाहर कोई अतिथि आए हैं। वे जल्दी से हारमोनियम को ठीक जगह पर रखते हैं और नौकर को मक्खन लाने के लिए भेजते हैं। बाबू गोपालप्रसाद अपने बेटे शंकर के साथ प्रवेश करते हैं। रामस्वरूप नमस्कार करके उनका स्वागत करते हैं तथा उन्हें बिठाते हैं। लड़के शंकर की रीढ़ कुछ झुकी हुई है। कुशल-क्षेम पूछने के बाद रामस्वरूप शंकर से पूछते हैं कि अब उसकी पढ़ाई का आखिरी साल होगा। शंकर बताता है कि नहीं, उसके दो साल और शेष हैं। गोपालप्रसाद बताते हैं कि वास्तव में यह एक साल बीमार हो गया था।

गोपालप्रसाद और रामस्वरूप का हँसी-मजाक – गोपालप्रसाद अपने जमाने की बातें याद करते हुए कहते हैं – वे इस जवान उम्र में स्कूल से आकर दर्जनों कचौड़ियाँ खा जाते थे, फिर भी खाने के समय भूख लगती थी। उस जमाने में आज की तरह खेल की सुविधाएँ नहीं थीं, फिर भी उनकी पाचन शक्ति बहुत थी। फिर वे पढ़ने-लिखने का रोब दिखाते हैं कि वे एक बार पढ़ने बैठते थे तो बारह घंटे पढ़ते रहते थे। उनके जमाने का मैट्रिक पास भी आज के एम. ए. से अच्छी अंग्रेजी लिखता था। रामस्वरूप गोपालप्रसाद की बातों का समर्थन करता है तो शंकर हीं हीं करता रहता है।

अचानक गोपालप्रसाद रामस्वरूप से कहते हैं कि अब सीधे बिजनेस की बात कर ली जाए। रामस्वरूप बिजनेस शब्द सुनकर घबरा जाते हैं। फिर वे पीछे वाले कमरे से चाय और मिठाई – नाश्ते की ट्रे उठाने चले जाते हैं। गोपालप्रसाद शंकर को कहते हैं- मकान-वकान देखकर हैसियत तो ठीक लगती है। देखते हैं लड़की कैसी है? फिर वे शंकर को सीधे बैठने के लिए कहते हैं।

रीढ़ की हड्डी Class 9 Summary in Hindi Ganga Chapter 6

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लड़की की खूबसूरती और पढ़ाई के बारे में विचार – इधर-उधर की गप्पों के चलते लड़की की खूबसूरती की चर्चा होने लगती है। रामस्वरूप कहते हैं कि हमारे जमाने में खूबसूरती का सवाल ही नहीं उठता था। वे शंकर से पूछते हैं- शादी तय करने में खूबसूरती का हिस्सा कितना होना चाहिए?

गोपालप्रसाद बात को काटते हुए कहते हैं- लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। चाहे इसके लिए उसे पाउडर वगैरह लगाना पड़े। क्योंकि घर की औरतें राजी नहीं होतीं। गोपालप्रसाद लड़की की पढ़ाई के बारे में स्पष्ट कहते हैं – हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। कौन भुगतेगा उसके नखरों को। बस हद-से-हद मैट्रिक पास होनी चाहिए। उनका बेटा शंकर भी समर्थन में कहता है- “जी हाँ, कोई नौकरी तो करानी नहीं।” गोपालप्रसाद कहते हैं- लोग कहते हैं, जब लड़कों को बी. ए., एम. ए. पढ़ाया है तो बहुएँ भी ग्रेजुएट लो। परंतु क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक ही बात है। मर्दों का काम है पढ़कर काबिल होना। अगर औरतें भी अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगीं और पॉलिटिक्स पर बहस करने लगीं तो गृहस्थी कैसे चलेगी। वे तर्क देते हैं- जनाब, मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं, शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं। कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं और ऊँची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।

उमा से पूछताछ – नाश्ता समाप्त होने के बाद रामस्वरूप पान मँगवाते हैं। उनकी बेटी उमा पान की तश्तरी लेकर वहाँ आती है। उसके कपड़े सादे हैं, गर्दन झुकी हुई है और आँखों पर चश्मा है। चश्मा देखते ही गोपालप्रसाद और शंकर चौंक पड़ते हैं। रामस्वरूप सफाई पेश करते हैं- पिछले महीने इसकी आँखें दुखनी आ गई थीं, इसलिए कुछ दिनों के लिए चश्मा लगाना पड़ रहा है।

रामस्वरूप के कहने पर उमा हारमोनियम के पास बैठती है। गोपालप्रसाद को उमा की चाल-ढाल और चेहरा पसंद आता है। वे उमा से कुछ गाने को कहते हैं। उमा मीरा का भजन सुनाती हैं-‘मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरा न कोई।’ उसके स्वर में तल्लीनता और मधुरता है। अचानक उमा की आँखें शंकर की झेंपती हुई आँखों से मिल जाती हैं। वह गाते-गाते रुक जाती है।

गोपालप्रसाद उमा से पूछते हैं – क्या उसे पेंटिंग – वेंटिंग आती है। रामस्वरूप कहते हैं-कमरे में टॅगी सारी तस्वीरें उसी की बनाई हुई हैं। फिर सिलाई के बारे में पूछा जाता है। रामस्वरूप कहते हैं घर के सारे कपड़े, यहाँ तक कि उसकी कमीजें भी उमा सीती है। गोपालप्रसाद पूछते हैं-बेटी, कुछ इनाम-विनाम भी जीते हैं? उमा चुप रहती है। रामस्वरूप सफाई देते हैं- यह बेचारी शरमाती है।

उमा की डाँट फटकार – गोपालप्रसाद रूखे स्वर में कहते हैं- जरा इसे भी तो मुँह खोलना चाहिए। उमा दृढ़ स्वर में कहती है-
“क्या जवाब दूँ, बाबू जी ! जब कुर्सी मेज बिकती हैं तो दुकानदार कुर्सी मेज़ से कुछ नहीं पूछता। सिर्फ खरीददार को दिखला देता है। पसंद आ गई तो अच्छा, वरना ….” ये महाशय, जो मेरे खरीददार बनकर आए हैं, इनसे जरा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्या उनको चोट नहीं लगती ? क्या बेबस भेड़-बकरियाँ हैं जिन्हें कसाई अच्छी तरह देखभाल कर गोपालप्रसाद उमा की बातों को अपमानजनक मानते हैं। उमा कहती है-‘ और आप जो इतनी देर से नाप तोलकर रहे हैं। जरा अपने इन साहबजादे से पूछिए कि अभी पिछली फरवरी में ये लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे और वहाँ से कैसे भगाए गए थे। ‘ गोपालप्रसाद पूछते हैं-‘तो क्या तुम पढ़ी-लिखी हो ?’ उमा कहती है- ‘हाँ, मैंने बी.ए. पास किया है, कोई चोरी नहीं की। न ही आपके पुत्र की तरह ताक-झाँक कर कायरता दिखाई है। मुझे अपनी इज्ज़त और मान का खयाल है।

गोपालप्रसाद उमा की पढ़ाई के बारे में सुनकर उखड़ जाते हैं। वे इसे सरासर धोखा कहते हैं। बी. ए. पास! उफ्फोह! गज़ब हो जाता! झूठ का भी कुछ ठिकाना है। वे वापस जाने लगते हैं। उमा आखिरी चोट करती हुई कहती है-: – ज़रूर चले जाइए। लेकिन घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाड़ले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं – यानी बैकबोन बैकबोन। गोपालप्रसाद अपमानित होकर वापस चले जाते हैं। रामस्वरूप धम से सोफे पर बैठ जाते हैं। बेटी की शादी का सपना चूर चूर हो जाता है। (पर्दा गिरता है।)

रीढ़ की हड्डी पाठ का लेखक परिचय

जगदीशचंद्र माथुर – का जन्म सन 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ और उन्होंने अपनी शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की। वे इंडियन सिविल सर्विस (ICS ) में चयनित हुए। वे बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक, सूचना और प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे। जगदीशचंद्र माथुर हिन्दी के प्रसिद्ध नाटककार, लेखक और शिक्षाविद थे। उन्होंने हिंदी रंगमंच और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उनकी रचनाओं में सामाजिक चेतना, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का सुंदर चित्रण मिलता है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- भोर का तारा, ओ मेरे सपने, कोणार्क, पहला राजा और दस तस्वीरें हैं। उनकी भाषा सरल, प्रभावशाली और भावपूर्ण होती है, जिससे पाठक आसानी से जुड़ जाते हैं।
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पाठ का संदेश
जीवन में आत्मसम्मान और स्वाभिमान बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए। गलत बातों और अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहिए, बल्कि साहस से उसका विरोध करना चाहिए। सच्चाई और ईमानदारी पर टिके रहना ही व्यक्ति को मजबूत बनाता है।

रीढ़ की हड्डी Class 9 Summary in Hindi Ganga Chapter 6

रीढ़ की हड्डी पाठ का शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

पृष्ठ 100

चयनित – चुने गए। प्रशासनिक – प्रशासन से संबंधित, सरकारी। साहित्य-सृजन – साहित्य लिखना, कविता-कहानी- नाटक आदि लिखना। सक्रिय – गतिशील। एकांकी – ऐसा नाटक जिसमें एक अंक हो, छोटा नाटक। परंपरागत – परांपरा से चली आ रही। कुरीति – बुरी आदत बुरी परंपरा। उजागर – प्रकट। सशक्त – शक्तिशाली, जोरदार। प्रतिनिधित्व – अगुआ होना, प्रमुख होना।

पृष्ठ 101

मामूली – थोड़ा-सा। महाशय – सज्जन व्यक्ति। अधेड़ – पक्की उम्र 50 साल के करीब। तख्त – लकड़ी के फट्टों से बना आसन। सिरा – किनारा। कसरत – व्यायाम। कलस – घड़ा। मेज़पोश – मेज पर बिछाने का सजावटी कपड़ा। झाड़न – झाड़ने के काम आने वाला कपड़ा। सहसा – अचानक। गंदुमी – गेहुँएँ रंग का। जाहिर – प्रकट। व्यस्त – लगे रहना। भीगी बिल्ली – दबा हुआ-सा।

पृष्ठ 102

डाट – ढक्कन। उल्लू – मूर्ख। हारमोनियम – बाजा। लाडली – प्यारी। मुँह फुलाए – नाराज होकर क्रोध में। मर्ज – रोग। दवा – इलाज। पकड़ में आना – काबू आना। जतन – कोशिश। सिर चढ़ाना – बढ़ावा देना, घमंडी बनाना। जंजाल – झंझट। लच्छन – लक्षण, संकेत।

पृष्ठ 103

ठठोली – मज़ाक। सूझना – मन में आना। राह पर लाना – सीधे रास्ते पर लाना, समझा-बुझा कर मनाना। टीम-टाम – दिखावा, चकाचौंध। पौडर-वौडर – पाउडर आदि सजने की सामग्री। नफ़रत – घृणा। बाज आना – हारना। कारोबार – धंधा। इंट्रेंस – कक्षा ग्यारह। हाथ रहना – नियंत्रण में रहना। कतई – ज़रा भी। जबान पर काबू होना – बोलने पर नियंत्रण होना। ज़िक्र – चर्चा। उगलना – कह देना। मर्जी – इच्छा। वक्त – समय।

पृष्ठ 104

करीने से – ठीक-ठाक सँवर कर। दकियानूसी खयाल – पुराने-पिछड़े विचार। सोसाइटी – लोगों का मिलन-स्थल। सवा सेर – अधिक तेज़। तालीम – शिक्षा। मतलब – स्वार्थ। कोरी-कोरी सुनाना – साफ़-साफ़ कहना। चौपट करना – बेकार कर डालना।

पृष्ठ 105

किवाड़ – दरवाज़ा। दस्तक – खटखट की आवाज। लोक चतुराई – लोक व्यवहार में सयानापन। टपकती – झलकती, दीखती। अनुभवी – जिसने दुनिया का व्यवहार देखा हो। फितरती – शरारती, स्वभावगत। खीस निपोरना – चापलूसी करना, बेकार हीं हीं करना। खिसियाहट – शर्म संकोच। तशरीफ़ लाना – बैठना। तकलीफ – कष्ट। खखारकर – खाँसी की आवाज़ करके। मेहरबानी – कृपा। काँटों में घसीटना – परेशानी में डालना। मुखातिब – मुँह की ओर। वीक-एंड – सप्ताह के अंत में। मार्जिन – अंतर फ़ासला उम्र – आयु अवस्था।

पृष्ठ 106

उड़ाना – खा जाना। जनाब – महोदय। हाल दशा। बालाई – एक खाद्य पदार्थ। हज़म करना – पचा जाना। बहुतेरे – बहुत-से। वगैरह – आदि। मजाल – ताकत, शक्ति। सिटिंग – बैठना। फ़र्राटे – तेज़ गति से धारा प्रवाह। मुकाबिला – होड़। जब्त करना – रोक पाना। रंगीन – आनंदपूर्ण। बिजनेस – व्यापार, काम की बात। तकल्लुफ़ – तकलीफ़ उठाना, शिष्टाचार। तकदीर – किस्मत, भाग्य। काबिल – योग्य। हाज़िर – उपस्थित। हैसियत – शक्ति, औकात।

पृष्ठ 107

बैकबोन – रीढ़ की हड्डी। फैशन – रिवाज़ चलन। जायका- स्वाद। आमदनी – आय।

पृष्ठ 108

चूँ करना – विरोध में बोलना। स्टैंडर्ड – मापदंड, गुणवत्ता। माफ़िक – अनुसार। तय – निश्चित। वाकई – वास्तव में। बेढब होना – बिगड़ जाना। निहायत – बहुत, अत्यधिक। राज़ी – मान जाना, स्वीकार करना। रस्म – रिवाज़। एहसान – कृपा। जायचा – जन्मपत्री। ठाकुर – भगवान। चरण – कदम। भनक पड़ना – चोरी छिपे पता चलना। मेम साहब – पढ़ी लिखी नखरेबाज़ औरत। हद – अधिक।

पृष्ठ 109

ग्रेजुएट – बी.ए., बी.कॉम या बी.एस-सी. तक पढ़ी हुई। अक्ल के ठेकेदार – अपने को बुद्धिमान मानने वाला। मर्द – पुरुष। काबिल – योग्य। पॉलिटिक्स – राजनीति। वगैरह – आदि। बहस – बातचीत, चर्चा। गृहस्थी – घर को चलाना। जनाब – महोदय। तालीम – शिक्षा। तश्तरी – प्लेट। आँखें गड़ाना – लगातार देखना, ध्यान से देखना। ताकना – देखना।

पृष्ठ 110

आँखें दुखना – आँखों का एक रोग। वजह – कारण। अर्ज़ करना – निवेदन करना, बताना। संतुष्ट – तसल्ली पाया हुआ। कोमल – धीमा, मधुर। छवि – सुंदरता। तल्लीनता – डूबना। मस्तक – माथा। झेंपती आँखें – शर्माती आँखें। तसवीर – चित्र, पेंटिंग।

पृष्ठ 111

अधीर होना – बेचैन होना। सकपकाना – घबराना। मुँह खोलना – बोलना। चोट लगना – बुरा लगना। कसाई – पशुओं की हत्या करने वाला, हत्यारा। बेइज्ज़ती- अपमान। नाप-तोल करना – एक-एक चीज़ ठोक बजाकर लेना। साहबजादा – प्रिय पुत्र। इर्द गिर्द – आसपास। ताक-झाँक करना – इधर-उधर देखना। कायरता – डर। मान – सम्मान। खयाल – ध्यान। मुँह छिपाकर भागना – शर्मिंदा होकर भागना।

पृष्ठ 112

दगा करना – धोखा करना। उफ्फोह – ओह! गजब होना – बहुत बुरा होना। ठिकाना होना – सीमा होना। बेबसी – मज़बूरी, विवशता। रुलासापन – रोने का भाव। सहसा – अचानक।

रीढ़ की हड्डी Class 9 Summary in Hindi Ganga Chapter 6

Class 9 Hindi Chapter 6 रीढ़ की हड्डी Summary

पात्र परिचय
उमा – लड़की
रामस्वरूप (बाबू) – लड़की का पिता
प्रेमा – लड़की की माँ
शंकर – लड़का
गोपालप्रसाद – लड़के का पिता
रतन – रामस्वरूप का घरेलू सहायक

(मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। अंदर के दरवाजे से आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आ रही है, वह अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं। एक तख्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं। तख्त का दूसरा सिरा रतन ने पकड़ रखा है।)

बाबू : अरे धीरे-धीरे चल।… अब तख्त को उधर मोड़ दे… उधर।… बस, बस। (तख्त के रखे जाने की आवाज़ आती है।)
रतन : बिछा दें, साहब?
बाबू : (ज़रा तेज आवाज़ में) और क्या करेगा? परमात्मा के यहाँ अक्ल बँट रही थी तो तू देर से पहुँचा था क्या?… बिछा दूँ साब !.. और यह पसीना किसलिए बहाया है?
रतन : (तख्त बिछाता है।) ही-ही-ही।
बाबू : हँसता क्यों है?… अरे, हमने भी जवानी में कसरतें की हैं। कलसों से नहाता था लोटों की तरह। यह तख्त क्या चीज है?… उसे सीधा कर … यों… हाँ, बस और सुन, बहू जी से दरी माँग ला, इसके ऊपर बिछाने के लिए … चद्दर भी, कल जो कपड़े धोने वाले के यहाँ से आई है, वही।

(रतन जाता है। बाबू साहब इस बीच में मेजपोश ठीक करते हैं। एक झाड़न से गुलदस्ते को साफ करते हैं। कुर्सियों पर भी दो चार हाथ लगाते हैं। सहसा घर की मालकिन प्रेमा का आना। गंदुमी रंग, छोटा कद । चेहरे और आवाज़ से जाहिर होता है किसी काम में बहुत व्यस्त हैं। उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह रतन आ रहा है— खाली हाथ। बाबू साहब (रामस्वरूप) दोनों की तरफ देखने लगते हैं।)

प्रेमा : मैं कहती हूँ तुम्हें इस वक्त धोती की क्या जरूरत पड़ गई! एक तो वैसे ही जल्दी-जल्दी में….
रामस्वरूप : धोती?
प्रेमा : हाँ, अभी तो बदलकर आए हो, और फिर न जाने किसलिए….
रामस्वरूप : लेकिन तुमसे धोती माँगी किसने?
प्रेमा : यही तो कह रहा था रतन।
रामस्वरूप : क्यों रतन, तेरे कानों में डाट लगी है क्या? मैंने कहा था- कपड़े धुलने वाले के यहाँ से जो चद्दर आई है, उसे माँग ला… अब तेरे लिए दूसरा दिमाग कहाँ से लाऊँ। उल्लू कहीं का।
प्रेमा : अच्छा, जा, पूजावाली कोठरी में लकड़ी के बक्स के ऊपर धुले हुए कपड़े रखे हुए हैं न, उन्हीं में से एक चद्दर उठा ला।
रतन : और दरी?
प्रेमा : दरी यहीं तो रखी है, कोने में। यह पड़ी तो है।
रामस्वरूप : (दरी उठाते हुए) और बीबी जी के कमरे में से हारमोनियम उठा ला और सितार भी!… जल्दी जा! (रतन जाता है। पति-पत्नी तख्त पर दरी बिछाते हैं।)
प्रेमा : लेकिन वह तुम्हारी लाडली बेटी तो मुँह फुलाए पड़ी है।
रामस्वरूप : मुँह फुलाए?… और तुम उसकी माँ, किस मर्ज की दवा हो? जैसे-तैसे करके तो वे लोग पकड़ में आए हैं। अब तुम्हारी बेवकूफी से सारी मेहनत बेकार जाए तो मुझे दोष मत देना।
प्रेमा : तो मैं ही क्या करूँ? सारे जतन करके तो हार गई। तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है। मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं। अपनाजमानाअच्छाथा। ‘आ-ई’ पढ़ली, गिनती सीख ली और बहुत हुआ तो ‘स्त्री-सुबोधिनी’ पढ़ ली। सच पूछो तो ‘स्त्री-सुबोधिनी’ में ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं- ऐसी बातें कि क्या तुम्हारी बी. ए., एम.ए. की पढ़ाई में होंगी। और आजकल के तो लच्छन ही अनोखे हैं।
रामस्वरूप : ग्रामोफोन बाजा होता है न?
प्रेमा : क्यों?
रामस्वरूप : दो तरह का होता है। एक तो आदमी का बनाया हुआ। उसे एक बार चलाकर जब चाहे रोक लो। और दूसरा परमात्मा का बनाया हुआ। उसका रिकार्ड एक बार चढ़ा तो रुकने का नाम नहीं।
प्रेमा : हटो भी! तुम्हें ठठोली ही सूझती रहती है। यह तो होता नहीं कि उस अपनी उमा को राह पर लाते। अब देर ही कितनी रही है उन लोगों के आने में।
रामस्वरूप : तो हुआ क्या?
प्रेमा : तुम्हीं ने तो कहा था कि ज़रा ठीक-ठाक करके नीचे लाना। आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है? इसी मारे मैंने तो पौडर-वौडर उसके सामने रखा था। पर उसे तो इन चीजों से न जाने किस जनम की नफरत है। मेरा कहना था कि आँचल में मुँह लपेटकर गई। भई, मैं तो बाज आई तुम्हारी इस लड़की से।
रामस्वरूप : न जाने कैसा इसका दिमाग है। वरना, आजकल की लड़कियों के सहारे तो पौडर का कारोबार चलता है।
प्रेमा : अरे, मैंने तो पहले ही कहा था। इंट्रेंस ही पास करा लेते – लड़की अपने हाथ रहती, और इतनी परेशानी न उठानी पड़ती। पर तुम तो ….
रामस्वरूप : (बात काटकर) चुप, चुप!… (दरवाजे में झाँकते हुए) तुम्हें कतई अपनी जबान पर काबू नहीं है। कल ही यह बात बता दी थी कि उन सब लोगों के सामने जिक्र और ढंग से होगा। मगर तुम तो अभी से सब-कुछ उगले देती हो। उनके आने तक तो न जाने क्या हाल करोगी।
प्रेमा : अच्छा बाबा, मैंन बोलूँगी। जैसी तुम्हारी मर्जी हो, करना। बस मुझे तो मेरा काम बता दो।
रामस्वरूप : अच्छा तो उमा को जैसे हो तैयार कर लो! न सही पौडर। वैसे कौन बुरी है। पान लेकर भेज देना उसे। और, नाश्ता तो तैयार है न? (रतन का आना) आ गया रतन?… इधर ला, इधर। बाजा नीचे रख दे। चद्दर खोला … पकड़ तो ज़रा उधर से। (चद्दर बिछाते हैं।)
प्रेमा : नाश्ता तो तैयार है। मिठाई तो वे लोग ज्यादा खाएँगे नहीं। कुछ नमकीन चीजें बना दी हैं। फल रखे ही हैं। चाय तैयार है, और टोस्ट भी। मगर हाँ, मक्खन? मक्खन तो आया ही नहीं।
रामस्वरूप : क्या कहा? मक्खन नहीं आया? तुम्हें भी किस वक्त याद आई है। जानती हो कि मक्खन वाले की दुकान दूर है, पर तुम्हें तो ठीक वक्त पर कोई सूझती ही नहीं। अब बताओ, रतन मक्खन लाए कि यहाँ का काम करे। दफ्तर के चपरासी से कहा था आने के लिए, सो नखरों के मारे…..
प्रेमा : यहाँ का काम कौन ज्यादा है? कमरा तो सब ठीक-ठाक है ही। बाजा – सितार आ ही गया। नाश्ता यहाँ बराबर वाले कमरे में ‘ट्रे’ में रखा हुआ है सो तुम्हें पकड़ा दूँगी। एकाध चीज खुद ले आना। इतनी देर में रतन मक्खन ले ही आएगा।… दो आदमी ही तो हैं!
रामस्वरूप : हाँ एक तो बाबू गोपालप्रसाद और दूसरा खुद लड़का है। देखो, उमा से कह देना कि ज़रा करीने से आए। ये लोग ज़रा ऐसे ही हैं, गुस्सा तो मुझे बहुत आता है इनके दकियानूसी खयालों पर। खुद पढ़े-लिखे हैं, वकील हैं, सभा-सोसाइटियों में जाते हैं, मगर लड़की चाहते हैं ऐसी कि ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो।
प्रेमा : और लड़का?
रामस्वरूप बताया तो था तुम्हें। बाप सेर है तो लड़का सवा सेर। बी.एससी. के बाद लखनऊ में ही तो पढ़ता है मेडिकल कॉलेज में। कहता है कि शादी का सवाल दूसरा है, तालीम का दूसरा। क्या करूँ, मजबूरी है। मतलब अपना है, वरना इन लड़कों और इनके बापों को ऐसी कोरी कोरी सुनाता कि ये भी ….
रतन : (जो अब तक दरवाजे के पास चुपचाप खड़ा हुआ था, जल्दी-जल्दी) बाबू जी, बाबू जी!
रामस्वरूप : क्या है?
रतन : कोई आते हैं।
रामस्वरूप : (दरवाजे से बाहर झाँककर जल्दी मुँह अंदर करते हुए) अरे, ऐ प्रेमा, वे आ भी गए। (रतन पर नजर पड़ते ही) और तू यहीं खड़ा है ! गया नहीं मक्खन लाने? … सब चौपट कर दिया। अरे उधर से नहीं, अंदर के दरवाजे से जा (रतन अंदर आता है।) … और जल्दी करो, प्रेमा! उमा को समझा देना, थोड़ा-सा गा देगी। (प्रेमा जल्दी से अंदर की तरफ जाती है। उसकी धोती जमीन पर रखे हुए बाजे से अटक जाती है।)
प्रेमा : उँह! यह बाजा, वह नीचे ही रख गया है।
रामस्वरूप : तुम जाओ, मैं रखे देता हूँ।… जल्दी। (प्रेमा जाती है। बाबू रामस्वरूप बाजा उठाकर रखते हैं। किवाड़ों पर दस्तका)
रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ। आइए, आइए !… हँ-हँ-हँ।

(बाबू गोपालप्रसाद और उनके लड़के शंकर का आना। आँखों से लोक चतुराई टपकती है। आवाज़ से मालूम होता है कि काफी अनुभवी और फितरती महाशय हैं। उनका लड़का कुछ खीस निपोरने वाले नौजवानों में से है। आवाज़ पतली है और खिसियाहट भरी। झुकी कमर इनकी खासियत है।)

रामस्वरूप : (अपने दोनों हाथ मलते हुए) हँ-हूँ, इधर तशरीफ़ लाइए – इधर (बाबू गोपालप्रसाद बैठते हैं, मगर बेंत गिर पड़ता है।)
रामस्वरूप : यह बेंत! … लाइए मुझे दीजिए। (कोने में रख देते हैं। सब बैठते हैं।) हैं-ह!…… मकान ढूँढ़ने में कुछ तकलीफ तो नहीं हुई?
गोपालप्रसाद : (खँखारकर) नहीं। ताँगेवाला जानता था।… और फिर हमें तो यहाँ आना ही था। रास्ता मिलता कैसे नहीं?
रामस्वरूप : हँ-हँ हैं। यह तो आपकी बड़ी मेहरबानी है। मैंने आपको तकलीफ तो दी…..
गोपालप्रसाद : अरे नहीं साहब! जैसा मेरा काम, वैसा आपका काम। आखिर लड़के की शादी तो करनी ही है। बल्कि यों कहिए कि मैंने आपके लिए खासी परेशानी कर दी।
रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ! यह लीजिए, आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे। हम तो आपके- हँ-हँ….सेवक हैं। हँ-हँ! (थोड़ी देर बाद लड़के की तरफ मुखातिब होकर) और कहिए, शंकर बाबू, कितने दिनों की और छुट्टियाँ हैं?
शंकर : जी, कॉलेज की तो छुट्टियाँ नहीं हैं। ‘वीक-एंड’ में चला आया था।
रामस्वरूप : तो आपके कोर्स खत्म होने में तो अब साल भर रहा होगा?
शंकर : जी, यही कोई साल-दो साल।
रामस्वरूप : साल-दो साल?
शंकर : हँ-हँ हँ !… जी, एकाध साल का ‘मार्जिन’ रखता हूँ।
गोपालप्रसाद : बात यह है साहब कि यह शंकर एक साल बीमार हो गया था। क्या बताएँ, इन लोगों को इसी उम्र में सारी बीमारियाँ सताती हैं। एक हमारा ज़माना था कि स्कूल से आकर दर्जनों कचौड़ियाँ उड़ा जाते थे, मगर फिर जो खाना खाने बैठते तो वैसी की वैसी ही भूख!
रामस्वरूप : कचौड़ियाँ भी तो उस जमाने में पैसे की दो आती थीं।
गोपालप्रसाद : जनाब, यह हाल था कि चार पैसे में ढेर -सी बालाई आती थी। और अकेले दो आने की हजम करने की ताकत थी, अकेले ! और अब तो बहुतेरे खेल वगैरह भी होते हैं, स्कूलों में। तब न कोई वालीबॉल जानता था, न टेनिस, न बैडमिंटन। बस कभी हॉकी या कभी क्रिकेट कुछ लोग खेला करते थे। मगर क्या मजाल कि कोई कह जाए कि यह लड़का कमजोर है। (शंकर और रामस्वरूप खीस निपोरते हैं।)
रामस्वरूप : जी हाँ, जी हाँ! उस जमाने की बात ही दूसरी थी। हँ-हैं!
गोपालप्रसाद : (जोशीली आवाज़ में) और पढ़ाई का यह हाल था कि एक बार कुर्सी पर बैठे कि बारह घंटे की ‘सिटिंग’ हो गई, बारह घंटे! जनाब, मैं सच कहता हूँ कि उस जमाने का मैट्रिक भी वह अंग्रेजी लिखता था फर्राटे की, कि आजकल एम.ए. भी मुकाबिला नहीं कर सकते।
रामस्वरूप : जी हाँ, जी हाँ! यह तो है ही।
गोपालप्रसाद : माफ कीजिएगा बाबू रामस्वरूप, उस जमाने की जब याद आती है, अपने को जब्त करना मुश्किल हो जाता है।
रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ!… जी हाँ वह तो रंगीन जमाना था, रंगीन जमाना। हँ-हँ-हँ! (शंकर भी ही ही करता है।)
गोपालप्रसाद : (एक साथ अपनी आवाज़ और तरीका बदलते हुए) अच्छा तो साहब, फिर ‘बिजनेस’ की बातचीत हो जाए।
रामस्वरूप : (चौंककर) ‘बिजनेस’? – बिज… (समझकर) ओह! … अच्छा, अच्छा। लेकिन ज़रा नाश्ता तो कर लीजिए। (उठते हैं।)
गोपालप्रसाद : यह सब आप क्या तकल्लुफ़ करते हैं!
रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ! तकल्लुफ़ किस बात का! हँ-हँ-हँ! यह तो मेरी बड़ी तकदीर है कि आप मेरे यहाँ तशरीफ़ लाए, वरना मैं किस काबिल हूँ। हँ-हँ!…… माफ कीजिएगा ज़रा अभी हाजिर हुआ। (अंदर जाते हैं।)
गोपालप्रसाद : (थोड़ी देर बाद दबी आवाज़ में) आदमी तो भला है। मकान-वकान से हैसियत भी बुरी नहीं मालूम होती । पता चले, लड़की कैसी है।
शंकर : जी… (कुछ खँखारकर इधर-उधर देखता है।)
गोपालप्रसाद : क्यों, क्या हुआ?
शंकर : कुछ नहीं।
रीढ़ की हड्डी Class 9 Summary in Hindi Ganga Chapter 6 3

रीढ़ की हड्डी Class 9 Summary in Hindi Ganga Chapter 6

गोपालप्रसाद : झुककर क्यों बैठते हो? ब्याह तय करने आए हो, कमर सीधी करके बैठो। तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की ‘बैकबोन’… (इतने में बाबू रामस्वरूप आते हैं, हाथ में चाय की ट्रे लिए हुए। मेज पर रख देते हैं)
गोपालप्रसाद : आखिर आप माने नहीं।
रामस्वरूप : (चाय प्याले में डालते हुए) हैं-हैं-हैं! आपको विलायती चाय पसंद है या हिंदुस्तानी?
गोपालप्रसाद : नहीं-नहीं साहब, मुझे आधा दूध और आधी चाय दीजिए। ज़रा चीनी भी ज्यादा डालिएगा। मुझे तो भई यह नया फैशन पसंद नहीं। एक तो वैसे ही चाय में पानी काफी होता है, फिर चीनी भी नाम के लिए डाली जाए तो जायका क्या रहेगा?
रामस्वरूप : हँ-हँ, कहते तो आप सही हैं। (प्याला पकड़ाते हैं।)
शंकर : (खखारकर) सुना है, सरकार अब ज्यादा चीनी लेने वालों पर ‘टैक्स’ लगाएगी।
गोपालप्रसाद : (चाय पीते हुए) हूँ। सरकार जो चाहे सो कर ले; पर अगर आमदनी करनी है तो सरकार को बस एक ही टैक्स लगाना चाहिए।
रामस्वरूप : (शंकर को प्याला पकड़ाते हुए) वह क्या?
गोपालप्रसाद : खूबसूरती पर टैक्स! (रामस्वरूप और शंकर हँस पड़ते हैं।) मजाक नहीं साहब, यह ऐसा टैक्स है जनाब कि देने वाले चूँ भी न करेंगे। बस शर्त यह है कि हर एक औरत पर यह छोड़ दिया जाए कि वह अपनी खूबसूरती के ‘स्टैंडर्ड’ के माफ़िक अपने ऊपर टैक्स तय कर ले। फिर देखिए ….
रामस्वरूप : (जोर से हँसते हुए) वाह-वाह! खूब सोचा आपने! वाकई आजकल खूबसूरती का सवाल भी बेढब हो गया है। हम लोगों के जमाने में तो यह कभी उठता भी न था। (तश्तरी गोपालप्रसाद की तरफ बढ़ाते हैं) लीजिए।
गोपालप्रसाद : (समोसा उठाते हुए) कभी नहीं साहब, कभी नहीं।
रामस्वरूप : (शंकर की तरफ मुखातिब होकर) आपका क्या खयाल है, शंकर बाबू?
शंकर : किस मामले में?
रामस्वरूप : यही कि शादी तय करने में खूबसूरती का हिस्सा कितना होना चाहिए।
गोपालप्रसाद : (बीच में ही) यह बात दूसरी है बाबू रामस्वरूप, मैंने आपसे पहले भी कहा था, लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। कैसे भी हो, चाहे पाउडर वगैरह लगाए, चाहे वैसे ही। बात यह है कि हम-आप मान भी जाएँ, मगर घर की औरतें तो राजी नहीं होतीं। आपकी लड़की तो ठीक है?
रामस्वरूप : जी हाँ, वह तो अभी आप देख लीजिएगा।
गोपालप्रसाद : देखना क्या। जब आपसे इतनी बातचीत हो चुकी है, तब तो यह रस्म ही समझिए।
रामस्वरूप : हँ-हँ, यह तो आपका मेरे ऊपर भारी एहसान है। हँ-हँ!
गोपालप्रसाद : और जायचा (जन्मपत्र) तो मिल ही गया होगा?
रामस्वरूप : जी, जायचे का मिलना क्या मुश्किल बात है। ठाकुर जी के चरणों में रख दिया। बस, खुद-ब-खुद मिला हुआ समझिए।
गोपालप्रसाद : यह ठीक कहा आपने, बिल्कुल ठीक। (थोड़ी देर रुककर) लेकिन हाँ, यह जो मेरे कानों में भनक पड़ी है, यह तो गलत है न?
रामस्वरूप : (चौंककर) क्या?
गोपालप्रसाद : यह पढ़ाई-लिखाई के बारे में!… जी हाँ, साफ बात है साहब, हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुगतेगा उसके नखरों को। बस हद से हद मैट्रिक पास होनी चाहिए… क्यों, शंकर?
शंकर : जी हाँ, कोई नौकरी तो करानी नहीं।
रामस्वरूप : नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।
गोपालप्रसाद : और क्या साहब! देखिए, कुछ लोग मुझसे कहते हैं कि जब आपने अपने लड़कों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाया है तब उनकी बहुएँ भी ग्रेजुएट लीजिए। भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है। अरे, मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। अगर औरतें भी वही करने लगीं, अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगीं और ‘पालिटिक्स’ वगैरह पर बहस करने लगीं तब तो हो चुकी गृहस्थी। जनाब, मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।
रामस्वरूप : जी हाँ, और मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं…! हँ…. …. हँ…! (शंकर भी हँसता है, मगर गोपालप्रसाद गंभीर हो जाते हैं।)
गोपालप्रसाद : हाँ, हाँ। वह भी सही है। कहने का मतलब यह है कि कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं। और ऊँची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।
रामस्वरूप : (शंकर से) चाय और लीजिए।
शंकर : धन्यवाद। पी चुका।
रामस्वरूप : (गोपालप्रसाद से) आप?
गोपालप्रसाद : बस साहब, अब तो खत्म ही कीजिए।
रामस्वरूप : आपने तो कुछ खाया ही नहीं। चाय के साथ ‘टोस्ट’ नहीं थे, क्या बताएँ, वह मक्खन…
गोपालप्रसाद : नाश्ता ही तो करना था साहब, कोई पेट तो भरना था नहीं। और फिर टोस्ट- वोस्ट मैं खाता भी नहीं।
रामस्वरूप : हँ-हैं! (मेज को एक तरफ सरका देते हैं। फिर अंदर के दरवाजे की तरफ मुँह कर ज़रा जोर से ) अरे, ज़रा पान भिजवा देना…।

(पान की तश्तरी हाथों में लिए उमा आती है। सादगी के कपड़े। गर्दन झुकी हुई। बाबू गोपालप्रसाद आँखें गड़ाकर और शंकर आँखें छिपाकर उसे ताक रहे हैं।)

गोपालप्रसाद और शंकर : (एक साथ) चश्मा !!!
रामस्वरूप : (ज़रा सकपकाकर) जी, वह तो… वह पिछले महीने में इसकी आँखें दुखनी आ गई थीं, सो कुछ दिनों के लिए चश्मा लगाना पड़ रहा है।
गोपालप्रसाद : पढ़ाई-वढ़ाई की वजह से तो नहीं है कुछ?
रामस्वरूप : नहीं साहब, वह तो मैंने अर्ज़ किया न।
गोपालप्रसाद : हूँ… (संतुष्ट होकर कुछ कोमल स्वर में) बैठो, बेटी।
रामस्वरूप : वहाँ बैठ जाओ उमा, उस तख्त पर, अपने बाजे-वाजे के पास। (उमा बैठती है।)
गोपालप्रसाद : चाल में तो कुछ खराबी है नहीं। चेहरे पर भी छवि है।… हाँ कुछ गाना-बजाना सीखा है?
रामस्वरूप : जी हाँ, सितार भी और बाजा भी। सुनाओ तो उमा एकाध गीत सितार के साथ।

(उमा सितार उठाती है। थोड़ी देर बाद मीरा का मशहूर गीत मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ गाना शुरू कर देती है। स्वर से जाहिर है कि गाने का अच्छा ज्ञान है। उसके स्वर में तल्लीनता आ जाती है, यहाँ तक कि उसका मस्तक उठ जाता है। उसकी आँखें शंकर की झेंपती-सी आँखों से मिल जाती हैं और वह गाते-गाते एक साथ रुक जाती है।)

रामस्वरूप : क्यों, क्या हुआ? गाने को पूरा करो उमा।
गोपालप्रसाद : नहीं-नहीं साहब, काफी है। लड़की आपकी अच्छा गाती है। (उमा सितार रखकर अंदर जाने को बढ़ती है।)
गोपालप्रसाद : अभी ठहरो, बेटी!
रामस्वरूप : थोड़ा और बैठी रहो, उमा! (उमा बैठती है।)
गोपालप्रसाद : (उमा से) तो तुमने पेंटिंग – वेंटिंग भी सीखी है?
उमा : (चुप)
रामस्वरूप : हाँ, वह तो मैं आपको बताना भूल ही गया। यह जो तसवीर टँगी हुई है, कुत्ते वाली, इसी ने खींची है। और वह उस दीवार पर भी।
गोपालप्रसाद : हूँ! यह तो बहुत अच्छा है। और सिलाई वगैरह ?
रामस्वरूप : सिलाई तो सारे घर की इसी के जिम्मे रहती है, यहाँ तक कि मेरी कमीजें भी। हँ-हँ-हँ!
गोपालप्रसाद : ठीक! … लेकिन, हाँ बेटी, तुमने कुछ इनाम-विनाम भी जीते थे?
(उमा चुप। रामस्वरूप इशारे के लिए खाँसते हैं लेकिन उमा चुप है, उसी तरह गर्दन झुकाए। गोपालप्रसाद अधीर हो उठते हैं और रामस्वरूप सकपकाते हैं।)
रामस्वरूप : जवाब दो, उमा। (गोपालप्रसाद से) हँ-हँ, ज़रा शरमाती है। इनाम तो इसने …..
गोपालप्रसाद : (ज़रा रूखी आवाज़ में) ज़रा मुँह तो खोलना चाहिए।
रामस्वरूप : उमा, देखो, आप क्या कह रहे हैं। जवाब दो न।
उमा : (हल्की लेकिन मजबूत आवाज़ में) क्या जवाब दूँ, बाबू जी ! जब कुर्सी- बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है। पसंद आ गई तो अच्छा है, वरना….
रामस्वरूप : (चौंककर खड़े हो जाते हैं।) उमा, उमा!
उमा : अब मुझे कह लेने दीजिए, बाबूजी।… ये जो महाशय मेरे खरीदार बनकर आए हैं, इनसे ज़रा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्या उनके चोट नहीं लगती? क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं, जिन्हें कसाई अच्छी तरह देख-भालकर खरीदते हैं?
गोपालप्रसाद : (ताव में आकर ) बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?
उमा : (तेज आवाज़ में) जी हाँ, और हमारी बेइज्जती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तोल कर रहे हैं? और ज़रा अपने इन साहबजादे से पूछिए कि अभी पिछली फरवरी में ये लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे, और वहाँ से कैसे भगाए गए थे!
शंकर : बाबूजी, चलिए।
गोपालप्रसाद : लड़कियों के होस्टल में?… क्या तुम कालेज में पढ़ी हो? (रामस्वरूप चुप)
उमा : जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी. ए. पास किया है। कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की, और न आपके पुत्र की तरह ताक-झाँककर कायरता दिखाई है। मुझे अपनी इज्जत- अपने मान का खयाल तो है। लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।
रामस्वरूप : उमा, उमा !!

रीढ़ की हड्डी Class 9 Summary in Hindi Ganga Chapter 6
रीढ़ की हड्डी Class 9 Summary in Hindi Ganga Chapter 6 4
गोपालप्रसाद : (खड़े होकर गुस्से में) बस हो चुका। बाबू रामस्वरूप, आपने मेरे साथ दगा किया। आपकी लड़की बी.ए. पास है और आपने मुझको कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है। लाइए, मेरी छड़ी कहाँ है। मैं चलता हूँ। (छड़ी ढूँढ़कर उठाते हैं।) बी.ए. पास! उफ्फोह! गजब हो जाता ! झूठ का भी कुछ ठिकाना है। आओ, बेटे, चलें। (दरवाजे की ओर बढ़ते हैं।)
उमा : जी हाँ, जाइए, जरूर चले जाइए! लेकिन घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं- यानी बैकबोन, बैकबोन!

(बाबू गोपालप्रसाद के चेहरे पर बेबसी का गुस्सा है और उनके लड़के के रुलासापन। दोनों बाहर चले जाते हैं। बाबू रामस्वरूप कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं। उमा सहसा चुप हो जाती है। लेकिन उसकी खामोशी सिसकियों में तबदील हो जाती है।)

(प्रेमा का घबराहट की हालत में आना।)
प्रेमा : उमा, उमा… रो रही है? (यह सुनकर रामस्वरूप खड़े होते हैं। रतन आता है।)
रतन : बाबूजी, मक्खन! (सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।)

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