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घर की याद कविता का सारांश
घर की याद Class 9 Summary Explanation
Class 9 Hindi Chapter 12 Summary – घर की याद Summary Class 9
यह कविता 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान कवि भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा लिखी गई थी। उस समय कवि कारावास में था। वहाँ उसे अपने घर के प्रिय सदस्यों की बहुत याद आई। कविता का सार इस प्रकार है-
कवि कारावास में है। बाहर बरसात हो रही है। इस कारण उसके प्राण और मन घर की यादों से घिर गए हैं। रात – से बारिश हो रही है। अब भी आसमान में घटाएँ छाई हुई हैं। घटाओं के कारण अँधेरा छाया हुआ है। सबेरा हो गया है। परंतु बादल अब भी बरस रहे हैं, हवा सर सर चल रही है। ऐसे में कवि के मन में अपने घर की यादें तैरने लगी हैं- खुशियों भरी यादें।
उसके घर में चार भाई और चार बहनें हैं। सबमें बहुत गहरा प्यार है। कवि की माँ अनपढ़ है किंतु वह ममता की मूर्ति है। उसकी स्नेहधारा का प्रसार कारावास तक भी फैला हुआ है। कवि के पिता चिरयुवा हैं। वे अभी भी खुलकर हँसते हैं, दौड़ लगाते हैं। वे अत्यंत साहसी हैं। उनकी वाणी में बादलों जैसी गर्जन है, कामों में तूफान सी तेजी है। कवि मन-ही-मन कल्पना करता है कि आज जब उसके पिता नित्य की तरह व्यायाम करके आए होंगे तो उनकी आँखों में भवानी की याद में आँसू आ गए होंगे। वे अपने पाँचवें पुत्र की याद करके रो पड़े होंगे। उनके पिता भवानी को ‘सोने पर सुहागा’ कहते रहे हैं। आज जबकि भवानी जेल में है तो उन्हें अपने अन्य बेटे भवानी से छोटे प्रतीत हुए होंगे। कवि कल्पना करता है कि भवानी की माँ ने उनके पिता को ढाढ़स बँधाया होगा। कहा होगा कि वह पिता की इच्छा जानकर ही कारावास में गया है। यदि वह देशभक्ति के इस महान कार्य से पाँव पीछे खींच लेता तो वह उसकी कोख को लजाता। तब पिता ने अपने आँसू रोक लिए होंगे।
पिता ने अपने आँसुओं को छिपाकर कहा होगा- उन्हें भवानी की याद आ रही है। इस मूसलाधार वर्षा में भवानी नंगे बदन घूमा करता था। बाड़े में जाकर लोकी के बीज बोता था। मुझे उसी की याद आ रही है। अच्छा मैं अब नहीं रोऊँगा। यह सुनते ही भवानी के भाई बहन माँ और भाभी सब फूट-फूटकर रो पड़े होंगे। भाभियाँ तो खुलकर रो भी नहीं पाई होंगी।
अब जब घने बादल छाए हुए हैं। अभी भी झुटपुट बना हुआ है। कवि सोचता है पता नहीं मन में कितनी प्यास है! मन में इतनी वेदना है कि सही नहीं जाती। मनुष्य के वश में कुछ भी नहीं है। एक जरा से झटके से वह टूट जाता है। तू अपने प्रियजनों से दूर क्या हुआ, मानो दुख से पूरी तरह घिर गया। मेरे पिताजी दीखने में पहाड़ जैसे सुदृढ़ हैं, किंतु अंदर से बड़ के पेड़ हैं। एक भी टहनी टूट जाए या टेढ़ी हो जाए तो वे चोट से बिलबिला कर रोने लगते हैं। उन्हें घर-भर की कितनी चिंता रहती है?
कवि सजीले सावन को अपना संदेशवाहक बनाता है और उससे प्रार्थना करता है कि वह चाहे कितना भी बरस लेकिंतु उसके पिता के मर्म को दुखी न करे। वह पिता को जाकर बताए कि भवानी जेल में मस्त है। वह पढ़ रहा है लिख रहा है, काम कर रहा है। लोग उसे चाहते हैं। वह डटकर भोजन करता है, खेलता-कूदता है और मस्त रहता है। कवि उसे सावधान करता है कि कहीं वह गलती से उसकी वास्तविक स्थिति का वर्णन न कर दे। कहीं यह न कह दे कि जेल में भवानी बहुत उदास, मौन और बेचैन है।
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घर की याद कविता का कवि परिचय
भवानीप्रसाद मिश्र – हिंदी के प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार थे, जो अपनी सरल और प्रभावशाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। उनका जन्म 29 मार्च 1913 को मध्य प्रदेश में हुआ था। उनकी कविताओं में प्रकृति, मानवीय संवेदनाएँ और स्वतंत्रता की भावना झलकती है। भवानीप्रसाद मिश्र के महान कार्यों में स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान प्रमुख है। वे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से जुड़े रहें, ‘कल्पना’ पत्रिका का संपादन किया, आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों का संचालन किया तथा ‘गांधी वाङ्मय’ का संपादन किया। वे गांधीजी के विचारों से बहुत प्रभावित थे और उनकी रचनाओं में यह स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में ‘गीत फरोश’ ‘खुशबू के शिलालेख’, ‘चकित है दुख’, ‘अँधेरी कविताएँ’, ‘शतदल’, ‘गांधी पंचशती’, ‘त्रिकाल संध्या’ और ‘बुनी हुई रस्सी’ शामिल हैं। उन्हें बुनी हुई रस्सी पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उनका देहांत सन् 1985 में हो गया।

शब्दार्थ (पृष्ठ 194) : सक्रिय – गतिशील, क्रिया में होना। भागीदारी – भाग लेना, हिस्सा लेना। संबद्ध – जुड़ा हुआ। वाङ्मय – साहित्य। स्मृति – याद। संवेदना – भावना, अनुभूति। सम्मिलित – मिला हुआ, जुड़ा हुआ। सांत्वना – तसल्ली, ढाढ़स।
कविता का संदेश
घर और परिवार का महत्व सबसे अधिक होता है, जो हमें सच्चा सुख और अपनापन देते हैं। दूर जाने पर ही हमें अपने घर और अपनों की असली कीमत समझ आती है। जीवन में चाहे जितनी भी सफलता मिले, अपने घर और जड़ों से जुड़ा रहना जरूरी है।
घर की याद कविता का भावार्थ व्याख्या
काव्यांश – 1
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
अब सबेरा हो गया है,
कब सबेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ माना-
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर, (पृष्ठ 195)
शब्दार्थ : प्राण मन घिरना – प्राणों और मन में छाना। अँधेरा – अँधियाला। छाप – प्रभाव असर। झरा-झर – झर-झर की आवाज़ करते हुए मूसलाधार।
संदर्भ – प्रस्तुत पद्यांश कविवर भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा- रचित ‘घर की याद’ नामक कविता से उद्धृत है। कवि 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के कारण जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर के प्रिय सदस्यों की याद बहुत सताती है। वह भावुक हो उठता है।
प्रसंग – बरसात हो रही है। घनी बरसात के बीच उसे घर की मीठी यादें व्याकुल कर देती हैं। उसी व्याकुलता में वह कहता है-
व्याख्या – आज बारिश हो रही है। मूसलाधार बारिश हो रही है। रात भर बादल बरसते रहे हैं। मेरे प्राण और मन दोनों इस बारिश में पूरी तरह भीग गए हैं। वे घर में बिताई बारिश की यादों से घिर गए हैं।
अब सबेरा हो गया है। सबेरा कब हुआ मुझे ज्ञात ही न हो सका। ठीक से तो मुझे सवेरे का पता नहीं चला। मैं बहुत देर तक सोता रहा। सो-सोकर मैंने मन-ही-मन मान लिया कि अब सबेरा हो चुका होगा।
कारण यह है कि बादल का झुटपुटा अभी भी बना हुआ है। अभी तक आकाश घने काले बादलों से छाया हुआ है। चारों ओर एक चुप्पी है। ऐसा लगता है- दिन नहीं रात हो गई हो । बादलों के छाने के कारण दिन में भी रात दीख रही है।
पानी अब भी झरा-झर गिर रहा है। वृक्षों के पत्ते हरे-हरे हैं और हर-हर की आवाज़ करते हुए हिल रहे हैं। हवा सरसराती हुई बह रही है। ऐसे में मेरे प्राण थर-थर काँप रहे हैं। मुझे घर के सदस्यों की यादें सता रही हैं।
विशेष-
- वर्षा का वातावरण साकार हो उठा है।
- झरा-झर, हरा-हर, सर-सर और थर-थर जैसे ध्वन्यात्मक शब्दों से वातावरण सजीव हो उठा है।
- प्रकृति और मन की एकता का प्रभाव बहुत प्रभावी बन पड़ा है।
- पानी गिरने की बारंबारता ने बारिश को सजीव कर दिया है।
काव्यांश – 2
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,
घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर! (पृष्ठ 195)
शब्दार्थ : तिर – तैर। पूर – भंडार। परिताप – वेदना, कष्ट।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – रात से धारासार बारिश हो रही है। ऐसे समय में कवि को अपने घर की याद सताती है। वह कहता है-
व्याख्या – आज बरसात हो रही है। पानी बहुत अधिक बरस रहा है। रात भर वर्षा होती रही है। ऐसे में मेरा मन और प्राण घर की याद से घिर गए हैं। मेरी नज़रों में मेरा घर और घर के सदस्य तैर रहे हैं। एक-एक करके सबकी याद आ रही है। मेरा घर खुशियों का भंडार है। परंतु दुर्भाग्य से वही आज मुझसे दूर हो गया है।
कवि कहता है – मेरे घर में चार भाई हैं। आज मेरी विवाहिता बहन भी घर पर आई होगी। जब वह अपने पिता के घर आई होगी तो यह सोचा होगा कि अपने बहन-भाइयों से मिलूँगी। परंतु मुझे न पाकर वह बहुत दु:खी हुई होगी। तब उसे अपने पिता का घर कष्ट का घर प्रतीत हुआ होगा।
विशेष-
- शोक और करुणा से मन भीग जाता है।
- बरसात का वातावरण साकार हो उठा है।
- कवि के अभाव में भवानी का घर ‘परिताप का घर’ बन गया है। बहुत सुंदर और सटीक अभिव्यक्ति।
- भाषा सरल और प्रवाहमयी है।
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काव्यांश – 3
आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें
भुजा भाई प्यार बहिनें, (पृष्ठ 195)
शब्दार्थ : छिन – क्षण, पल। बरस – वर्ष, साल। तरस – प्यास, इच्छा। भुजा भाई – भुजा के समान सहयोग भाई।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – वर्षा हो रही है। कवि को अकेले में अपने घर की सुखद यादें आ रही हैं। वह कहता है-
व्याख्या – बारिश में मुझे आज का दिन दिन नहीं लग रहा। दिन होता तो जरूर उसका क्षण-क्षण बदलता। आज के दिन कोई क्षण क्षण नहीं है, अपितु प्रत्येक क्षण सौ वर्ष के समान लंबा समय है। यह बीतने में ही नहीं आ रहा। मेरे मन में कैसी प्यास है! घर के सदस्यों के बीच होने की तड़प है।
मेरे घर के सभी सदस्य आपस में प्रेम के कारण बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। उनमें गहरा लगाव और प्रेम है। ऐसा भाईचारा बहुत कम देखने में आता है। मेरे चार भाई हैं। वे सबके सब भुजा के समान सहयोगी, कर्मशील और बलिष्ठ हैं। मेरी बहनें भी चार हैं। वे चारों स्नेह की भंडार हैं।
विशेष-
- भाषा सरल भावपूर्ण और प्रवाहपूर्ण है।
- क्षण की जगह ‘छिन’ का प्रयोग बहुत मधुर है।
- ‘भुजा भाई’ की कल्पना बहुत मनोरम है। इसमें बिना ‘वाचक शब्द’ और ‘समान धर्म’ के उपमा अलंकार है। साथ ही ‘भ’ की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।
- ‘रे’ में जैसा सारा दर्द और स्नेह समा गया है।
- प्रश्न शैली का सौंदर्य देखते ही बनता है।
काव्यांश – 4
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता। (पृष्ठ 195)
शब्दार्थ : गढ़ी – डूबी, धँसी। स्नेह-धारा – प्रेम की भावना। पसारा – फैलाव, प्रसार।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश कविवर भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से उद्धृत है। कवि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के अंतर्गत जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर के प्रिय सदस्यों की बहुत याद आती है। वह भावुक हो उठता है। उसे अपनी ममतामयी माँ की स्मृति झकझोर कर रख देती है। वह कहता है-
व्याख्या – मेरी माँ बेचारी है अनपढ़ है। वह मेरे वियोग के दुख में डूबी हुई होगी। वह इतनी ममतामयी है कि यदि मैं उसकी गोद में एक बार सिर रख लूँ तो फिर कोई दुख मेरे पास नहीं फटक सकता।
मेरी माँ की स्नेह धारा का फैलाव यहाँ कारागृह तक भी है। यहाँ भी मैं उसकी ममता का स्पर्श अनुभव कर रहा हूँ। मेरी माँ अनपढ़ है। वह लिखना नहीं जानती। नहीं तो मुझे पत्र अवश्य लिखती। मैं जानता हूँ, वह मेरे बिना नहीं रह सकती।
विशेष-
- इसमें कवि के मातृ-प्रेम का तथा कवि की माता के ममता भरे वात्सल्य का अत्यंत सजीव प्रभावी और अनुभूतिपूर्ण वर्णन हुआ है।
- कवि ने निरक्षरता की समस्या को भी उभारा है।
- माँ की गोद में सिर रखने का बिंब साकार हो गया है। चाक्षुष बिंब।
- प्रसार की जगह ‘पसारा’ शब्द का प्रयोग बहुत सुंदर है।
- मिश्र जी की भाषा बातचीत के समान सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और अनुभूतिपूर्ण है। वे कविता करने या गाने की बजाय कविता कहते हैं।
- छोटे-छोटे वाक्यों और तुकों के सहारे कविता सचमुच मनमोहक बन पड़ी है।
काव्यांश – 5
और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक घिर रहा है.
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता, (पृष्ठ 195-196)
शब्दार्थ : चतुर्दिक – चारों ओर। वज्र – कठोर धातु, फौलाद। भुज – बाँह। नवनीत – मक्खन। उर – हृदय। व्यापा – फैला, अनुभव हुआ। खिलखिलाएँ – हँस दें। हिचकें – डरे, घबराएँ। बिचकें – डरें। बोल – वाणी। झंझा – आँधी। लरजता – लहराता।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश नई कविता के समर्थ कवि भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से अवतरित है। कवि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर की विशेषकर अपने पिताजी की याद सताती है। वह पिता की जिंदादिली, बहादुरी और दृढ़ता को याद करता हुआ कहता है-
व्याख्या – आज चारों ओर पानी गिर रहा है। मेरी आँखों के सामने मेरा घर और उसके सदस्य तैर रहे हैं। मेरे पिताजी स्वभाव से सरल और बहादुर हैं। उनकी भुजाएँ वज्र के समान मजबूत हैं और हृदय मक्खन-सा कोमल है। यद्यपि पिताजी बूढ़े हो गए हैं, परंतु उनके मन में कभी बुढ़ापा नहीं आया अर्थात उन्हें मन की कमजोरी ने कभी नहीं छुआ। आज भी उनके हृदय में युवकों जैसा उत्साह और साहस है। शरीर से भी वे इतने स्वस्थ हैं कि अब भी लंबी दौड़ लगा लेते हैं। इस उम्र में भी वे खिल-खिलाकर हँसते हैं। उनके मार्ग में मौत जैसी भयंकर बाधा भी आ जाए तो वे हँसकर उसका मुकाबला कर लें। उसका किसी प्रकार का भय न मानें सामने आते शेर को देखकर भी वे न घबराएँ। आज भी उनकी आवाज़ में कड़क है। बोलते हैं तो दूर-दूर तक बादल की गरज के समान उनकी आवाज़ सुनाई पड़ती है। जिस समय वे काम करने लगते हैं तो उनमें आँधी-तूफान जैसी स्फूर्ति और गति आ जाती है।
विशेष-
- छोटे-छोटे चुस्त वाक्य और तुक के आश्रय से कविता सचमुच मनमोहक बन पड़ी है।
- कवि के पिता की जिंदादिली विशेष रूप से प्रभावशाली शब्दों में अंकित हुई है। उनका दौड़ना, खिलखिलाना, मौत और शेर के सामने भी न घबराना, बादलों के समान गंभीर वाणी होना उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व के परिचायक हैं।
- वीर रस की मनोरम अभिव्यक्ति हुई है।
- ‘नवनीत-सा उर’ में उपमा अलंकार है। मनोरम उपमा।
- वज्र भुज-बलिष्ठ बाँहों के लिए सुंदर प्रयोग है।
- बुढ़ापा होते हुए भी नहीं व्यापा। विशेषोक्ति अलंकार।
- ‘बोल में बादल गरजता’ और ‘काम में झंझा लरजता’ बहुत सशक्त मुहावरे हैं।
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काव्यांश – 6
आज गीता-पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नज़र उनको पड़े होंगे। (पृष्ठ 196)
शब्दार्थ : दड – दंड-बैठक लगाना। मुगदर – व्यायाम करने का एक उपकरण। मूठ – मुट्ठियाँ, पकड़ने का स्थान।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश कविवर भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से उद्धृत है। कवि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के अंतर्गत जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर के प्रिय सदस्यों की बहुत याद आती है। वह भावुक हो उठता है। वह पिता की नित्य व्यायाम क्रिया का स्मरण करता हुआ कहता है-
व्याख्या – मैं सोच रहा हूँ कि आज जब मेरे पिताजी रोज़ की तरह गीता का पाठ करके तथा दो सौ साठ दंड-बैठकें लगाकर, व्यायाम के लिए मुगदर हिलाकर तथा उनकी मूठों को मिलाकर छत से नीचे आए होंगे तो उनकी आँखों में अवश्य आँसू रहे होंगे। वे मुझे अपने पास न पाकर बहुत व्याकुल हुए होंगे। इस समय बरसात हो रही है। मेरी नज़रों में मेरा घर परिवार तैर रहा है। मुझे सब सदस्यों की याद आ रही है।
मेरे घर में मेरे चार भाई तथा चार बहनें हैं। मेरे भाई भुजा के समान सहयोगी और कर्मठ हैं। बहनें स्नेह की भंडार हैं। मैं जानता हूँ कि ये सब भाई बहन जब घर में खड़े होंगे या खेल रहे होंगे, तो मेरे पिताजी को नज़र आए होंगे। तब उनकी क्या दशा हुई होगी, मैं भली-भाँति जानता हूँ।
विशेष-
- भाषा अत्यंत सरल प्रवाहपूर्ण तथा स्वाभाविक है।
- दंड करना, मुगदर हिलाना, नैन जल से छाना में चित्रात्मकता है। आँखों के सामने दृश्य खड़ा हो जाता है।
- ‘भुजा भाई’ में अनुप्रास और लुप्तोपमा अलंकार है।
- हाय! जैसे भावबोधक से वियोग की पीड़ा व्यक्त हुई है।
- पिता के स्वस्थ, बलिष्ठ और भावुक व्यक्तित्व का परिचय मिलता है।
- भवानी का परिवार आदर्श संयुक्त परिवार है।
- भाई के लिए भुजा की उपमा मनोरम है। अनुप्रास भी है।
- पिता के फफक-फफक कर रोने का बिंब अत्यंत सजीव है।
- मिश्र जी की भाषा बातचीत के समान सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और अनुभूतिपूर्ण है। वे कविता करने या गाने की बजाय कविता कहते हैं।
काव्यांश – 7
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा,
बँधा बैठा हूँ अभागा, (पृष्ठ 196)
शब्दार्थ : क्षण – पल। व्यापा – व्याप्त हुआ, फैला। अभागा – दुर्भागा। सोने पर सुहागा – किसी वस्तु या व्यक्ति का दूसरों से बेहतर होना। प्यार में बहना – भाव-विभोर होना। स्वर्ण बेटे – योग्य बेटे। हेटे – छोटे, तुच्छ।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश कविवर भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से उद्धृत है। कवि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के अंतर्गत जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर के प्रिय सदस्यों की बहुत याद आती है। वह भावुक हो उठता है। कवि पिता की भावुकता को याद करता हुआ कहता है-
व्याख्या – यद्यपि मेरे पिताजी की अवस्था बहुत ज्यादा है। वे वृद्ध हो चुके हैं, किंतु उनका शरीर युवाओं की तरह पूर्ण स्वस्थ है। उन्हें बुढ़ापे की कमजोरियों और बीमारियों ने छुआ तक नहीं। ऐसे मेरे पिता मुझ पाँचवें पुत्र को घर में न पाकर रो पड़े होंगे। वे मेरा नाम ले-लेकर रो पड़े होंगे।
मैं उनका पाँचवाँ भाग्यहीन पुत्र हूँ जो उनके बीच में नहीं हूँ। फिर भी इस भाग्यहीन पुत्र को पिताजी अपने पाँचों पुत्रों में सबसे अधिक बढ़कर प्यारा समझते हैं। जब-जब मेरे बारे में कभी चर्चा चलती है, वे सदा भाव-विभोर हो जाते हैं। आज उनके स्वर्ण के समान चारों प्यारे बेटे भी मेरे बिना उन्हें अच्छे नहीं लगे होंगे क्योंकि उनका सबसे ज्यादा प्यारा बेटा मैं उनकी नजरों से दूर जेल में पड़ा हुआ हूँ।
विशेष-
- कवि को अपने पिता से; तथा पिता को पुत्र से गहरा लगाव है। भवानी के पिता भवानी को अपना सबसे श्रेष्ठ और गौरवशाली पुत्र मानते हैं।
- कवि जेल में बंद होने के कारण तथा परिवार से दूर रहने के कारण स्वयं को अभागा कहता है। यह शब्द उसके परिवार – प्रेम का परिचायक है।
- ‘सोने पर सुहागा’ मुहावरे का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया गया है।
- मिश्र जी की भाषा बातचीत के समान सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और अनुभूतिपूर्ण है। वे कविता करने या गाने की बजाय कविता कहते हैं।
- छोटे-छोटे वाक्यों और तुकों के सहारे कविता सचमुच मनमोहक बन पड़ी है।
- ‘रो पड़े होंगे बराबर पाँचवें का नाम लेकर’ में चाक्षुष बिंब है।
काव्यांश – 8
और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना बहा होगा
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे, (पृष्ठ 196)
शब्दार्थ : लीक – परंपरा, मर्यादा। पाँव पीछे हटाना – कर्तव्य-मार्ग से हटना। कोख को लजाना – माँ को लज्जित करना। कच्चे होना – कमजोर होना, भावुक होना।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश कविवर भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से उद्धृत है। कवि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के अंतर्गत जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर के प्रिय सदस्यों की बहुत याद आती है। वह भावुक हो उठता है। वह कल्पना करता है कि उसके भावुक पिता उसकी याद में फफक-फफक कर रो पड़े होंगे।
व्याख्या – आज के दिन घर में मेरी याद आने पर जब पिताजी भावुक हो उठे होंगे तब माँ ने उन्हें हौसला देते हुए कहा होगा कि आप अपने पाँचवें पुत्र भवानीप्रसाद की याद में रो क्यों रहे हैं? वह हमारी शुभ कामनाओं एवं आशीर्वाद के परिणामस्वरूप जेल में है। वह वहाँ हर प्रकार से राजी खुशी होगा। ऐसी चर्चा होते हुए भी मेरे अभाव में परिवार को बहुत दुख हो रहा होगा।
माताजी पिताजी को ढाढ़स बँधाते हुए कह रही होंगी वह देश के प्रति तुम्हारी भावनाओं और अपने प्रति तुम्हारे अपनत्व को पहचान कर ही जेल गया है। यह उसने उचित ही किया है।
यदि वह देश के प्रति इस पवित्र कर्तव्य से विमुख हो जाता तो मुझ वीर जननी को लज्जित ही करता। यदि आज ऐसे अवसर पर तुम अपना मन छोटा करोगे, अपनी कमजोरी प्रकट करोगे तो तुम्हें देखकर अन्य बच्चे भी रोने लगेंगे।
विशेष-
- माँ का यह कल्पित संवाद अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है। उसका वीर, तेजस्वी तथा साहसी रूप प्रकट हुआ है। उसे भवानी के देश हित में जेल जाने पर गर्व है।
- संवाद शैली के कारण यह कथन बहुत सजीव बन पड़ा है।
- पाँव पीछे हटाना, कोख को लजाना मुहावरों का सशक्त प्रयोग हुआ है।
- मिश्र जी की भाषा बातचीत के समान सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और अनुभूतिपूर्ण है। वे कविता करने या गाने की बजाय कविता कहते हैं।
- छोटे-छोटे वाक्यों और तुकों के सहारे कविता सचमुच मनमोहक बन पड़ी है।
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काव्यांश – 9
पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती, (पृष्ठ 197)
शब्दार्थ : धीर – धीरज, धैर्य खोता – नष्ट करना, खो देना। झड़ी झारी – बारिश का लगातार मोटी धार में बरसना बा.ड़ा – खुला-स्थान। फलानी – अमुक, फला। झेला – पाया।
संदर्भ – यह काव्यांश कविवर भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से उद्धृत है। कवि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बंद है।
प्रसंग – कवि जेल में है। वह पिताजी की भावुकता को याद कर रहा है। जब माँ ने रोते हुए पिता को चुप करने के लिए कहा होगा तो-
व्याख्या – पिताजी ने झूठमूठ कहा होगा-नहीं; मैं कहाँ रो रहा हूँ। कवि सोचता है – हाय! मेरे पिता ने इतना दुख कैसे सहा होगा? पिता ने माँ को कहा होगा नहीं, मैं रो नहीं रहा हूँ। धैर्य नहीं खो रहा हूँ। यह तो आज पानी बरस रहा है। इसलिए मुझे सहसा भवानी की याद आ गई। उसे बरसता हुआ पानी बहुत अच्छा लगता था। दिन-रात की बारिश उसे बहुत भाती थी।
भवानी बरसात में नंगे सिर, नंगे बदन घूमता रहता था। तभी वह बड़े बाड़े में जाकर गीली मिट्टी में लौकी के बीज बोया करता था। फिर वहाँ से आकर तुझे बताता था कि फलाँ बेल पर फलाँ फूल आ गया है। तब तू उसके साथ बाड़े में जाती थी। मुझे अचानक ये बातें याद आ गई। इसलिए मैं भावुक हो गया।
विशेष-
- कवि ने पिता अत्यंत भावुक हैं। उनसे भी अधिक भावुक है कवि, जो ऐसी कल्पनाएँ कर रहा है।
- भाषा रिमझिम बारिश की तरह धारदार और प्रवाहपूर्ण है।
काव्यांश – 10
मैं न रोऊँगा-कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवें की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा
आज सबका मन चुआ होगा।। (पृष्ठ 197)
शब्दार्थ : पानी बहना – आँसू उमड़ना। पाँचवें – भवानी। पागल – वेदना-व्यथित। भौजी – भाभी। तरला – भावुक। चुआ – झरा।
संदर्भ – यह पद्यांश कविवर भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से उद्धृत है। कवि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के कारण जेल में बंद है। अचानक बारिश होते देख उसे अपने घर की याद आती है।
प्रसंग – अपने पिता तथा अन्य सदस्यों की भावुकता पर प्रकाश डालते हुए कवि कहता है-
व्याख्या – रोते हुए पिता ने माँ को कहा होगा- नहीं, मैं नहीं रोऊँगा। यह कहते ही उनकी आँखों से फिर से रुलाई निकल पड़ी होगी। उसके बाद घर – भर के लोग मुझ पाँचवें पुत्र की याद में फफक-फफक कर रो पड़े होंगे।
मेरे भाई और बहनें रो-रोकर पागल हो गए होंगे। अम्मा बादल की तरह खूब रोई होंगी। मेरी भाभी, जो कि स्वभाव से ही सरल हैं। वे सहज बरसते पानी में रो-रोकर बरस रही होंगी। वे शर्म से खुलकर रो भी नहीं पा रही होगी। किंतु भीतर-ही-भीतर छटपटा रही होंगी। आज सबकी आँखों से धारासार आँसू बरसे होंगे। आज मेरे घर में ऐसी भावुकता की आँधी चली होगी।
विशेष-
- भाषा अत्यंत भावुकता-भरी, मर्मस्पर्शी, कोमल और करुणापूर्ण है।
- ‘पागल’ शब्द की अभिव्यक्ति बहुत गहरी है।
- भाभियों का खुलकर रो न पाना-उनकी छटपटाहट को प्रवाहपूर्ण सहज भाषा में व्यक्त किया गया है।
- अम्मा-बादल में लुप्तोपमा अलंकार है।
काव्यांश – 11
अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरनें झुकें झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;
गगन-आँगन की लुनाई
दिशा के मन में समाई
दश-दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की लय छाप है रे
झाड़ आँखें बंद करके
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं (पृष्ठ 197)
शब्दार्थ : निहायत – अत्यधिक। नम – गीला। गगन – आकाश। रमे – फैले। फाँकें – टुकड़े। लीप – लिपाई करना। लुनाई – सुंदरता, सलोनापन। दश – दस। झाड़ – बरसती हुई। सुस्थिर – थमी हुई। क्षितिज – धरती – आकाश का मिलन – स्थल।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – मूसलाधार बारिश के रुकने का वर्णन करता हुआ कवि कहता है-
व्याख्या – अब पानी बरसना रुक गया है। मेरा मन बहुत भावुक हो गया है। आकाश में सब ओर एक जैसे बादल जमे हैं। वे ढेरों ढेर हैं। आकाश-भर फैले हुए हैं। उनके लघु टुकड़े नहीं हैं। सूरज की किरणें उनमें से निकल नहीं पा रहीं । बादल इस तरह घने छाए हुए हैं जैसे मानो माँ ने आँगन लीप दिया हो।
आकाश रूपी आँगन की सुंदरता सभी दिशाओं में समाई हुई है। दसों दिशाओं में इस समय एक रहस्यमयी चुप्पी है। चारों ओर स्वस्थ वातावरण है। ऐसा लगता है कि बादल अपनी धारासार बरसती हुई आँखें बंद करके, अपने मन-प्राणों को रोककर साँसें थामकर बिना हिले चुपचाप खड़े हैं। मानो वे आकाश में ठहर गए हों।
विशेष-
- प्रकृति, बादल, आकाश और गहरी चुप्पी का मनोरम वातावरण चित्रित हुआ है।
- बादल का मानवीकरण किया गया है। उसे दुबके हुए भावुक मनुष्य-सा दिखाया गया है।
- गगन-आँगन में रूपक अलंकार है।
- भाषा सरल प्रवाहमयी और चित्रमयी है।
- ‘माँ कि आँगन लीप दे ज्यों’ में उत्प्रेक्षा है।
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काव्यांश – 12
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किसलिए इतनी तृषा रे,
तू जरा-सा दुख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,
हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे! (पृष्ठ 197-198)
शब्दार्थ : पंछी – पक्षी। उर – हृदय। तृषा – प्यास इच्छा। रस – आनंद। पूर – भंडार। अश्रु – आँसू। सिंचित – सींचे हुए, भरे हुए। हास – हँसी।
संदर्भ – पूर्ववत।
प्रसंग – कवि सोचता है कि मनुष्य का हृदय कितना कमज़ोर है।
व्याख्या – जब मन के भीतर बैठा पंछी बोलता है तो वह दिल के भीतर छिपे सारे घाव हरे कर देता है। आदमी दिल से लाचार है। न जाने, उसके हृदय में अपनों के लिए इतनी प्यास, इतनी तृषा क्यों है?
हे मनुष्य! तू इतना छोटा-सा है। क्या तू इतना बड़ा वियोग सह लेगा? अपनों से दूरी का दुख सह लेगा? इस वियोग की पीड़ा पर किसी का वश भी नहीं चलता और वश के बिना कोई सुख नहीं है।
तू दुख की हवा चलते ही निराशा के आकाश में उड़ने लगता है। कष्ट की लहर आते ही तू अपने लक्ष्य से भटक जाता है। वियोग का एक झटका लगते ही तू अंदर से टूट जाता है। और नीचे गिरकर फूट-फूट कर रोने लगता है।
हे मेरे मन! तू अपने प्रिय परिवारजनों से दूर होकर एक नदी की तरह बह चला है तू आँसूओं से लबालब भर गया है। क्या तेरे जीवन में अब दुख ही दुख बच गए हैं। तेरी हँसी में भी आँसू छलक रहे हैं।
विशेष-
- कवि की वियोग- वेदना को बहुत तरल, सुंदर और मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरा गया है।
- कवि की प्रेम भावना ही वह पक्षी है जो दिन-रात वियोग के गाने गाता रहता है।
- कवि भावुक है। वह वियोग से व्यथित तो है, किंतु कमजोर नहीं है। उसकी देशभक्ति पर संदेह नहीं है।
- ‘एक पंछी बोलता है’ में श्रव्य बिंब है।
- घाव खोलना, मुहावरे का मर्मस्पर्शी प्रयोग हुआ है।
- भाषा गतिशील है। छोटे-छोटे शब्द, वाक्यांश और वाक्य कविता में क्षिप्रता ला रहे हैं।
काव्यांश – 13
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे,
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए.
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नदी उमग ले, (पृष्ठ 198)
शब्दार्थ : वेश – स्वरूप। क्लेश – दुःख, कष्ट। देह – शरीर। बड़ – खट्टे-मीठे कसैले फल वाला एक पेड़। झाड़ – वृक्ष।
उमग – फूट।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश नई कविता के समर्थ कवि भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से अवतरित है। कवि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर की – विशेषकर अपने पिताजी की याद सताती है। वह अपने बलशाली, उदार और भावुक पिता को याद करता हुआ कहता है-
व्याख्या – जेल में रहते हुए जब मेरी आँखों के सामने पिताजी का विशाल रूप आता है तो मन में गहरी वेदना होती है। उनका शरीर पहाड़ के समान लंबा-चौड़ा, ठोस और मजबूत है। उनका मन बड़ के वृक्ष की तरह विशाल है। जैसे बड़ का वृक्ष स्वयं धूप, गर्मी और वर्षा सहन कर लेता है, परंतु अपनी शरण में आए हुए लोगों को छाया और शीतलता प्रदान करता है तथा भीगने से बचाता है, उसी प्रकार पिताजी स्वयं कष्टों और अभावों को सहकर अपनी संतान तथा परिवार को सुख प्रदान करते हैं।
विशेष-
- मिश्र जी की भाषा बातचीत के समान, सरल, सहज और अनुभूतिपूर्ण है। वे कविता करने या गाने की बजाय, कविता कहते हैं।
- छोटे-छोटे चुस्त वाक्य और तुक के आश्रय से कविता सचमुच मनमोहक बन पड़ी है।
- देह की विशालता और दृढ़ता के लिए पहाड़ की उपमा प्रभावी बन पड़ी है।
- मन की उदारता और विशालता के लिए बड़ के झाड़ की उपमा भी सटीक है।
काव्यांश – 14
एक टहनी कम न हो ले,
कम कहाँ कि ख़म न हो ले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना, (पृष्ठ 198)
शब्दार्थ : ख़म – टेढ़ा। धीर – धैर्य, तसल्ली। जी चीर देना-कष्ट पहुँचाना।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश नई कविता के समर्थ कवि भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से अवतरित है। कवि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर की – विशेषकर अपने पिताजी की याद सताती है। कवि अपने पिता के अगाध स्नेह को याद करता हुआ कहता है।
व्याख्या – पिताजी का मन उस वट वृक्ष के समान है, जो अपनी किसी टहनी को कम होता हुआ नहीं देख सकता। कम होने की तो बात ही दूर वह किसी टहनी में आई मरोड़ या टेढ़ेपन को भी सह नहीं सकता। अर्थात पिताजी अपने परिवार के किसी सदस्य की कमी को तो सह सकते ही नहीं, वे किसी के
ज़रा-से-कष्ट को भी देखकर दुखी हो उठते हैं। वे सबका ध्यान रखते हैं। उनकी उन्हें बहुत चिंता रहती है। उनका बाहरी रूप अर्थात डालें जितनी विशाल और फैली हुई हैं, उतनी ही गहरी उनकी जड़ें हैं, अर्थात उतना ही गहरा लगाव उनके मन में है।
कवि हवा को संबोधित करते हुए कहता है- हे हवा! मेरे पिताजी मेरे वियोग में बहुत दुखी हैं। वे स्वभाव से बहुत भावुक हैं। तुमसे निवेदन है कि तुम उनके पास जाकर उन्हें सांत्वना देना। ऐसा कोई व्यवहार न करना जिससे उनके हृदय पर कोई चोट पहुँचे और वे दुखी हों।
विशेष-
- इस पद्यांश में मन पर बड़ का आरोप किया गया है। अतः सांगरूपक अलंकार है। यहाँ ‘पत्ता’ परिवार के एक सदस्य का प्रतीक है। ‘टहनी’ भी सदस्य की प्रतीक है। ‘धारा फूटना’ तथा ‘दूध की नदी उमगना’ करुणा और संवेदना के प्रतीक हैं। ‘खम होना’ थोड़े से कष्ट का प्रतीक है।
- कवि के पिता की परिवार भावना अनुपम है। वे एक आदर्श पिता हैं।
- ‘ध्यान कितना’, ‘फिक्र कितनी’ में भावावेश शैली का प्रयोग हुआ है। काकु वक्रोक्ति से अभिप्रेत अर्थ व्यक्त हुआ है।
- ‘कम कहाँ कि’ में अनुप्रास अलंकार है।
काव्यांश – 15
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मज़े में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है, (पृष्ठ 198)
शब्दार्थ : सजीले – सजे-धजे सुंदर। पुण्य पावन – अति पवित्र। बस – केवल नियंत्रण। विरस – रसहीन, फीका।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश कविवर भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से उद्धृत है। कवि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के अंतर्गत जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर के प्रिय सदस्यों की बहुत याद आती है। वह भावुक हो उठता है। वह अपने पिता के फफक-फफक कर रोने और माता द्वारा उसे ढाढ़स बँधाने की कल्पना करता है।
व्याख्या – कवि हरे-भरे सावन से प्रार्थना करता है कि तुम जल बरसा कर सभी का उपकार करते हो। तुम मेरे लिए बहुत पुण्यात्मा और पवित्रात्मा हो। अतः तुम जितना चाहो, उतना बरसो। तुम्हारे बरसने से जगत का भला ही होगा। परंतु ऐसा न हो कि तुम्हें बरसता देखकर पाँचवें पुत्र की याद में पिताजी की आँखों से आँसू बरसने लगें। अतः इस ढंग से बरसना कि पिताजी को मेरी याद न सताए। मेरी याद आ जाने से वे दुखी हो जाएँगे। इसलिए तुम्हें वर्षा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
हे सावन! तुम मेरे पिता से मेरे बारे में यह कहना कि भवानी जेल में पूरी तरह से मौज में है। वह आनंद और मस्ती में है। इसलिए उसकी चिंता न करें। भवानी को बस एक पीड़ा है कि वह घर में नहीं है। बाकी उसे कोई कष्ट नहीं है। फिर कवि खुद को ही संबोधित करके कहता है मैं कहने को तो घर के वियोग को ‘बस’ कह रहा हूँ। परंतु सच यह है कि घर से अलग रहना इतना आसान नहीं है। इसी वियोग से मेरा जीवन दुखमय बन गया है। मैं अलगाव का नरक भोग रहा हूँ।
विशेष-
- छोटे-छोटे वाक्यों और तुकों के सहारे कविता सचमुच मनमोहक बन पड़ी है।
- कवि ने सावन को दूत बनाने की पुरानी काव्य-परंपरा का निर्वाह किया है। इससे कविता में मार्मिकता आ गई है।
- संबोधन शैली के कारण भी काव्य में सजीवता आ गई है।
- ‘पुण्य पावन’ में अनुप्रास अलंकार है।
- वियोग-वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।
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काव्यांश – 16
किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते हैं लोग, कहना
मत करो कुछ शोक, कहना, (पृष्ठ 198)
शब्दार्थ : धीर – हौसला, तसल्ली। शोक – दुख।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश नई कविता के समर्थ कवि भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से अवतरित है। कवि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर की – विशेषकर अपने पिताजी की याद सताती है। वह पिता के दुख को कम करने के लिए सावन को दूत बनाकर पिता के पास भेजता है। कवि सावन को निर्देश देता है कि-
व्याख्या – हे सावन! तुम मेरे पिता के सामने ये निराशाजनक बातें मत कह देना। उन्हें हर प्रकार से धीरज बँधाना। उन्हें यही कहना कि तुम्हारा पुत्र भवानी जेल में रहकर खूब पढ़-लिख रहा है। वह पढ़ने-लिखने में मस्त है।
हे सावन! पिताजी से यह कहना कि भवानी जेल में रहकर खूब काम करता है। वह अपने गौरवशाली कामों और व्यवहार से आपका नाम ऊँचा कर रहा है। उन्हें यह भी कहना कि जेल में सब लोग उसे बहुत चाहते हैं। इसलिए तुम उसके लिए किसी प्रकार का शोक मत करो।
विशेष-
- कवि को अपने पिता के दुख की बहुत चिंता है। उनके पिता बहुत भावुक, संवेदनशील और स्नेही हैं। पारिवारिक स्नेह की दृष्टि से यह काव्यांश मार्मिक बन पड़ा है।
- मिश्र जी की भाषा बातचीत के समान सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और अनुभूतिपूर्ण है। वे कविता करने या गाने की बजाय कविता कहते हैं।
- सावन को संदेशवाहक बनाकर भेजने की प्राचीन काव्य परंपरा का निर्वाह किया गया है।
- ‘कहना’ की आवृत्ति मनमोहक बन पड़ी है।
काव्यांश – 17
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वज़न सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डटकर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं, (पृष्ठ 198)
शब्दार्थ : कातना – चरखा चलाकर रुई से धागा बनाना। डटकर ठेलता – पूरे मनोयोग से हटाना। अस्त – निराश।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश नई कविता के समर्थ कवि भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से अवतरित है। कवि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर की – विशेषकर अपने पिताजी की याद सताती है। वह पिता के दुख को कम करने के लिए सावन को दूत बनाकर पिता के पास भेजता है। कवि सावन को निर्देश देता है कि-
व्याख्या – हे सावन! तुम मेरे पिता के सामने यह कहना कि मैं जेल में रहकर बहुत मस्त हूँ। मैं गाँधी जी के निर्देश पर चर्खा कातता रहता हूँ। यहाँ रहकर मेरा वज़न सत्तर सेर हो गया है। मैं खूब खाता-पीता हूँ।
हे सावन! पिताजी से यह भी कहना कि भवानी जेल में खूब खेलता है, कूदता है। दुखों को अपने से दूर भगाता है। किसी प्रकार का क्लेश नज़दीक नहीं आने देता। जेल में सदा मस्त और निश्चित बना रहता है। कभी ग़लती से यह मत कह देना कि भवानी निराश और उदास रहता है। ऐसा कहने से वे और भी दुखी हो जाएँगे।
विशेष-
- कवि का अथाह पितृ प्रेम प्रकट हुआ है। जेल में रहकर भी उन्हें पिता के भावुक मन का ख्याल है। पारिवारिक स्नेह की दृष्टि से यह काव्यांश अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है।
- छोटे-छोटे चुस्त वाक्य और तुक के आश्रय से कविता का सचमुच मनमोहक बन पड़ी है।
- हटकर ठेलना, अस्त होना ‘मुहावरों’ का प्रयोग मनोरम बन पड़ा है।
- एक पद की आवृत्ति में कविता में अनुरंजकता आ गई है।
काव्यांश – 18
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझैं कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें। (पृष्ठ 198-199)
शब्दार्थ : मौन – चुप। बक देना – बोल देना। सजीले – सजे-धजे सुंदर।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश नई कविता के समर्थ कवि भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘घर की याद’ नामक कविता में से अवतरित है। कवि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण जेल में बंद है। वहाँ उसे अपने घर की विशेषकर अपने पिताजी की याद सताती है। कवि को लगता है कि उसके पिता उसके वियोग में रो-रोकर बेहाल हो रहे होंगे। अतः वह सावन को दूत बनाकर अपने पिता के पास भेजता है। वह सावन को सावधान करते हुए कहता है-
व्याख्या – हे सावन! सावधान रहना। तुम कहीं मेरी वास्तविक स्थिति का बयान न कर देना। मेरे पिता के सामने मेरे दुख को न कह देना। यह मत कह देना कि मुझे नींद नहीं आती और मैं निरंतर जागता रहता हूँ और मुझे आदमी को देखकर भय लगता है। मैं हमेशा खोया-खोया और अकेला रहता हूँ।
हे सावन! सावधान रहना! गलती से भी मेरे पिता से यह न कहना कि मैं सदा चुपचाप रहता हूँ और तुम्हारे बिना व्यथित हूँ। न ही यह कहना कि मैं खोया-खोया रहता हूँ और मुझे अपनी सुध-बुध तक नहीं है। हे सावन! देखो, मेरे पिताजी के सामने बहुत सोच-समझकर बोलना। असावधानी के कारण कोई ऐसा शब्द मुँह से न निकाल देना या ऐसे ढंग से मत बोलना कि तुम्हारी बात की सच्चाई में उन्हें संदेह हो जाए। वे तुम पर विश्वास ही न करें। यदि ऐसा हुआ तो इससे उनका दुख और भी बढ़ जाएगा। इसलिए तुम्हें विशेष रूप से सावधान रहकर यह कार्य करना है।
हे मेरे हरे-भरे सुंदर सावन! हे मेरे पुण्यवान और पवित्र मित्र, तुम चाहे जितना बरस लो; पर ऐसी कोई बात मत होने देना जिससे मेरे पिताजी को मेरी याद आ जाए, वे रोने लगें और अपने पाँचवें पुत्र की याद में तरसने लगें।
विशेष-
- कवि अपने पिता के प्रति अत्यंत भावुक है। वह अपने कारण उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं देना चाहता। कवि की पितृ-भक्ति अनुकरणीय है।
- छोटे-छोटे चुस्त वाक्य और तुक के आश्रय से कविता सचमुच मनमोहक बन पड़ी है।
- ‘आदमी से भागता हूँ’ में कवि की मानसिक पीड़ा का मार्मिक वर्णन है।
- ‘बक’ और ‘शक’ शब्दों का प्रयोग यहाँ द्रष्टव्य है।
- ‘पाँचवें’ शब्द के प्रयोग में कितनी करुणा है, यह देख. ने-योग्य है।
- ‘सावन’ के लिए सजीला, हरा, पुण्य, पावन आदि विशेषण अवसर के अनुकूल तथा अत्यंत सार्थक है।
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Class 9 Hindi Chapter 12 घर की याद Summary
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
अब सबेरा हो गया है,
कब सबेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ माना-
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,
घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें
भुजा भाई प्यार बहिनें,
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक् घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
आज गीता-पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,

चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नजर उनको पड़े होंगे।
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पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,
और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना बहा होगा
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और और बच्चे,
पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हुँ,
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,
मैं न रोऊँगा – कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवें की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा
आज सबका मन चुआ होगा।

अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरनें झुकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;
गगन-आँगन की लुनाई
दिशा के मन में समाई
दश दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की लय छाप है रे
झाड़ आँखें बंद करके
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किसलिए इतनी तृषा रे,
तू जरा-सा दुख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,
हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे,
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नदी उमग ले,
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एक टहनी कम न हो ले,
कम कहाँ कि ख़म न हो ले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,
किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते हैं लोग, कहना
मत करो कुछ शोक, कहना,
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डटकर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।
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