Saturday, 28 March 2026

Class 7 SST Chapter 4 Notes in Hindi नवारंभ नगर एवं राज्य

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New Beginnings Cities and States Class 7 Notes in Hindi

नवारंभ नगर एवं राज्य Class 7 Notes

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान अध्याय 4 नोट्स नवारंभ नगर एवं राज्य

→ प्रस्ताबना

  •  इसा पूर्व लगभग दो हज़ार साल बाद सिंधु-सरस्वती सभ्यता, जो भारत की पहली नगरीय सभ्यता थी, धीर-धीरे विघटित होने लगी। इसके बाद प्रथम सहस्बाब्दी सा.स.पू. गंगा के मैदानों में एक नए नगरीकरण की शुरुआत हुई। इस नए नगरीकरण में न कवल आर्थिक व सामाजिक वल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक विकास हुआ।

→ इस नए नगरीकरण के साक्ष्य के दो मुख्य स्रोत हैं-
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  • प्राचीन साहित्य-पुराने धार्मिक और साहित्यिक ग्रंथ जिसमें वैदिक, जैन और बौद्ध ग्रंथ शामिल है।
  • पुरातात्विक खुदाइयों से मिले अवशेष, शिलालेख और अन्य स्थल इस समय के जीवन, समाज और संस्कृति से अवगत कराते हैं।
  • यह भारत का ‘द्वितीय नगरीकरण’ माना जाता है जिसने भारतीय सभ्यता को नई दिशा प्रदान की।

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जनपद और महाजनपद

  • द्वितीय सहस्त्राब्दी सा.सं.पू. के उत्तरार्ध में समान जीवन शैली, धार्मिक मान्यताओं, भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं वाले लोग संगठित होने लगे और उत्तरी व मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बसने लगे। समय के साथ ये संगठित समूह स्थायी रूप से बस गए और उनके बसे हुए क्षेत्रों को ‘जनपद’ कहा जाने लगा।
  • हर जनपद का एक शासक होता था। राजा के पास अपनी सेना, प्रशासनिक व्यवस्था और कानून होतं थे. जिनसे वह्ठ अपने जनपद में व्यवस्था बनाए रखता था। जनपद के लोग कृत्रि, पशुपालन, हस्तकला और व्यापार करते थे। इस समय धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का विकास हुआ-लोग पूजा-पाठ करते, त्योहार मनाते और परंपराओं का पालन करते।
  • गंगा के मैदानों से लेकर दक्षिण भारत तक व्यापारिक मार्ग बने जिससे विभिन्न जनपद आपस में जुड़ने लगे। इससे उनके बीच सांस्कृतिक एकरूपता, समान जीवनशैली और परंपराएँ विकसित हुई और वे संगठित होकर बड़े राज्य बनाने लगे। इस तरह कई जनपदों के एकीकरण से 16 महाजनपदों का उद्य हुआ।
  • ये महाजनपद प्राचीन भारत में राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। इनमें नगरों का विकास हुआ, व्यापार फैला, शासन की नई प्रणालियाँ बनीं और समाज में नई व्यवस्थाएँ स्थापित हुई। यही महाजनपद आगे चलकर भारत की राजनीतिक एकता और सभ्यता के विकास की नींव बने।
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  • महाजनपदों के नगर विशाल और प्राचीरों से युक्त थे। सुरक्षा के लिए परिखा (खाई) बनाई जाती थी। प्राचीन राजधानियाँ आज भी नगरों के रूप में मौजूद हैं। वास्तव में ये आधुनिक नगर लगभग 2500 वर्ष पुराने हैं।

→ प्रारंभिक लोकतांत्रिक परंपराएँ

  • प्राचीन भारत में हर जनपद में एक सभा या परिपद् होती थी, जिसे ‘सभा’ या ‘समिति’ कहा जाता था। ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसे शब्द भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ‘वेदों’ में मिलते हैं।
  • समिति के वरिष्ठ सदस्यगण और राजा जनता से जुड़ी समस्याओं और राज्य के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करते थे। समिति या परिषद् के सदस्य राजा के शासन व अधिकारों की समीक्षा भी करते थे।
  • समय के साथ महाजनपदों ने जनपद सिद्धांतों को बेहतर बनाया। कुछ महाजनपदों में राजतंत्र था यानि
    राजा सबसे बड़ा शासक होता था। सभा या समिति के मंत्रियों/सदस्यों के समर्थन प्राप्त कर राजा अपने कर्तव्यों को पूर्ण करता था जैसे-कर (टैक्स) इकट्ठा करना, न्याय शासन व कानून व्यवस्था बनाए रखना, राज्य की सुरक्षा हेतु सैन्य-बल को मज़बूत करना। मजबूत प्राचीरें व परिखाएँ बनवाना।
  • भारत के उत्तरी भाग में मगध (वर्तमान बिहार) कोसल (वर्तमान उत्तर प्रदेश का भाग), अवंति (वर्तमान मध्यप्रदेश का भाग) अपनी भौगोलिक स्थिति, उन्नत विकास मार्गों और सेना के कारण बहुत शक्तिशाली थे। राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से प्रभावशाली जनपदों ने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • कुछ महाजनपदों जैसे वज्जि (वर्तमान बिहार का भाग) और मल्ल (वर्तमान उत्तर प्रदेश का भाग) में शासन व्यवस्था अलग थी। ये महाजनपद गण या संघ के रूप में काम करते थे और राजा का चयन सभा/समिति द्वारा किया जाता था। यह विश्व की सर्वप्रथम गणतांत्रिक प्रणालियों में से एक था।
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→ कुछ अन्य नवीन प्रयोग

  • महाजनपदों का युग वर्तमान समय तक भारतीय सभ्यता को प्रभावित करता है। इस काल में उत्तर वैदिक, बौद्ध और जैन विचारधाराओं का उदय हुआ। भारतीय कला के नए रूप विकसित हुए।
  • जहाँ सिंधु-सरस्वती सभ्यता में ताम्र और कांस्य की धातुकला में दक्षता थी. वहीं द्वितीय नगरीकरण प्रक्रिया में लौह धातु (Iron) का प्रयोग अति महत्वपूर्ण था। लोहे के उपयोग ने कृषि को वहुत आंगे बढ़ाया और लोहे के हथियारों से सेना बल मज़बूत हुआ।
  • इस युग की उल्लेखनीय उपलब्धियों में एक थी धातु के सिक्कों का प्रयोग जिन्हें ‘आहत सिक्के’ भी कहा जाता है। ये सिक्के व्यापार को मज़बूत करने में सहायक बने और राज्य समृद्ध बने।
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  • शुरुआत में सिक्के चाँदी के बने होते थे। हर महाजनपद के अपने सिक्के होते थे, जो चाँदी, सोना, ताँबा या अन्य धातुओं से बनाए जाते थे।

→ वर्ण-जाति व्यवस्था

  • सभ्यता के विकास के साथ समाज अपने को विभिन्न समूहों में बाँट लेता है जैसे-व्यवसाय, शिक्षा, कृषि, कला, प्रशासन आदि। भारतीय समाज दो मुख्य व्यवस्थाओं में संगठित था।
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  • जाति-ऐसा समुदाय जिसके सदस्य किसी विशेष व्यवसाय, पेशे या कौशल से जुड़े होते थे। जैसे-कृषि, व्यापार, धातुकार्य या हस्तकला। ये कौशल एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक चलते थे। जातियों की अपनी-अपनी धार्मिक परपराएँ थीं। भांजन, विवाह और रहन-सहन के नियम हांते थे।
  • ‘वर्ण’-वैदिक ग्रंथों के अनुसार वर्ण चार प्रकार के होते हैं-
  • ब्राह्मण-ज्ञान के रक्षक और उसका प्रचार-प्रसार करने और धार्मिक कार्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करते थे।
  • क्षत्रिय-देश और समाज की रक्षा हेतु युद्ध के लिए तैयार रहना।
  • वैश्य-यह वर्ग समाज की समृद्धि बढ़ाने के लिए व्यापार, व्यवसाय और कृषि कार्य करते थे। शूद्र-यह वर्ग कला, शिल्प, निर्माण और सेवा कार्य करते थे।
  • ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि प्रारंभिक काल में व्यक्ति या समुदाय परिस्थितियों के अनुसार अपना व्यवसाय बदल लेते थे। जैसे-ब्राह्मण व्यापार या सैनिक कार्यों की ओर मुड़ जाते थे। प्राकृतिक आपदा की स्थिति में किसान नगर की ओर चले जाते और नया व्यवसाय अपनाते थे। यह व्यवस्था भारतीय समाज की रचना और आर्थिक गतिविधियों को संगठित करने में सहायक रही।
  • वर्ण-जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डाला है। विद्वानों ने इस पर अध्ययन किया है। प्राचीन काल में यह व्यवस्था लचीली व भिन्न थी। लेकिन ब्रिटिश शासनकाल में यह काफी कठोर हो गई। भारतीय समाज में वर्ण-जाति व्यवस्था के अलावा अन्य व्यवस्थाएँ भी मौजूद थीं।

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→ भारत के अन्य भागों में विकास

  • प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में व्यापार, सैनिक अभियान और तीर्थ यात्राओं के लिए महत्वपूर्ण मार्ग बनाए गए थे। उत्तरापथ और दक्षिणापथ भारत में प्राचीन व्यापार मार्ग थे। उत्तरापथ (पहला मार्ग) उत्तर- पश्चिम भारत से शुरू होकर गंगा के मैदानों से होते हुए पूर्वोत्तर भारत को जोड़ता था। दक्षिणापथ (दूसरा मार्ग) कौशांबी (प्रयागराज के पास) से शुरू होकर विंध्य पर्वत भृंखला को पार करता हुआ दक्षिण भारत तक जाता था।
  • इन सड़क मार्गों से भारतीय संस्कृति, व्यापार, शिक्षा और संचार के माध्यम से राजनीतिक एकता बढ़ी। बड़े-बड़े साम्राज्यों जैसे मगध, मौर्य आदि के विस्तार में सहायक हुई।
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  • प्राचीन भारत में कई समानांतर रास्ते भी थे, जो देश के अलग-अलग भागों को जोड़ते थे-खासकर पश्चिमी और पूर्वी बंदरगाहों को, जो व्यापार के प्रमुख केंद्र थे।
  • पूर्वी क्षेत्र में कई बड़े और प्रसिद्ध नगर थे, जैसे-शिशुपालगढ़ (वर्तमान भुवनेश्वर, ओडिशा) जो कलिंग की राजधानी थी। यह नगर सुनियोजित तरीके से बनाया गया था। इसका आकार वर्गाकार (Square) था जिसमें मज़बूत दुर्ग और चौड़ी सड़कें थीं। यह उन्नत शहर निर्माण का उदाहरण है।
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    द्वारों में से एक, जो दुर्ग की प्राचीरों के मध्य स्थित है। द्वार के बाहर जल से भरी हुई परिखा (खाई) देखी जा सकती है। ध्यान दें कि द्वार सोच-समझकर संकरा बनाया गया था, जिससे लोगों और सामान की आवाजाही पर नियंत्रण रखा जा सके।
  • भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी भागों में नगर निर्माण की प्रक्रिया लगभग 400 सा.स.पू. में शुरू हुई, लेकिन नई पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि व्यापारिक, गतिविधियाँ इस काल से पूर्व भी मौजूद थीं।
  • दक्षिण भारत में तीन प्रमुख राज्य उभरकर सामने आए-चोल, चेर और पांड्य। पुरातात्विक खोजों के अतिरिक्त प्राचीन तमिल साहित्य में इन राज्यों और राजाओं का वर्णन मिलता है।
  • इन राज्यों ने दक्षिण भारत को मज़बूत राजनीतिक और आर्थिक पहचान दी। वे मसाले, बहुमूल्य रत्नों, स्वर्ण का व्यापार न केवल भारतीय उपमहाद्वीप के भीतर करते थे, बल्कि विदेशों तक व्यापार फैला हुआ था।

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  • 300 या 200 सा.सं.पू. के लगभग भारतीय वस्तुएँ व्यापार, संस्कृति भारत से बाहर मध्य व दक्षिण एशिया तक पहुँची। इस काल में महाजनपदों का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त हो गया। उनके स्थान पर नए राज्य, नगर व्यापारिक केंद्र विकसित हुए। नए परिवर्तनों की शुरुआत हुई जिसमें राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास ने भारत को फिर नए रूप दिए।

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