Teachers recommend Class 7 Social Science Notes in Hindi and Class 7 SST Chapter 8 Notes in Hindi भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं for mastering important definitions and key concepts.
How the Land Becomes Sacred Class 7 Notes in Hindi
How the Land Becomes Sacred Class 7 Notes
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान अध्याय 8 नोट्स भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं
- पावनता उन स्थानों, यात्राओं और प्राकृतिक तत्वों से जुड़ी होती है जो धर्मिक व आध्यात्मिक विश्वासों में पूजनीय और सम्मानित हैं। पावनता या पवित्रता का प्रकृति, संस्कृति और परंपराओं से गहरा जुड़ाव है।
- भागवत पुराण के अनुसार संपूर्ण प्रकृति दिव्य है और ईश्वर के शरीर का हिस्सा है। नदियाँ, वनों, पर्वत और तीर्थों को पवित्र मानकर श्रद्धा के साथ पूजा जाता है।
- भारतवर्ष तीर्थयात्राओं का देश है। पावन स्थल और तीर्थयात्राएँ पूरे भारत में लोगों को जोड़ते हैं और सांस्कृतिक मूल्यों को विकसित करते हैं।
- भारतीय उपमहाद्वीप में पावन स्थल और तीर्थयात्राओं की प्राचीन परंपरा और विश्वास ने समाज को जोड़ा है। भारत के संदर्भ में पावनता भूगोल, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ी है।

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→ हिंदू तीर्थस्थल:
- हिमालय भृंखलाओं पर कई प्राचीन हिंदू तीर्थस्थल स्थित हैं। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री अत्यंत पावन व पूजनीय हैं। चार धाम देश की चार दिशाओं में स्थित हैं। 51 शक्तिपीठ भारत, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका सहित विभिन्न देशों में फैले हुए हैं। 12 ज्योतिर्लिंगों का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्त्व है। महाराष्ट्र में आठ सौ वर्ष पुरानी पंढरपुर वारी परंपरा और करत में सबरीमाला मंदिर की तीर्थयात्रा का विशिष्ट महत्व है।
- जैन परंपरा में तीर्थ उन पवित्र स्थानों को कहा जाता है जहाँ तीर्थकरों ने मोक्ष पाया या ध्यान किया। उन्होने जिन जगहों पर जैसे-पेड़, तालाब या पर्वत पर ध्यान किया, वे स्थान पवित्र माने जाने लगे। कुछ प्रमुख पवित्र स्थान हैं-माउंट आबू, गिरनार और सौराष्ट्र की शत्रुंजय पहाड़ी।
- बौद्ध धर्म में वे स्थल पावन हैं, जहाँ महात्मा बुद्ध गए थे या जहाँ उनके अवशेष रखे हैं। मध्यप्रदेश में स्थित साँची का प्रसिद्ध स्तूप और महात्मा बुद्ध का निर्वाण स्थल बोधगया (बिहार) का महाबोधि स्तूप तीर्थयात्रियों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

- सिख धर्म के महान गुरुओं से संबंधित पावन स्थलों की श्रद्धालुगण यात्रा करते हैं। सिख धर्म में ‘तख्त’ आध्यात्मिक और धार्मिक केंद्र हैं। उदाहरण के लिए अकाल तख (स्वर्ण मंदिर, अमृतसर), तख़ श्री पटना साहिब (पटना) तथा तख्त श्री केशगढ़ साहिब (आनंदपुर)।
- हिंदू और अन्य लोक परंपराओं तथा जनजातियों में प्रकृति की पूजा करते हैं। नदियों को देवी रूप में पूजा जाता है। पेड़-पौधों, जंगलों, पर्वतों और पत्थरों को भी देवी-देवताओं की तरह पूजा जाता है। यह प्रकृति की रक्षा और संरक्षण की परंपरा भी है। यह मान्यता है कि प्रकृति में ईश्वर की उपस्थिति निवास करती है और पृथ्वी को ‘माता’ या ‘भूदेवी’ माना जाता है। उदाहरण के लिए. झारखंड में डोंगरिया खोंड जनजाति के लिए नियम डोंगर पहाड़ी पूजनीय हैं। इसी प्रकार, तमिलनाडु की टांडा जनजातीय समुदाय नीलगिरि श्रृंखला में पर्वत शिखरों को देवता रूप में पूजता है।

- पाठ हमें भारतीय उपमहाद्वीप के पावन भू-भाग की जानकारी प्रदान करता है। अनंक पवित्र स्थल देश के अलग-अलग हिस्सों से आपस में जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए-चार धाम, ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठ पूरे भारत में फैले हुए हैं।
- तीर्थयात्रा के दौरान यात्री पूरे भारत की भूमि, भाषा, रीति-रिवाजों, वस्त्रों और भोजन से परिचित होते हैं। इस प्रकार तीर्थयात्राएँ भारत की सांस्कृतिक एकता का माध्यम बनती हैं और संपूर्ण भारत को एक पावन भूमि के रूप में देखने व समझने का अवसर मिलता है।
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→ पावन पारिस्थितिकी
- भारत में तीर्थ अक्सर नदियों के किनारे या पर्वतों पर स्थित होते हैं। वैदिकाल से नदियों की पूजा की जाती रही है। ऋग्वेद में ‘नदी-स्तूति सूक्त’ नदियों की शक्तियों को समर्पित है।

- भारत में प्रयागराज में गंगा. यमुना और सरस्वती का संगम तीर्थों में प्रमुख है। यहाँ हर छह साल में कुंभ मंला आयांजित हांता है। यूनंस्को ने कुंभ मेले को ‘अमूर्त सास्क्कृतिक धरोहर’ के रूप में मान्यता दी है। 2025 में करीब 66 करोड़ लोगों ने कुंभ मेले में भाग लिया था। एक विशेष खगोलीय योग (ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति) में आयोजित कुंभ मेले में भाग लेना पुण्यकारी माना जाता है।

- भारतीय भू-भाग के कई तीर्थस्थल और मंदिर पर्वतों की चोटियों पर स्थित हैं। वैष्णों देवी. अमरनाथ, कैलाश मानसरोवर, बालाजी तिरुपति और तिरुवनमलाई मंदिर की पर्वतीय तीर्थयात्राएँ न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक शक्ति का भी परीक्षण करती. हैं।

→ वृक्ष, वन और पावन निकुंज
- भारत भूमि में हजारों पावन निकुंज हैं जिनका संरक्षण अति आवश्यक है। जनजातीय और ग्रामीण समुदायों में पावन वनों को देवताओं का निवास मानते हैं। वे जंगलों को शिकार, पेड़ों की कटाई और खनन गतिविधियों से बचाते हैं।
- मेघालय के रिंके या बासा पावन वन (Sacred groves) महाराप्ट्र का कलकई मंदिर राजस्थान का ओरण, झारखंड का सरना आदि पवित्र वन-जीवों और वनस्पति को सुरक्षित रखते हैं और जल बचाने में सहायक हैं।
- मोहनजोदड़ों की खुदाई में प्राप्त मुहरें प्रमाणित करती हैं कि पवित्र पीपल वृक्ष शताब्दियों से भारतवर्ष के सांस्कृतिक भूगोल का महत्त्वपूर्ण अंग है। पीपल का पेड़ हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्मों में अत्यंत पावन माना जाता है।

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→ तीर्थ यात्रा और व्यापार
- तीर्थयात्रियों और व्यापारियों के मध्य संपर्क से व्यापार को बढ़ावा मिलता था। तीर्थयात्राएँ व्यापार और व्यवसाय का माध्यम भी बनती थी।

→ प्राचीन भारत में प्रमुख व्यापारिक मार्ग-
- उतरापथ-उत्तर-पश्चिम भारत से लेकर पर्वी भारत तक फैला था।
- दक्षिणापथ-कौशांबी और उज्जयिनी होते हुए प्रतिष्ठान (आज का पैठन) तक जाता था। इन मार्गों पर बहृमूल्य रत्नों, मोती, हीरें, सीप, सोने और चाँदी के साथ-साथ कपास, चंदन, विविध मसाले आदि वस्तुओं का व्यापार होता था।
→ पावन स्थलों का संरक्षण
- पवित्र स्थलों की परंपरा भारत के साथ-साथ ग्रीस, अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे देशों में भी देखने को मिलती है। न्यूजीलैंड के मूल निवासी माउंगा पर्वत को अपना पूर्वज मानते हैं।

- आज हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अब पवित्र स्थलों का नुकसान और शोषण न हो। हम पावन स्थलों की पावनता बनाए रखने के प्रति जागरूक हों। हजारों साल पुरानी भारतीय सभ्यता और राष्ट्रीय धरोहरों की रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य है।
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